षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'भगवान्को दानरूपमें जो कुछ भेंट कर दिया जाता है उसका पुनः अप- हरण या उपभोग नहीं करना चाहिये' यह विधान पुष्टिमार्गीय साधना- प्रणाली पर लागू नहीं होता. क्योंकि पुष्टिमार्गीय सेवाप्रणालीमें जैसे घरके सेवक मालिककी उपभोग की हुई वस्तुओंका—अन्नवस्त्रादिका उपभोग लोकमें करते ही हैं वैसे ही सब कुछ पहले एकवार प्रभुको समर्पित करना चाहिये और पश्चात् स्वयम्के उपभोगार्थ ग्रहण करना चाहिये. अतः सर्वसमर्पण एवम् असमर्पित त्याग के सिद्धान्तमें न तो विरोधाभास और न किसी प्रका- रकी कठिनाई ही है. ब्रह्मसम्बन्ध लेते समय जिन वस्तुओंका हम समर्पण करते हैं उनका साक्षात् या परम्परया किसी भी तरह एक वार भगवान्की सेवामें विनियोग हो जानेपर उनके सारे दोष निवृत्त हो जाते हैं. अतः इस तरहकी दोषरहित ब्रह्मभावापन्न वस्तुओंके उपभोगमें किसी भी प्रकारके सांसारिक अनर्थकी सम्भावना नहीं रह जाती है. जैसे नदी-नाले गंगामें मिल जाने पर गंगाजल ही मान लिये जाते हैं—उनके स्वतंत्र अस्तित्व या गुणदोषों का विचार नहीं किया जाता. ठीक इसी तरह भगवान्की अलौकिक सेवाके अंग बन जानेपर सांसारिक वस्तुओंके भी स्वतन्त्र गुणदोषोंका विचार अना- वश्यक हो जाता है. भगवान्के द्वारा लिये गये सारे जागतिक रूप भगवान्के हैं तथा भग- वान्के लिए हैं. हमारे स्वयम्के भी अस्तित्व तथा प्रयोजन भगवद्लीलाके अंगरूप तथा भगवत्सेवार्थ हैं. अतः भगवत्समर्पणके बाद भगवत्प्रसादके रूपमें उनका पुनर्ग्रहण दोषरहित है. जब सब कुछ भगवान्का भगवत्सेवार्थ बन जाता है तो भगवदात्मक हो जाता है. यही पुष्टिमार्गके सिद्धांतका गूढतम रहस्य है. यही पुष्टिमार्गके प्रमुख- कर्तव्य भगवत्स्वरूपकी सेवाकी दीक्षा लेते समय और लेनेके बादकी भगवान्- को अभिप्रेत भावना है. यही भावना गोकुलमें प्रकट होकर भगवान्ने श्री महाप्रभुको समझायी थी. उस महानिशामें पुष्टिजीवोंके उद्धारकी चिन्तामें जागृत श्रीमहाप्रभुकी चिन्ता इस रहस्यके प्रकाशनद्वारा दूर की गयी थी. पर आजतक श्रीमहाप्रभुके समीप सुषुप्त उनके अनेक पुष्टिजीव इस सिद्धान्त- रहस्यको सुनकर भी समझ नहीं पाते हैं.