षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥ ग्रन्थ-परिचय एक किंवदन्तीके१ अनुसार 'बालबोध' ग्रन्थका प्रणयन श्रीमहाप्रभुने वि. सं. १५५० में पुष्करराजमें२ किया था. ८४ वैष्णवन की वार्ता ५७ मी के भाव प्रकाशके अनुसार अम्बालाके नारायणदास कायस्थको यह बालबोध स्वयम् श्रीमहाप्रभुने द्वारकामें पढ़ाया था. नारायणदासके पिता सरकारी दफ्तरमें नोकरी करते थे. बीस वर्षकी आयुमें नारायणदासको जूआ खेलनेकी लत लग गयी और इसके कारण घर छोड़कर भागना पडा. भटकते हुए दक्षिणमें कहीं जाकर कुछ विद्यार्जन किया और बाजारमें बच्चोंको पढ़ानेकी एक दुकान खोल ली. पढ़ाते समय विद्यार्थी बालकोंका प्रताडन और प्रबोधन दोनों कठोरतासे करते थे! श्रीमहाप्रभुके सेवक कृष्णदासके टोकनेपर भी एकबार किसी विद्यार्थी बालककी पिटाई करने पर जब वह बेहोश हो गया तभी इन्हे अपनी कठोरताका होश आया. भाग कर सीधे कृष्णदासके पास आये और उनके द्वारा श्रीमहाप्रभुके सम्मुख उपस्थित हुए. श्रीमहाप्रभुके प्रतापसे तब वह बालक और नारायणदास दोनों ही स्वस्थ होगये. दीक्षित होनेके बाद दक्षिणसे द्वारकातककी यात्रामें ये श्रीमहाप्रभुके साथ रहे. द्वारकामें इन्हें जब घर लौटने आज्ञा दी गई तब स्वधर्मनिर्वाहकी इनकी चिन्ताका निवारण श्रीमहाप्रभुने- "तोसों स्वरूपसेवा निबहेगी नाहीं. पराई चाकरी करनी. घरपें कोउ सेवक नाही. ताते हस्ताक्षर लिख देत हों सामग्री जो बने सो भोग धरिके महाप्रसाद लीजियो"-कह कर किया. गद्यमन्त्र तथा अष्टाक्षर सेवार्थ लिखकर पधरा दिये. नारायणदासकी बिनती पर कि "महाराज इतने दिन आपके पास रह्यो परन्तु मेरे अन्तःकरणमें बोध न भयो. सो ऐसी कृपा करो जो संसारको दुःख-सुख कछु मोकों बाधा १. श्रीनागरदास बांभनिया शास्त्रीजी द्वारा लिखित लेख "श्रीषोडशग्रन्थनी रचना... महत्वनी तवारीखो". वैष्णववाणी अंक ४ वर्ष १९७९. २. दृष्टव्यः श्रीयदुनाथजीकृत श्रीवल्लभदिग्विजय मध्यम यात्रा प्रकरण
This page is blank and contains no text to transcribe.
॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥ ग्रन्थ-परिचय एक किंवदन्तीके१ अनुसार 'बालबोध' ग्रन्थका प्रणयन श्रीमहाप्रभुने वि. सं. १५५० में पुष्करराजमें२ किया था. ८४ वैष्णवन की वार्ता ५७ मी के भाव प्रकाशके अनुसार अम्बालाके नारायणदास कायस्थको यह बालबोध स्वयम् श्रीमहाप्रभुने द्वारकामें पढ़ाया था. नारायणदासके पिता सरकारी दफ्तरमें नौकरी करते थे. बीस वर्षकी आयुमें नारायणदासको जूआ खेलनेकी लत लग गयी और इसके कारण घर छोड़कर भागना पडा. भटकते हुए दक्षिणमें कहीं जाकर कुछ विद्यार्जन किया और बाजारमें बच्चोंको पढ़ानेकी एक दुकान खोल ली. पढ़ाते समय विद्यार्थी बालकोंका प्रताडन और प्रबोधन दोनों कठोरतासे करते थे! श्रीमहाप्रभुके सेवक कृष्णदासके टोकनेपर भी एकबार किसी विद्यार्थी बालककी पिटाई करने पर जब वह बेहोश हो गया तभी इन्हे अपनी कठोरताका होश आया. भाग कर सीधे कृष्णदासके पास आये और उनके द्वारा श्रीमहाप्रभुके सम्मुख उपस्थित हुए. श्रीमहाप्रभुके प्रतापसे तब वह बालक और नारायणदास दोनों ही स्वस्थ होगये. दीक्षित होनेके बाद दक्षिणसे द्वारकातककी यात्रामें यें श्रीमहाप्रभुके साथ रहे. द्वारकामें इन्हें जब घर लौटने आज्ञा दी गई तब स्वधर्मनिर्वाहकी इनकी चिन्ताका निवारण श्रीमहाप्रभुने-“तोसों स्वरूपसेवा निबहेगी नाहीं. पराई चाकरी करनी. घरपें कोउ सेवक नाही. ताते हस्ताक्षर लिख देत हों सामग्री जो बने सो भोग धरिके महाप्रसाद लीजियो”-कह कर किया. गद्यमन्त्र तथा अष्टाक्ष र सेवार्थ लिखकर पधरा दिये. नारायणदासकी बिनती पर कि “महाराज इतने दिन आपके पास रह्यो परन्तु मेरे अन्तःकरणमें बोध न भयो. सो ऐसी कृपा करो जो संसारको दुःख-सुख कछु मोकों बाधा १. श्रीनागरदास बांभनिया शास्त्रीजी द्वारा लिखित लेख "श्रीषोडशग्रन्थनी रचना... महत्वनी तवारीखो". वैष्णववाणी अंक ४ वर्ष १९७९. २. दृष्टव्यःश्रीयदुनाथजीकृत श्रीवल्लभदिग्विजय मध्यम यात्रा प्रकरण
न करे अरु चित्त श्रीठाकोरजीके चरणारविन्दमे लग्यो रहे". श्रीमहाप्रभुने अपना चरणामृत दिया और उन्हें यह बालबोध ग्रन्थ पढ़ाया. बालबोधमें सर्वसिद्धान्तोंका संग्रहरूपेण निरूपण है किन्तु स्वसिद्धान्तका नहीं. अन्यान्य सिध्दान्तोंके साधन एवम् फलों का एकबार बराबर ज्ञान हो जानेपर पुष्टिजीवके अन्य मार्गोंपर भटक जानेका भय नहीं रह जाता. सभी मोक्षशास्त्र या तो सांसारिक दुःख दूर करनेके रूपमे या फिर पारलौकिक सुखकी प्राप्तिके रूपमे मोक्षका प्रतिपादन करते हैं. इस संसारमें रहते हुए भी भगवत्सेवा और/अथवा भगवत्कथा के द्वारा भजनानन्दकी प्राप्ति ही पुष्टि- जीवके लिए मोक्ष है. इसका निरूपण किन्तु चतुश्लोकीमे किया जायेगा. यहां वह विवक्षित नहीं है. वैसे तो मनुष्यके मनमे अगणित कामना या महत्त्वाकांक्षा भरी रहती हैं. विद्वानोंने उन्हे किन्तु चार पुरुषार्थोंके रूपमे वर्गीकृत किया है: (१) धर्म (२) अर्थ (३) काम और (४) मोक्ष. स्थूल अर्थोमे इन्हे क्रमशः (१) कर्तव्य (२) सम्पदा (३) प्रेयस् और (४) श्रेयस् कह सकते हैं. जीवनमे दिखलाई देती हर तरहकी कामनाओका इन चार पुरुषार्थोंमे अन्तर्भाव हो जाता है. इनके वास्तविक सहज एवम् शुभ स्वरूपकी जिज्ञासाका समाधान अलौकिक वेदादि शास्त्रोंमे भी मिलता है तथा विभिन्न ऋषियोंके द्वारा प्रणीत आर्ष शास्त्रोंमे भी. प्रस्तुत बालबोध ग्रन्थमे वैदिक धर्मार्थकाममोक्ष पुरुषार्थोंका निरूपण अभिप्रेत नही है. वह तो सर्वनिर्णयमे ही विशदतया निरूपित हो गया है. आर्ष अथवा लौकिक शास्त्र, जिनमे त्रिवर्ग धर्म अर्थ या काम पुरुषार्थ का निरूपण किया गया है, यहां उन शास्त्रोंका विवेचन भी अभिप्रेत नहीं है. यहां तो केवल अन्यान्य ऋषियों द्वारा प्रणीत मोक्षशास्त्र और उनमे प्रतिपाद्य मोक्षस्व- रूपके बारेमें ही श्रीमहाप्रभु अपना अभिमत प्रगट करना चाहते हैं. मोक्षका निरूपण करनेवाले विभिन्न ऋषियोंद्वारा प्रणीत शास्त्रोंमें चार शास्त्र प्रमुख है. अन्य शास्त्रोंका या तो इन्हींमें अन्तर्भाव समझना चाहीये या फिर उन्हें सिद्धान्ततः उपेक्षणीय ही समझना चाहिये.
