भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 408

श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु को सर्वोत्तमस्तोत्र में—"श्रीभागवत- पीयूषसमुद्रमथनक्षमः" कहा गया है. श्रीमद्भागवत वस्तुतः भक्तिरस का एक छलकता हुआ सागर है. अनेकविध भक्ति के रसभावों को प्रकट करनेवाली भगवान् की विविध लीलाओं की जैसी लहरें यहां उठती दिखलाई देती हैं, वैसा अन्य किसी भी भक्तिशास्त्र में सहज-सुलभ नहीं. अतएव कहा जाता है—"पिबत भागवतं रसमालयम्." भागवत की रसलहरी में हिलोरा लेनेवाले भक्तों के लिए उस पार मुक्तितट पर पहुंचना उतनी ही तुच्छ उपलब्धि है जितनी कि इस पार संसार के तट पर चिपके रहने की सांसारिक मनोवृत्ति! इसी भागवत-रसामृत-सागर के मन्थन द्वारा श्रीमहाप्रभु ने जो षोडश-कला-निधि चंद्र प्रकट किया उसे हम 'षोडशग्रन्थ' के नाम से पहचानते हैं. इस षोडश-कला-निधि चन्द्र की शीतल और शुभ्र चन्द्रिका के प्रकाश में प्रत्येक पुष्टिजीव अपने पुष्टिभक्ति के मार्ग को बिना किसी आयास के खोज सकता है और आश्वस्त होकर उस पर अग्रसर हो सकता है.