भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 408 में से

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पृष्ठ 79

॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥ ग्रन्थ-परिचय एक किंवदन्तीके१ अनुसार 'बालबोध' ग्रन्थका प्रणयन श्रीमहाप्रभुने वि. सं. १५५० में पुष्करराजमें२ किया था. ८४ वैष्णवन की वार्ता ५७ मी के भाव प्रकाशके अनुसार अम्बालाके नारायणदास कायस्थको यह बालबोध स्वयम् श्रीमहाप्रभुने द्वारकामें पढ़ाया था. नारायणदासके पिता सरकारी दफ्तरमें नोकरी करते थे. बीस वर्षकी आयुमें नारायणदासको जूआ खेलनेकी लत लग गयी और इसके कारण घर छोड़कर भागना पडा. भटकते हुए दक्षिणमें कहीं जाकर कुछ विद्यार्जन किया और बाजारमें बच्चोंको पढ़ानेकी एक दुकान खोल ली. पढ़ाते समय विद्यार्थी बालकोंका प्रताडन और प्रबोधन दोनों कठोरतासे करते थे! श्रीमहाप्रभुके सेवक कृष्णदासके टोकनेपर भी एकबार किसी विद्यार्थी बालककी पिटाई करने पर जब वह बेहोश हो गया तभी इन्हे अपनी कठोरताका होश आया. भाग कर सीधे कृष्णदासके पास आये और उनके द्वारा श्रीमहाप्रभुके सम्मुख उपस्थित हुए. श्रीमहाप्रभुके प्रतापसे तब वह बालक और नारायणदास दोनों ही स्वस्थ होगये. दीक्षित होनेके बाद दक्षिणसे द्वारकातककी यात्रामें ये श्रीमहाप्रभुके साथ रहे. द्वारकामें इन्हें जब घर लौटने आज्ञा दी गई तब स्वधर्मनिर्वाहकी इनकी चिन्ताका निवारण श्रीमहाप्रभुने- "तोसों स्वरूपसेवा निबहेगी नाहीं. पराई चाकरी करनी. घरपें कोउ सेवक नाही. ताते हस्ताक्षर लिख देत हों सामग्री जो बने सो भोग धरिके महाप्रसाद लीजियो"-कह कर किया. गद्यमन्त्र तथा अष्टाक्षर सेवार्थ लिखकर पधरा दिये. नारायणदासकी बिनती पर कि "महाराज इतने दिन आपके पास रह्यो परन्तु मेरे अन्तःकरणमें बोध न भयो. सो ऐसी कृपा करो जो संसारको दुःख-सुख कछु मोकों बाधा १. श्रीनागरदास बांभनिया शास्त्रीजी द्वारा लिखित लेख "श्रीषोडशग्रन्थनी रचना... महत्वनी तवारीखो". वैष्णववाणी अंक ४ वर्ष १९७९. २. दृष्टव्यः श्रीयदुनाथजीकृत श्रीवल्लभदिग्विजय मध्यम यात्रा प्रकरण

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