मोक्षप्रतिपादक ऋषिप्रोक्त चार शास्त्र : (१) त्यागसे स्वतोमोक्षका प्रतिपादक सांख्यशास्त्र (२) अत्यागसे स्वतोमोक्षका प्रतिपादक योगशास्त्र (३) शिवकी भक्ति या प्रपत्ति से परतोमोक्षका प्रतिपादक शैवतन्त्र (४) विष्णुकी भक्ति या प्रपत्ति से परतोमोक्षका प्रतिपादक वैष्णवतन्त्र (१) बाह्यत्याग द्वारा स्वतोमोक्षका प्रतिपादन करनेवाले सांख्यशास्त्रके अनुसार अहन्ता-ममताके सर्वथा नष्ट होनेपर जीवात्माका अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाना ही मोक्ष माना गया है. तत्तत् कालमें विभिन्न ऋषियोंने सांख्यशास्त्रका वर्णन अनेकविध प्रक्रियाओंके आधारपर किया है. पर मोक्षप्राप्तिके उपाय और स्वरूप के बारेमें प्रायः एकवाक्यता है. श्रीमहाप्रभुके अनुसार सांख्यशास्त्रीय प्रणालीका जो रूप मान्य वेदादि शास्त्रोंमें वर्णित हुआ है तदनुसार साधनाचरण करनेपर ही उल्लिखित प्रकारका मोक्षलाभ सांख्यसे मिल सकता है. अन्यथा नही. (२) चित्तवृत्ति-निरोधकी यौगिक प्रणालीसे स्वतोमोक्षका प्रतिपादन करनेवाले योगशास्त्रके अनुसार विषयोंके बाह्यत्यागकी उतनी अपेक्षा नहीं है जितनी कि यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-ध्यान-धारणा-समाधिके बाह्य तथा आन्तरिक समुचित उपायोंसे अनात्मरूप विषयोंमें भटकती चित्त- वृत्तिके निरोधकी आवश्यकता है. चित्तवृत्तिके निरुद्ध होनेपर ही आत्मा अपने स्वरूपमें अवस्थित या मुक्त हो सकती है. श्रीमहाप्रभुके अनुसार इन योगशास्त्रीय उपायोंका निरूपण मान्य वेदादि शास्त्रोंमें भी उपलब्ध होता है अतः तदनुसार अनुष्ठान करनेपर ही मोक्ष- प्राप्तिकी सम्भावना है. वैदिक प्रणालीसे विपरीतता बरतनेपर आत्माकी स्वरूपमें अवस्थिति सम्भव नहीं. (३) परतोमोक्षवादी पाशुपतादि शैवतन्त्रोंके अनुसार साधना करनेपर शिवके द्वारा भी मुक्ति मिल सकती है. श्रीमहाप्रभुके अनुसार क्योंकि सर्वात्मक निर्दोषपूर्णगुण ब्रह्म ही अथर्व- शिखा आदि उपनिषदोंके अनुसार जगत्संहारक शिवका रूप धारण करता है. अतः शिवके मुक्तिदाता होनेमें किसी सन्देहका अवसर नही है. फिरभी शिवके रूपमें भगवान् स्वयम् मुक्तताके आनन्दके उपभोगकी लीला करते हैं.
अतः शिवसे उनकी स्वोपभोग्य मुक्तिके बजाय भोगकी प्राप्ति सुलभ मानी जाती है किसी अतिप्रिय जीवको ही शिव मुक्तिदान करते हैं. यह असा- धारण प्रेमभाजन वे ही बन सकते हैं जो पूर्णतया शिवके प्रति समर्पित होते हैं. अतः शिवकी भक्ति या शरणागतिके साथ जो वर्णाश्रमोचित स्वधर्मकी उपेक्षा नहीं करते उन्हें शिवसे मोक्ष मिलता है. (४) परतोमोक्षवादी पांचरात्र वैष्णवतन्त्रके अनुसार साधना करनेपर विष्णुद्वारा मुक्ति मिल सकती है. श्रीमहाप्रभुके अनुसार क्योंकि सर्वात्मक निर्दोषपूर्णगुण ब्रह्म ही महानारा- यण आदि उपनिषदोंके अनुसार जगत्पालक विष्णुका रूप धारण करता है. विष्णुके रूपमें भगवान् स्वयम् अलौकिक दिव्य भागोंके उपभोगकी लीला करते हैं. अतः विष्णुसे उनके स्वोपभोग्य भोगके बजाय मोक्षकी प्राप्ति सुलभ मानी जाती है. विष्णु अपने किसी अतिप्रिय भक्तको ही भोगका दान करते हैं. यह असाधारण प्रेमभाजन बन पाना पूर्णतया विष्णुके प्रति समर्पित होने- पर ही सम्भव है. अतः विष्णुकी भक्ति या शरणागति के साथ जो वर्णा- श्रमोचित स्वधर्मकी उपेक्षा नहीं करते उन्हें विष्णुसे मुक्ति मिल सकती है. स्वतौमोक्षके प्रकारमें सांसारिक दुःख तो दूर होते है किन्तु पारलौकिक सुखकी सम्भावना नहीं है जबकि परतोमोक्षके प्रकारमें वह सम्भव है. इस तरह ब्रह्मा-विष्णु-शिवकी त्रिपुटोंमें शिव और विष्णु भोग-मोक्ष दोनोके दानमें समर्थ होनेपर भी अधिकांशमें शिव भोगके दाता बनते हैं और विष्णु मोक्षके दाता. ब्रह्मा केवल भोगके दाता हैं मोक्षके नहीं. अतः मोक्षदाता देवताके रूपमें ब्रह्माका भजन व्यर्थ है परन्तु मोक्षशास्त्रके उपदेशक गुरूके रूपमें ब्रह्माको भी मोक्षदाता माना जाता है. यह सारे मोक्षशास्त्रोंके सिद्धान्तोंका संग्रहरूपेण निरूपण है. इसे जाननेसे पुष्टिजीवको पूर्णतया पुष्टिमार्गीय बननेमें अथवा बने रहनेमें सहायता मिलती है स्वसिद्धान्तका निरूपण तो आगे चलकर सिद्धान्तमुक्तावलीमें किया जायेगा. नारायणदास अंबालावालेको श्रीमहाप्रभुने यही सर्वसिद्धान्त- संग्रह पढ़ाया था ताकि उनका चित्त पुष्टिके प्रशस्त पथको छोड़कर कहीं यहां- वहां न भटक जाये. वार्तामें उल्लेख मिलता है कि अपने घर लौटनेके बाद
