षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“दमला ! यह मारग तेरे लिए प्रकट कियो है” कितना अपनत्व है इस वाणीमें ! “दमला ! ते कछु सुन्योऽ ?” कितनी उत्कण्ठा है इस प्रश्नमें, सिद्धा- न्तके सारे रहस्यको अपने पुष्टिजीवोंको सुनानेकी और समझानेकी! चाहे जीव सुनकर भी समझ पाये या नहीं. अतएव हरिजीवन कहते हैं कि जबतक प्रभु अपनत्व नहीं जताते तबतक पुष्टिमार्गके सिद्धान्त केवल पढ़ या सुन लेनेपर समझमें नहीं आते हैं. उप- निषद् गीता पञ्चरात्र तथा श्रीमद्भागवत सर्वत्र समर्पणका सिद्धान्त सभीने पढ़ा और सुना भी किन्तु.... श्रीमद्भागवतरूप अमृतके सागरका सर्वोत्तम मन्थन कर श्रीमद्वल्लभा- चार्य महाप्रभुने ही अपने सुषुप्त पुष्टिजीवोंको जगाकर पूछा— “दमला ! ते कछु सुन्योऽ?” श्रीमहाप्रभु केवल सुनाने या समझाने में ही सन्तुष्ट नहीं हो जाते हैं. वे पुष्टिजीवके हाथमें परब्रह्म परमात्मा पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको सौंपना चाहते हैं–“सेवा साज सिंगार सुभग रस खान पान प्रकटायो, वृन्दावन निकुंजकी लीला हरि जीवन स्वाद चखायो, जो लों हरि आपुनपो न जनावे तो लों सकल सिद्धान्त मारगको पढे सुने नहीं आवे.’’ प्रस्तुत संस्करण वि. सं. १९८० में भगवद्धर्मपरायण भाईलाल पुरुषोत्त- मदासके आर्थिक सहयोगसे श्रीमुलचन्द तुलसीदास तेलीवाला तथा श्रीधीरजलाल व्रजदास सांकलिया ने सम्पादित तथा प्रकाशित किया था. उसका यह संस्करण ऑफसेट प्रॉसेस द्वारा पुर्नमुद्रित रूप है. इन सभी महानुभावोंका हम कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करते हैं.