काम-काजमें व्यापृत हो जानेपर भी इनका चित्त सदा गोकुल और श्री- महाप्रभु की ओर दोडता रहता था- "भैयाजी श्रीगोकुल श्रीआचार्यजीके दरस- नको कब चलोगे ?" तब नारायणदास कहते-'हाँ, अब चलूंगो ? नेत्रनमें जल भरि लीलारसमें मगन होय जाते. फेरि वह चाकर कहतो (कब श्रीगोकुल चलोगे) फेरि मगन होय जाते." श्रीमहाप्रभुने इस बालप्रबोधनद्वारा नारायणदासको कितना स्वकीय- कितना पुष्टिमार्गीय बना लिया होगा ! अतएव श्रीमत्प्रभुने 'बीज' रूपसे पुष्टिके रहस्योंको यहां अवतारी कृष्णके सन्दर्भमें न देकर उनके गुणावतार शिव और विष्णु के सन्दर्भमें 'उपक्षिप्त' किया है- "समर्पणेनात्मनो ही तदीयत्वं भवेद् ध्रुवम्. अतदीयतया चापि केवलञ्चेतसमाश्रितः तदाश्रयतदीयत्वबुद्ध्यर्थे किञ्चित्समाचरेत्. स्वधर्ममनुतिष्ठन्वै भारद्वैगुण्यमन्यथा. इत्येवं कथितं सर्वं नैतज्ज्ञाने भ्रमः पुनः" (बालबोध १८-१९) नारायणदासको स्वरूपसेवाकी आज्ञा न मिली-अतएव स्वरूपसेवाके अनुकल्प श्रीहस्ताक्षरकी सेवाका उल्लेख हमें मिलता है-और न स्वसिद्धान्तका उपदेश ही-अतएव बालबोध द्वारा सर्वसिद्धान्तसंग्रह उपदिष्ट हुआ-फिरभी स्वकीयता-सार-सर्वस्व चिर-उत्कण्ठा और तापभाव का उन्हें वरदान मिला -"भैयाजी! श्रीगोकुल श्रीआचार्यजीके दरसन को कब चलोगे ? हां, अब चलूंगो ! नेत्रनमें जलभरि लीलारसमें मगन होय जाते....." बालबोध वस्तुतः श्रीमहाप्रभु, उनके सिद्धान्त और मार्ग की ओर प्रयाण करने की तीव्र उत्कण्ठा जगाता है-'समर्पणेनात्मनो हि तदीयत्वं भवेद् ध्रुवम्... इत्येवं कथितं सर्वं नैतज्ज्ञाने भ्रमः पुनः" प्रस्तुत संस्करण वि. सं १९८३ में प्रकाशित संस्करणका ऑफसेट प्रॉसेस द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है. श्रीमद्गोस्वामि-कुलभूषण-विद्यानिधि-श्रीव्रजरत्न- लालजी महाराजने श्रीचीमनलाल ह. शास्त्रीद्वारा सम्पादित करवा कर अपनी श्रीबालकृष्ण शुद्धाद्वैत-महासभा (सूरत) द्वारा इसे प्रकाशित कराया था. उस संस्करणके पुनः प्रकाशनपर आदरणीय महाराजश्री तथा श्री- शास्त्रीजी के प्रति हम अपनी कृतज्ञता प्रकट करते है! इति शम्.
સંશોધન
—————
આ ગ્રન્થની બે ટીકા—શ્રીદેવકીનંદનજીની અને શ્રીપુરુષોત્તમજીની ટીકા—શ્રીગોકુલનાથજી મહારાજ તરફથી મુદ્રિત થઈ હતી. આ મુદ્રિત પ્રતિનો પણ અમે હસ્તલિખિત પ્રતિસહ સંવાદ કરી પ્રેસકૉપીમાં ઉપયોગ કર્યો છે. પાઠભેદ જે અત્યાવશ્યક લાગ્યા તે રાખ્યા છે. શ્રી- દ્વારકેશ ચરણની ટીકા માટે અમે બહુ આયાસ કર્યો, પરંતુ પ્રભુ ઈચ્છાએ કાલાવધિ પૂર્ણ થતાં “ગુજરાતી” પ્રેસના માલિક શ્રીયુત નટવરલાલ ઇચ્છારામભાઈ દેશાઈ તરફથી અમને મળી. તે ઘણી જ શુદ્ધ, પ્રાચીન અને વાચિત છે, તેથી આ એક પ્રતિથી પણ કાર્ય સુંદર અને સરલ થયું. આ ટીકાકાર પ્રાચીન છે. આ શ્રીદ્વારકેશચરણની ટીકાનો અને શ્રીદેવકીનંદન- જીની ટીકાનો ઉલ્લેખ પોતાની ટીકામાં શ્રીપુરુષોત્તમજી કરે છે. આવા સામ્પ્રદાયિક ઘણાખરા સુંદર પ્રાચીન ગ્રન્થો શ્રીયુત નટવરલાલભાઈ પાસે છે, અને વિનાસંકોચે ગ્રન્થો છાપવા માટે આપે છે, તે તેમની વિદ્વત્પ્રિયતા સૂચવે છે. એ માટે અમે તેમનો આભાર અત્ર ઉચિત સ્થાને માનીએ છીએ. શ્રીયમુનાષ્ટકના ઉપર શ્રીદ્વારકેશજીની ટીકા માટે બહુ પ્રયાસ કરતાં કાશીમાંથી ફક્ત અમને પ્રથમ શ્લોકની જ ટીકા મળી છે. શ્રીહરિરાયચરણ અને શ્રીપુરુષોત્તમચરણની ટીકા તો મુદ્રિત થઈ ગઈ છે. પરંતુ શ્રીદ્વારકેશજીની ટીકા મળી જાય, તો આ ષોડશ ગ્રન્થનું કાર્ય અમારા શિર ઉપરનું પૂર્ણ કરી દઈએ. આપણા સમ્પ્રદાયમાં આ ષોડશ ગ્રન્થ ઉપરનું સાહિત્ય અનહદ ઉપયોગિ છે, તે હરકોઈ જાણે છે; પરંતુ શોકની વાત એ છે કે પોરબંદરસ્થ ગો૦ શ્રીજીવનલાલજી મહારાજે મુદ્રણ કરાવેલા સેવાફલાદિ અનેક ગ્રન્થો હજુ શિલિકમાં પડ્યા છે. વૈષ્ણવો તરફથી તે ખરીદી જો ઉત્તેજન ન આપવામાં આવે અને તેનો વાચનમાં ઉપયોગ ન કરવામાં આવે ત્યાં સુધી તે મુદ્રિત હો કે લિખિત હો, એ સમાન છે. આજ હેતુથી સભાસદ્નું વર્ગીકરણ શુદ્ધાદ્વૈત મહાસભાને રાખવું પડ્યું છે, કે જેથી આ સભાએ પ્રકટ કરેલા વિવેકધૈર્યાશ્રયાદિ ગ્રન્થો સીધા જ સભાસદ્ના ગૃહમાં પધરાવાય. ચતુઃશ્લોકીનો પણ ઉદ્દાહાર મારે હાથેજ લખાયો હતો. વિવેકધૈર્યાશ્રય વખતે શુદ્ધાદ્વૈત મહાસભાનું મહાધિવેશન હતું તેથી ત્વરામાં તેનું મુદ્રણ થયું હતું. પરંતુ આ ગ્રન્થ શાંતિથી થયેલ છે તેથી પ્રભુકૃપાએ શુદ્ધ મુદ્રણ થયું છે, તથાપિ જીવબલ વિચારી વિદ્વદ્વર્ગ અશુદ્ધિ પરત્વે ક્ષમા અર્પશે.
જ્યેષ્ઠ શુક્લ ૧૫ } ભવદીય સં. ૧૯૮૭ } શાસ્ત્રી ચીમનલાલ
श्रीकृष्णाय नमः । श्रीमद्भगवद्वदनावतारश्रीमद्वल्लभाचार्यचरणप्रणीतः बालबोधः । नत्वा हरिं सदानन्दं सर्वसिद्धान्तसङ्ग्रहम् । बालप्रबोधनार्थाय वदामि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाख्याश्चत्वारोऽर्था मनीषिणाम् । जीवेश्वरविचारेण द्विधा ते हि विचारिताः ॥ २ ॥ अलौकिकास्तु वेदोक्ताः साध्यसाधनसंयुताः । लौकिका ऋषिभिः प्रोक्तास्तथैवेश्वरशिक्षया ॥ ३ ॥ लौकिकांस्तु प्रवक्ष्यामि वेदाद्याद्या यतः स्थिताः । धर्मशास्त्राणि नीतिश्च कामशास्त्राणि च क्रमात् ॥ ४ ॥ त्रिवर्गसाधकानीति न तन्निर्णय उच्यते । मोक्षे चत्वारि शास्त्राणि लौकिके परतः स्वतः ॥ ५ ॥ द्विधा द्वे द्वे स्वतस्तत्र सांख्ययोगौ प्रकीर्तितौ । त्यागात्यागविभागेन सांख्ये त्यागः प्रकीर्तितः ॥ ६ ॥ अहन्ताममतानाशे सर्वथा निरहङ्कृतौ । स्वरूपस्थो यदा जीवः कृतार्थः स निगद्यते ॥ ७ ॥ तदर्थं प्रक्रिया काचित् पुराणेऽपि निरूपिता । ऋषिभिर्बहुधा प्रोक्ता फलमेकमवाह्यतः ॥ ८ ॥ अत्यागे योगमार्गो हि त्यागोऽपि मनसैव हि । यमादयस्तु कर्त्तव्याः सिद्धे योगे कृतार्थता ॥ ९ ॥ पराश्रयेण मोक्षस्तु द्विधा सोऽपि निरूप्यते । ब्रह्मा ब्राह्मणतां यातस्तद्रूपेण सुसेव्यते ॥ १० ॥ ते सर्वार्था न चाऽन्येन शास्त्रं किञ्चिदुदीरितम् । अतः शिवश्च विष्णुश्च जगतो हितकारको ॥ ११ ॥ १ "अतः" इति पाठः श्रीपुरुषोत्तमचरणानाम् ।
बालबोधः । वस्तुनः स्थितिसंहारौ कार्यों शास्त्रप्रवर्त्तकौ । ब्रह्मैव तादृशं यस्मात् सर्वात्मकतयोदितौ ॥ १२ ॥ निर्दोषपूर्णगुणता तत्तच्छास्त्रे तयोः कृता । भोगमोक्षफले दातुं शक्तौ द्वावपि यद्यपि ॥ १३ ॥ भोगः शिवेन मोक्षस्तु विष्णुनेति विनिश्चयः । लोकेऽपि यत्प्रभुर्भुङ्क्ते तन्न यच्छति कर्हिचित् ॥ १४ ॥ अंतिप्रियाय तदपि दीयते क्वचिदेव हि । नियतार्थप्रदानेन तदीयत्वं तदाश्रयः ॥ १५ ॥ प्रत्येकं साधनञ्चैतद् द्वितीयार्थे महाञ्छ्रमः । जीवाः स्वभावतो दुष्टा दोषाभावाय सर्वदा ॥ १६ ॥ श्रवणादि ततः प्रेम्णा सर्वं कार्यं हि सिद्ध्यति । मोक्षस्तु सुलभो विष्णोर्भोगश्च शिवतस्तथा ॥ १७ ॥ समर्पणेनाऽऽत्मनो हि तदीयत्वं भवेद्ध्रुवम् । अतदीयतया चाऽपि केवलञ्चेत्समाश्रितः ॥ १८ ॥ तदाश्रयतदीयत्वबुद्ध्यै किञ्चित्समाचरेत् । स्वधर्ममनुतिष्ठन् वै भारद्वैगुण्यमन्यथा ॥ १९ ॥ इत्येवं कथितं सर्वं नैतज्ज्ञाने भ्रमः पुनः ॥ १९½ ॥ इति बालबोधः समाप्तः । १ 'वस्तुस्थितौ च संहारे कार्ये' "इति क्वचित्पाठः" इत्युक्तं श्रीदेवकीनन्दनचरणैः स्वटीकायाम् । वस्तुनः स्थितिसंहारे कार्ये इत्यपिपाठः क्वचिदितिप्रोक्तं श्रीपुरुषोत्तमचरणैः । २ अतः प्रियायेति पाठः श्रीद्वारकेशचरणानाम् । ३ स दाचेरत् इतिपाठः श्रीपुरुषोत्तमचरणानां श्रीदेवकीनन्दनचरणानाञ्च ।
श्रीकृष्णाय नमः । श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः । श्रीमदाचार्यचरण कमलेभ्यो नमः । श्रीमद्भगवद्वदनावतारश्रीमद्वल्लभाचार्यचरणप्रणीतः बालबोधः । श्रीदेवकीनन्दनचरणकृतप्रकाशव्याख्योपेतः । यच्चमत्कृतिरेवाऽन्तर्निरस्यति तमः स्मृता । अलङ्कुर्वन्तु मद्वाचमाचार्यचरणत्विषः ॥ १ ॥ यदाश्रयवतामेव बल्लवीजनवल्लभः । प्रसीदति विनोपायैर्विट्ठलेशं तमाश्रये ॥ २ ॥ पितृपादाम्बुजयुगं भक्त्या नत्वा मुहुर्विधा । मतिं स्वामनतिक्रम्य बालबोधो विचार्यते ॥ ३ ॥ भक्तिमार्गे फलं कृष्णस्तदास्वादस्तु दुर्लभः । जीवानामत एवाऽन्यमतेषूत्पद्यते रतिः ॥ ४ ॥ तत्प्रेरितेन रुद्रेण मतान्युक्तानि वै कलौ । विशेषतः प्रवर्तन्ते स्वातन्त्र्यं न यतो नृणाम् ॥ ५ ॥ तत्तत्फलप्रशंसैव तत्र तत्र निरूप्यते । तन्मोहवशतो लोकः परिभ्रमति केवलम् ॥ ६ ॥ अतः कदाऽपि कृष्णस्य भजनं लभते न सः । फलाभावाद्दैवसृष्टिर्व्यर्था भवति सर्वथा ॥ ७ ॥ 'दैवी सम्पद्विमोक्षाये'त्युक्तिस्तर्हि विरुध्यते । अतः करुणया बालबोधमग्निश्चकार हि ॥ ८ ॥ अष्टादशानामत्र श्रीभगवद्वचसामपि । पुराणानां स्मृतीनां च प्रामाण्यज्ञापनाय हि ॥ ९ ॥ १ तद्विशेषा इति क.
तावन्तः कथिताः श्लोका आद्येनोपक्रमस्तथा । अन्तेऽर्द्धेनोपसंहारस्तेन सार्द्धोनविंशतिः ॥ १० ॥ अथ मतान्तरेषु पुरुषार्थचतुष्टयस्य फलत्वेन कथनात्तदर्थितया जीवानां प्रवृ- त्तेर्भक्तेर्गौरवमसहिष्णुवस्तन्मार्गप्रकटनायोक्तचतुष्टयस्याऽपुरुषार्थत्वं समर्थयन्तः कि- ञ्चित्स्वमतं वक्तुमादौ विघ्नाभावाय समझलं तद्दिशन्ति नत्वेति । नत्वा हरिं सदानन्दं सर्वसिद्धान्तसङ्ग्रहम् । बालप्रबोधनार्थाय वदामि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥ हरिं सदानन्दं नत्वा सर्वसिद्धान्तसङ्ग्रहं वदामीति पदसम्बन्धः । हरिपदेन दुःखाभावसम्पादनपाटवोक्त्या समारब्धान्तरायापायः सूचितः । सदानन्दपदेन 'कृषि- र्भूवाचकः शब्द' इति निरुक्तेः सुखरूपः श्रीकृष्ण उक्तः । 'तेन दुःखाभावः सुखं चेति पुरुषार्थद्वयं' निष्प्रत्यूहं ततः सिद्ध्यतीति तं नत्वेत्युक्तम् । स्वसिद्धान्तैर्निर्गलितमर्थ- मिममेवाऽग्रे निर्णेतुमारभन्ते सर्वसिद्धान्तसङ्ग्रहं वदामीति । सर्वानपि सिद्धान्ता- न्सङ्गृह्य एकीकृत्य वदामीत्यर्थः । यद्वा, सर्वेषामपि तेषां सम्यगिदमित्थतया ग्रहो ज्ञानं येन तादृशं ग्रन्थं तथेत्यर्थः । यद्यपि तत्तच्छास्त्रैरपि तत्तन्मतपरिज्ञानं भवति, तथापि भ्रान्तिसंवलितमेव, तद्वक्तॄणां प्रतारकत्वात् । तत्र च हेतुरग्रे वक्ष्यते— 'तथैवेश्वरशिक्षये'ति । अत्र तु तन्निवृत्तिपूर्वमिति ज्ञाने सम्यक्त्वमुक्तम् । तदपि हेयत्वेन न तूपादेयत्वेनेवि ज्ञेयम्, स्वमार्गविरोधित्वात् । ननु किं तादृशप्रयासेन, प्रयोजनाभावात् , अत आहुर्बालप्रबोधनार्थायेति । बाला हि स्वतः शास्त्रतो वेष्टाऽनिष्टविचाररहिताः केनचित्प्रतारणार्थमिष्टेऽनिष्टत्वेऽनिष्टेऽपीष्टत्व उच्यमाने तत्र भ्रान्तास्तमेवाऽनुवर्तन्ते । पुनः पित्रादिना तद्गुणदोषवर्णने कृते तद्भ्रममपहाय तत्प्र- दर्शितं स्वहितवर्त्म गृह्णन्ति । न तु तेषामुभयत्र स्वाभाविकं ज्ञानं प्रयोजकमस्ति । परं वातादिकृतसहजभ्रमरहिताश्चेत्, तादृशानामप्रतीकार्यत्वादिति । तादृशा आसु- रत्वादिस्वभावदोषरहिता मोहशास्त्रैः परिभ्रामिता न भक्तिपदवीमनुसरन्ति जीवाः, ते बाला इत्युच्यन्ते । तेषां प्रकर्षेण बोधनं स्वमतज्ञानलक्षणं, तदर्थायेत्यर्थः । पुनरतथा त्वाय बोधने प्रकर्ष उक्तः । पित्रादिवत्स्वस्य तत्प्रबोधनमावश्यकमिति ज्ञापयितुमपि तेषां बालत्वमुक्तम् । अन्यथा दैवसर्गस्य फलराहित्येन वैयर्थ्यं स्यात् । उक्तं च “दैवी सृष्टिव्यर्था च भूयान्निजफलरहिते”ति । ननु किमेतदुच्यमानं प्रमाणसिद्धमुत स्वबुद्धिकल्पितमित्यत आहुः सुनिश्चितमिति । १ सुष्ठु वेदादिप्रमाणैर्विशेषेण स्वस्य वागधिपतित्वात्स्वबुद्ध्या च निश्चितं निर्णीतमित्यर्थः ॥ १ ॥ १ निष्कलितमिति क.
श्रीदेवकीनन्दनचरणकृतप्रकाशव्याख्योपेतः । ३ प्रथमं मतान्तरीयपुरुषार्थचतुष्टयस्याऽनुपादेयत्वकथनाय वैदिकचतुष्टयभिन्न- त्वमुपपत्त्या निर्द्धारयन्ति धर्मार्थकाममोक्षाख्या इति । धर्मार्थकाममोक्षाख्याश्चत्वारोऽर्था मनीषिणाम् । जीवेश्वरविचारेण द्विधा ते हि विचारिताः ॥ २ ॥ एते चत्वारो मनीषिणां विदुषामर्थाः पुरुषार्था इत्यर्थः । वस्तुतस्तु पुरुषार्थ- त्वेन भक्तिमार्गीया एव धर्मादयश्चत्वारो गण्यन्ते, न त्वितरे । 'अनिमित्ता भाग- वती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी'त्यादिवचनैर्भक्तेरेव सर्वतोऽधिकत्वश्रवणात् । अन्येषां धर्मादिसंज्ञामात्रमिति ज्ञापनायाऽऽख्यापदम्, अपुरुषार्थताज्ञापनाय पुरुषपदप्रयोगा- भावश्चोक्तः । मनीषिणामित्यनेन सर्वानधिकारित्वाच्च तथेति ज्ञापितम् । भक्तौ तु 'देवोऽसुरो मनुष्यो वे'ति सामान्यनिर्देशादुक्तदूषणाभावः स्फुटः । किञ्च । काला- दीनामङ्गत्वेन तदशुद्ध्या धर्मादयः पुरुषार्था इति तु वार्त्तामात्रम्, स्वरूपासिद्धेः । भक्तेस्तु भगवदनुग्रहैकजन्यत्वेन तत्स्वरूपसिद्धौ न तेषामङ्गत्वेति न तदशुद्धेर्बाधक- त्वम् , प्रत्युत तेषामनुगुणत्वमेव । तदुक्तम्, 'कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुण ' इति । 'कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञाः सारभागिन ' इति च । तेन भक्ति- रेव परमपुरुषार्थ इति निरूपितम् । ननु वेदानामीश्वरवाक्यत्वेन तत्प्रतिपादितानां तेषां कथमतथात्वमिति चेत्, तत्राऽऽहुः जीवेश्वरविचारेणेति । ते धर्मादयो जीव- विचारेणेश्वरविचारेण च द्विधा द्विप्रकारका विचारिता भिन्ना इत्यर्थः । तेन जीव- विचारितानामेवाऽपुरुषार्थता न त्वीश्वरविचारितानामिति ध्वन्यते । ईश्वरोक्तानां तु पुरुषार्थता परं मर्यादायामिति ज्ञेयम् । पुष्टौ तेषामप्यनपेक्ष्यत्वात् । हिशब्दोऽत्र युक्तार्थतां सूचयति । न हि पूर्णज्ञानवद्विचारितस्याऽल्पज्ञानवद्विचारितस्य चैक्यं भवितुमर्हति, भिन्नविषयत्वात् ॥ २ ॥ तदग्रे स्पष्टीकुर्वन्त्यलौकिकास्त्विति । अलौकिकास्तु वेदोक्ताः साध्यसाधनसंयुताः । लौकिका ऋषिभिः प्रोक्तास्तथैवेश्वरशिक्षया ॥ ३ ॥ वेदोक्ता ईश्वरविचारिता अलौकिका न लोकविषया इत्यर्थः । अन्येषाम- लौकिकत्वव्यावृत्त्यर्थं तुशब्दः। ननु वेदे यज्ञात्मको धर्मः' तस्य च "अग्निष्टोमेन स्वर्ग- कामो यजेते"त्यादिभिः स्वर्गसाधकत्वमुच्यते । स च स्वर्गो लोक एवेति कथम- लौकिकत्वमिति चेत्, सत्यम् न हि वेदे स्वर्गशब्देन लोकं उच्यते । "यन्न दुःखेन सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीतं च तत्सुखं स्वःपदास्पदम"ति १ उक्तामिति क. २ लौकिक इति क.
४ बालबोधः ।
लक्षणाप्रवेशात् । किन्त्वात्मसुखमेव तादृशम्, तच्चाऽलौकिकमिति नोक्तमनुपपन्नम् । एतन्निबन्धे विवृतमिति विस्तरेण ततोऽवगन्तव्यम् । नन्वेवमपि फलस्याऽलौकिकत्व- मायाति । न तु स्वरूपतो यागादेस्तत्साधनानां वा तथात्वं वक्तुं युक्तम्, स्वकृति- साध्यत्वादित्यत आहुः साध्यसाधनसंयुता इति । साध्या यागादयस्तत्साधनानि च तैः सहिता एवाऽलौकिका इत्यर्थः । “यज्ञो वै विष्णुिरिति” श्रुतेः ससाधनस्य तस्य भगवद्रूपत्वात्तथोच्यत इति भावः । तदुक्तं निबन्धेऽपि “तत्पाधनं च स हरिः प्रयाजादि सुगादि यदि”१ति । अत एवाऽर्थस्याऽपि धर्मसाधनत्वेनाऽलौकिकत्वमिति ज्ञेयम् । तदसाधकस्य नाशहेतुत्वादपुरुषार्थतैव । अर्थस्य धर्मसाधनत्वं निबन्धे निरूपितम्, “धर्मो ह्यर्थेन साधित” इति । तेन धर्मेणाऽर्थोऽर्थेन कामः कामेन मोक्ष इति क्रमोऽत्र नोररीकृतः । कामस्य तु दृष्टान्तत्वेन वैराग्यजनकत्वेन च मोक्षसाधकत्वात्तथात्वमिति विवेकः । ननु यथा धर्मसाधनत्वेनाऽर्थस्य मोक्षसाधन- त्वेन च कामस्य पुरुषार्थता, तथाऽऽत्मसुखसाधनत्वेन धर्मस्य तथात्वं न स्वतः । अतः को विशेषस्त्रयाणामिति चेद्, उच्यते । वेदे हि काण्डद्वयम् । तत्र पूर्वकाण्डे यज्ञात्मको धर्मः साक्षादात्मसुखसाधनत्वेन पुरुषार्थ इति स्तूयते । तथोत्तरकाण्डे साक्षान्मोक्ष- साधनत्वेन ज्ञानमपि । तथा परम्परयैकत्र साधनमर्थोऽपरत्र कामः । एवं साक्षा- त्परम्पराभेदकृतो विशेषो धर्मस्योभाभ्याम् । कामस्य विषयसुखात्मकत्वमाश्रित्य तथा व्याख्यातम् । वस्तुतः पुरुषार्थद्वयमात्मसुखं मोक्षश्चेति निर्णयः । तथा च तत्त्व- दीपे, “दुःखाभावः सुखं चैव पुरुषार्थद्वयं मतम्”ति । अतो मोक्षकामयोः साक्षात्पुरुषा- र्थता । तत्साधनत्वेन धर्मस्य । धर्मसाधनत्वेनाऽर्थस्य च परम्परया पुरुषार्थतेति सिद्धम् । अत्र कामशब्देनाऽऽत्मसुखमुच्यते । विषयसम्बन्धिनः साक्षात्पुरुषार्थतानुपपत्तेः । जीवविचारितानाहुलौकिका इति । ऋषिभिः प्रोक्ता लौकिका इत्यर्थः, जीवबुद्धि- विषयत्वात् । ननु तेऽपि वेदार्थविदः कथमीश्वरविचारादन्यथा कथयन्ति । किञ्च । तदुक्तस्याऽपि वेद एव मूलं भवति । अन्यथाऽप्रामाणिकत्वप्रसङ्गादित्याशङ्कयाऽऽहु- स्तथैवेश्वरशिक्षयेति । यथा ते कथयन्ति तथैवेश्वरस्य नियामकस्य प्रेरणलक्षणा शिक्षा, तया तथेत्यर्थः । एवकारेण प्रकारान्तरेण प्रेरणं कथनं वा व्यावत्र्त्यते । शिक्षा- प्रयोजनं तु “त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारये”त्यत्र निरूपितम् । वस्तुतो वेदतात्पर्यपरिचयो ज्ञानवतामपि दुर्लभः । “तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरय” इति वचनात् । अतस्तेषामनीश्वरविचारितत्वादनङ्गीकारः सूचितः ॥ ३ ॥
१ श्रूयत इति क. ग.
श्रीदेवकीनन्दनचरणकृतप्रकाशव्याख्योपेतः। ५ एवमीश्वरजीवविचारभेदेन धर्मादिचतुर्णां द्वैविध्यमुक्त्वा विस्तरेण लौकिकान् वक्तुमुपक्रमन्ते लौकिकानिति । लौकिकांस्तु प्रवक्ष्यामि वेदादाया यतः स्थिताः । धर्मशास्त्राणि नीतिश्च कामशास्त्राणि च क्रमात् ॥ ४ ॥ त्रिवर्गसाधकानीति न तन्निर्णय उच्यते । मोक्षे चत्वारि शास्त्राणि लौकिके परतः स्वतः ॥ ५ ॥ द्विधा द्वे द्वे स्वतस्तत्र सांख्ययोगौ प्रकीर्तितौ । त्यागात्यागविभागेन सांख्ये त्यागः प्रकीर्तितः ॥ ६ ॥ लौकिकान् प्रकर्षेण वक्ष्यामीत्यर्थः । तुशब्दस्त्वलौकिककथनापेक्षां व्यावर्त- यति । तत्रोपपत्तिमाहुर्वेदाद्या इति । यतो यस्माद्धेतोराद्या ईश्वरविचारितास्ते वेदाद्वेदस्य विद्यमानत्वात्तत एव स्थिताः प्रवर्त्तमानाः सन्त्यतस्तानविहाय लौकिकाः कथ्यन्त इति भावः । किञ्च, स्थिता इति पदेन गतिनिवृत्तिः सूच्यते । धात्वर्थस्य तथात्वात् । तथाचाऽधुना प्रवृत्त्यभावेन तत्कथनप्रयोजनाभाव उक्तः । अतो लौकि- कानामेव वक्तव्यत्वात्तन्मध्ये त्रिवर्गनिर्णयस्याऽनावश्यकत्वमाहुर्धर्मशास्त्राणीति । धर्मशास्त्राणि मन्वादीनि। नीतिः नीतिप्रतिपादकमर्थशास्त्रम् । कामशास्त्राणि वात्स्या- यनादीनि । क्रमात्प्रत्येकं त्रिवर्गस्य धर्मादित्रितयस्य साधकानि सन्ति । चकारद्वयेन तत्तन्निर्णयग्रन्था अपि सङ्गृह्यन्ते । इति हेतोस्तन्निर्णयोऽत्र नोच्यते प्रयोजनाभावादिति भावः । मोक्षनिर्णयस्याऽऽवश्यकत्वायाऽऽहुर्मोक्षे चत्वारि शास्त्राणीति । लौकिके जीवविचारिते मोक्षे चत्वारि शास्त्राणि साधकानि सन्तीत्यर्थः । यद्यपि धर्मादिशा- स्त्राणामपि बहुत्वं, तथापि देशाद्याचारभेदेन विरोधाभावात्तत्समाहितिर्भवति । मोक्षस्तु पुरुषार्थरूप इति तस्य चतुर्द्धा कथने भ्रमो भवति, स न युक्त इति तन्निरासाय निर्णीयत इति भावः । तस्य चातुर्विध्यव्यवस्थामारहुः परतः स्वतः इति । परतः स्वतश्चेति द्विधा द्विप्रकारके द्वे द्वे शास्त्रे स्त इत्यर्थः । अत्राऽयमर्थः । शास्त्रद्वयं स्वतो मोक्षसाधकम् । शास्त्रद्वयं परतश्चेति । यत्र शास्त्रोक्तरीत्या साधनाचरणे कृते जीवः कृतार्थो भवति तत्स्वतःशास्त्रमुच्यते । यत्र तदुक्तरीत्या साधनेऽकृतेऽपि कस्यचित्प्र- सादात्कृतार्थो भवति तत्परतः शास्त्रमुच्यते । उभयोर्द्वैविध्याच्चत्वारि तानि भवन्ति । यद्वा, परतः स्वतश्चेति द्विप्रकारके लौकिके मोक्षे द्वे द्वे ते स्त इति । अस्मिन्नर्थेऽयं भावः । लौकिको मोक्षो हि स्वरूपतो द्विविधः । स्वाश्रयः पराश्रयश्चेति । यत्राऽवि- १ अत इत्यारभ्य मुक्तो भवतीति भाव इत्यन्तो निबन्ध एव नास्ति सार्धद्वयस्य, कपुस्तके । २ तर्हीति ख. ३ कृतेऽपीत्यवग्रहशून्यः सर्वत्रोपलब्धः पाठः । भातीत्यवग्रहोऽपीति तथैव निवेशः ।
६ बालबोधः । विद्यानिवृत्तौ सत्यामद्वैतं ब्रह्म भासते, तत्र जीवब्रह्मणोरभेदात्प्रतिबिम्बन्यायेन जीवः स्वाश्रये ब्रह्मणि लीयते । स स्वाश्रयो मोक्ष इत्युच्यते । यत्र पुनरविद्यानिवृत्तौ शुद्धो जीवः परस्मिन्ब्रह्मणि लीयते तत्राविद्यानिवृत्तावपि भेदस्वीकारात्पराश्रय इत्युच्यते । तयोरपि प्रतिपादके द्वे द्वे ते स्त इति मोक्षे चातुर्विध्यम् । तत्र प्रथमं स्वतस्ते आहुः स्वतस्तत्रेति । तत्र तेषां मध्ये स्वतः शास्त्रभूतौ सांख्ययोगौ प्रकीर्त्तितौ प्रकर्षेण कथितावित्यर्थः । यद्यपि "यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यत" इति वाक्यादुभयोरेकमेव फलमिति न भेदो वक्तुमुचितस्तथापि जीव- विचारेणोच्यमानत्वात्तदनुसारेणोभयोर्भेदं व्यवस्थापयन्ति त्यागात्यागविभागे- नेति । साङ्ख्ये त्यागोऽपरत्राऽत्याग इति विभागेन भेद इत्यर्थः । तदेव स्पष्टयन्ति- साङ्ख्ये त्याग इति । साङ्ख्ये मुक्तिसाधनत्वेन त्यागः प्रकीर्तित इत्यर्थः । साङ्ख्ये हि नित्यानित्यवस्तुविवेकः प्रतिपाद्यते । तस्मिन्सम्पन्ने वैराग्योत्पत्तौ ततः सर्वपरि- त्यागेन मुक्तो भवतीति भावः ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥ ननु सङ्घातस्य विद्यमानत्वात्कथं त्यागमात्रेण मुक्तिरित्याशङ्कायां तन्मुक्ति- प्रकारमाहुरहन्ताममतानाश इति । अहन्ताममतानाशे सर्वथा निरहङ्कृतौ । स्वरूपस्थो यदा जीवः कृतार्थः स निगद्यते ॥ ७ ॥ तदर्थं प्रक्रिया काचित् पुराणेऽपि निरूपिता । ऋषिभिर्बहुधा प्रोक्ता फलमेकमवाहतः ॥ ८ ॥ अहन्ताममतात्मकः संसारः, तत्राऽविद्यया जीवो बद्धस्तिष्ठति । साङ्ख्ये चाऽऽत्मानात्मविवेकेनाऽविद्यानिवृत्तिर्भवति । तस्यां निवृत्तायां तत्कार्यरूपः संसा- रोऽपि नश्यति । ततः सङ्घाताद्भिन्नतया आत्मज्ञानमुत्पद्यते । एवमपि सति यावदह- ङ्कारनिवृत्तिर्न भवति तावदपि न सर्वात्मना मुक्तिरित्याभिप्रायेणाऽऽहुः सर्वथा निरहङ्कृताविति । सर्वथा सर्वप्रकारेण "नैव किञ्चित्करोमी"त्यहङ्काराभावे सती- त्यर्थः । ततो मुक्तिस्वरूपमाहुः स्वरूपस्थ इति । यदैव जीवः सर्वं परित्यज्य स्वरूपस्थः स्वात्मज्ञानैकनिष्ठो भवति तदा तदवस्थापन्न एव स कृतार्थो मुक्त इति निगद्यते कथ्यत इत्यर्थः । वस्तुतस्तु ब्रह्मलाभस्य मोक्षपदार्थत्वेन तदभावान्न मुक्त इति भावः, पुनर्जन्मावश्यम्भावाच्च । तदुक्तं दशमस्कन्धे, "आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं, १ तत्र निवृत्तावपीति ग. २ सांख्येनाऽऽत्मनात्मेत्यादि क, ३ मुक्तस्वरूपमिति ख. ४ पुनर्जन्मावश्य- म्भाविवाच्चेति ग,
श्रीदेवकीनन्दनचरणकृतप्रकाशव्याख्योपेतः । ७ ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रय" इति । तथा च तच्चदीपविवृतौ, "जन्मान्तरे ज्ञानी ज्ञानी सञ्जुत्पद्यत " इति ॥ ७ ॥ नन्वेवं सति जीवविचारितस्य साङ्ख्यस्य कथं प्रामाण्यमित्यपेक्षायामाहुस्तद- र्थमिति । तदर्थमुक्तरीत्या मोक्षार्थं काचित्प्रक्रिया पुराणेऽपि निरूपिता कथिते- त्यर्थः । तेन पुराणमूलकत्वात्प्रामाण्यं तस्येति भावः। ननु "पुराणं हृदयं स्मृतमि"ति वाक्यात्तन्मूलकस्य कथं जीवविचारितत्वमित्यत आहुः, ऋषिभिरिति । ऋषिभिः सा प्रक्रिया बहुधा बहुभिः प्रकारैर्भिन्ना प्रोक्ता स्वविचारादतस्तथेत्यभि- प्रायः । तत्र हेतुः पूर्वमुपपादितः, " तथैवेश्वरशिक्षये"ति । तर्हि साधनप्रकारभे- दात्फलं भिन्नं भविष्यतीत्याशङ्क्य तथा नेत्याहुः फलमेकमिति । पुराणोक्तस्य साङ्ख्यस्य फलद्वयम् । प्रथममात्मदर्शनमेकम् । ततो ज्ञानद्वारा मोक्षो द्वितीयम् । जीवविचारितस्य तस्याऽऽत्मदर्शनमेकमेव फलं न द्वितीयमित्यर्थः । तत्रापि विशेष- माहुरबाह्यत इति । बाह्यो बहिर्मुखो निरीश्वरो विकर्मपरिपोषितश्च साङ्ख्यः । तदतिरिक्तात्पुराणमूलकात्साङ्ख्यादुक्तं फलं, न तु बाह्यादिति भावः । प्रत्युत तादृ- शान्नरकः, वेदविरोधित्वात् । तदुक्तं तत्त्वदीपे, "योगसाङ्ख्ये धर्महीने विमार्ग- परिपोषिते, नरकायैव भवत" इति ॥ ८ ॥ अत्यागे योगमार्गो हि त्यागोऽपि मनसैव हि । यमादयस्तु कर्त्तव्याः सिद्धे योगे कृतार्थता ॥ ९ ॥ एवं स्वतःशास्त्रमेकमुक्त्वा द्वितीयमाहुरत्यागे योगमार्ग इति । त्यागाभावे योगमार्गो योगप्रतिपादकं शास्त्रं मोक्षप्रतिपादकमित्यर्थः । ननु त्यागव्यतिरेकेण कथं योगः सिद्धयेदित्याशङ्कयाऽऽहुरत्यागोऽपीति । न हि सर्वात्मना त्यागो निषि- ध्यते । मनसा तु सर्वं त्यक्तव्यमेव । अन्यथा योगो न सिद्धयेदिति । मनसा सर्व- परित्यागे सम्पन्ने बहिस्त्यागो नाऽपेक्षित इत्येवकारेण तद्व्यवच्छेद उक्तः । युक्तो- ऽयमर्थ इति हिशब्द आह । ननु मनसश्चञ्चलत्वाद्वहिस्त्यागाभावे कथं तन्निरोधो भवतीत्यत आहुर्यमादयस्तु कर्त्तव्या इति । यमा द्वादशविधाः । तदुक्तमेका- दशस्कन्धे "अहिंसे"त्यारभ्य "द्वादश स्मृता" इत्यनेन । आदिपदेन तत्रोक्ताः शमदमादयो ग्राह्याः । तेषु कृतेषु मनः स्थिरीभवतीति भावः । तदुक्तं श्रीकपिलदेवेन-- "अत एव शनैश्चित्तं प्रसक्तमसतां पथि । भक्तियोगेन तीव्रेण विरक्त्या च नयेद्वशम् । यमादिभिर्योगपथैरि"त्यादि । भक्त्या भगवदतिरिक्तविषयविरक्त्या च
१ त्याग इति ग.
८ बालबोधः । भक्तिमार्गे तद्वशीकरणमुक्त्वा यमादिभिर्योगपथैरिति योगमार्गे तैरेव वशीकरणं भवतीत्युक्तम् । अत एवाऽवश्यकर्त्तव्यत्वाय योगपथैरिति विशेषणम् । तुशब्देना- ऽकरणपक्षो व्यावत्र्त्यते । प्रकारान्तरेण तदसिद्धेः । ततः किमित्यत आहुः सिद्धे योगे कृतार्थतेति । योगसिद्धौ कृतार्थो भवतीत्यर्थः । कथमिति चेद्, एवम् । यावज्जीवं योगाभ्यासे कृते स्वात्मज्ञानोदयो भवति । “अयं हि परमो धर्मो यद्योगेनाऽऽत्मद- र्शनमि”ति वाक्यात् । ततो योगबलेनैव देहापगमे अविद्यातो विमुच्यते । न त्वितोऽधिकं फलमित्यर्थः । अयमेव केवलयोगसाध्यो मोक्षः । तथा तत्त्वदीपेऽपि, “केवलेनाऽपि योगेन दग्धकर्ममलाशयः । योगवीर्येण जितहृक् लिङ्गं भित्त्वा तथा भवेदि”ति । अत्राऽपि ब्रह्मलाभाभावान्न कृतार्थतेति भावः ॥ ९ ॥ एवं स्वतः शास्त्रद्वयमुक्त्वा परतः शास्त्रद्वयमाहुः पराश्रयेणेति । पराश्रयेण मोक्षस्तु द्विधा सोऽपि निरूप्यते । ब्रह्मा ब्राह्मणतां यातस्तद्रूपेण सुसेव्यते ॥ १० ॥ परशब्देन विष्णुशिवावुच्येते । तयोराश्रयेण तद्भजनेन मोक्षो द्विधा तत्तच्छास्त्रभेदात् द्विप्रकारको भवति । सोऽप्यत्र निरूप्यते कथ्यत इत्यर्थः । तुशब्दः स्वाश्रयपक्षव्यावर्त्तकः । स्वाश्रयापेक्षया पराश्रयस्याऽऽधिक्यं भक्तिमार्गे भविष्यतीति तदभावायाऽपिशब्देनाऽनादरः सूचितः । ननु ब्रह्मणा किमपराद्धम् । गुणावतार- त्वेन त्रयाणामविशेषात्ततोऽपि कथं न मुक्तिरित्यत आहुर्ब्रह्मेति । ब्रह्मा ब्राह्मणतां यातः प्राप्त इत्यर्थः । यथा ब्राह्मणो निरन्तरं स्ववर्णाश्रमादिविहितं कर्म कुर्वन् स्वार्थमेव सम्पादयति, न तद्विरुद्धमन्यार्थमपि । तथा ब्रह्माऽपि भगवदाज्ञप्तं सृष्टिलक्षणं कर्म करोति । स चेत्पुरुषार्थान्प्रयच्छेत्सर्वमुक्तिरेव स्यात् । तथा सति सृष्टिरुच्छि- द्येत । अतः समर्थोऽपि न ददातीति भावः । किञ्च । तद्रूपेण सृष्टिकर्त्तृरूपेण सुसे- व्यते । परं प्रजाकामैरेव न त्वन्यैरिति विशेषः । “प्रजाकामः प्रजापतीनि”ति वाक्यात् ॥ १० ॥ अत आहुस्ते सर्वार्था न चाऽऽद्येनेति । ते सर्वार्था न चाऽऽद्येन शास्त्रं किञ्चिदुदीरितम् । अतः शिवश्च विष्णुश्च जगतो हितकारकौ ॥ ११ ॥ वस्तुनः स्थितिसंहारौ कार्यौ शास्त्रप्रवर्त्तकौ । ब्रह्मैव तादृशं यस्मात् सर्वात्मकतयोदितौ ॥ १२ ॥ निर्दोषपूर्णगुणता तत्तच्छास्त्रे तयोः कृता । भोगमोक्षफले दातुं शक्तौ द्वावपि यद्यपि ॥ १३ ॥
श्रीदेवकीनन्दनचरणकृतप्रकाशव्याख्योपेतः। ९ भोगः शिवेन मोक्षस्तु विष्णुनेति विनिश्चयः । लोकेऽपि यत्प्रभुर्भुङ्क्ते तनं यच्छति कर्हिचित् ॥ १४ ॥ आद्येन ब्रह्मणा चत्वारोऽपि ते न भवन्तीत्यर्थः । चकारेण क्वचिदर्थकामौ ततो भवतोऽपि, हिरण्यकशिपुप्रभृतीनामिव । परं न तयोः पुरुषार्थता, नाशहेतुत्वा- दिति ज्ञापितम् । मोक्षस्तु नैवेति विवेकः । ननु ब्रह्मप्रतिपादितवैखानसमतानुसारेण विष्णुभजनान्मोक्षश्चेत्कथं नैवेत्युच्यत इत्यत आहुः शास्त्रं किञ्चिदुदीरितमिति । न हि शास्त्रप्रवर्त्तकत्वेन मोक्षस्ततो वक्तुं शक्यः । तथा सत्यतिप्रसङ्गः स्यात् । एवमाद्यस्य पुरुषार्थदत्वं निषिध्येतरयोस्तत्प्रदत्वमाहुरत इति । यतो हेतोराद्यस्याऽतत्प्रदत्वमतो हेतोः शिवश्च विष्णुश्च जगतः सृष्टेः हितकारकौ पुरुषार्थप्रदावित्यर्थः । यद्यप्य- नयोरपि स्वस्वकार्यपरता, तथाऽपि विष्णोः पालनं कार्यमतः “अधिकं तत्राऽनुप्रविष्टं न तु तद्धानिरि”ति न्यायेन मोक्षदाने न काऽपि क्षतिः । शिवस्य तु कार्यं संहारः । तदविरोधात्त्रिवर्गदाने न काऽपि क्षतिः । मोक्षदाने तु नोपसंहारः कर्तुं शक्य इति कार्यविरोधात्क्षतिः । अतस्तदग्रे निराकरिष्यन्ति ‘भोगः शिवेने’त्यादिना ॥ ११ ॥ तयोर्विशेषकार्यमप्याहुर्वस्तुन इति । वस्तुमात्रस्य स्थितिः संहारश्चोभौ तयोः कार्यौ कर्त्तव्यौ भवत इत्यर्थः । ‘वस्तुस्थितौ च संहारे कार्ये’ इति क्वचित्पाठः । तदा वस्तुस्थितिलक्षणे संहारलक्षणे च कार्ये तौ नियामकाविति योजनीयम् । किञ्च । स्वस्वगुणाधिकारकशास्त्रप्रवर्त्तकौ च । ननु तच्छास्त्रेषु तयोः सर्वात्मकत्वकथनात्कथ- मेकैककार्यकर्त्तृत्वमिति चेत्तत्राऽऽहुर्ब्रह्मैवेति । यस्माद्धेतोर्ब्रह्मैव तादृशं तत्तत्कार्यार्थं तत्तद्रूपेण प्रकटं तत्तत्सञ्ज्ञया भिन्नमिव भाति । न तु वस्तुतस्तथा । अतस्तत्र तत्र सर्वात्मकतया कथितावित्यर्थः । उक्तहेतोरेव तत्र तत्र तयोर्निर्दोषपूर्णगुणता च क्लृप्ता प्रतिपादितेत्यर्थः। वस्तुतो निर्दोषपूर्णगुणत्वं सर्वात्मकत्वं च परब्रह्मणः श्रीकृष्ण- स्यैवेति दिक् । तथा चोक्तं प्रथमस्कन्धे, ‘परः पुरुष एक इहाऽस्य धत्ते स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहरेति संज्ञा’ इति । दशमेऽपि, ‘त्वन्मायया संवृतचेतसस्त्वां पश्यन्ति नाना न विपश्चितो ये’ इति । अत एवोभयोः स्वस्वगुणानुगुणं फलदातृत्वमाहु- र्भोगमोक्षफले इति । यद्यपि भगवद्गुणावतारत्वेन द्वावपि शिवविष्णू भोगमोक्षफले दातुं शक्तौ समर्थौ, तथापि तद्गुणविचारेण शिवेन भोगः सिद्धयति विष्णुना मोक्ष इति निश्चयो युक्त इत्यर्थः। तत्राऽपि न तयोः कर्तृत्वं, किन्तु करणतैवेति तृती- यया बोध्यते । कर्तृत्वं सर्वत्र भगवत एवेति स्वसिद्धान्तः । उक्तं च मुचुकुन्दं प्रति १ उच्यते तत आहुरिति क. २ निर्दोषपूर्णगुणवत्त्वमिति क. ३ परब्रह्मत्वमिति ग. २
१० बालवोधः ।
देवैः, 'एक एवेश्वरस्तस्ये'ति । 'श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनोर्नृणां स्युर्'इत्यत्र श्रेयांसीति बहुवचनात्सात्त्विकान्येव तान्युच्यन्ते । मोक्षस्य बहुत्वानुपपत्तेः । तथा च यत्र विष्णोः सकाशान्मोक्ष उच्यते तत्र विष्णुपदं पुरुषोत्तमपरं क्वचिज्ज्ञेयम् । यदि तच्छास्त्ररीत्या गुणावतारपरं तदुच्यते तदा मोक्षपदार्थस्तत्रैव लयो वाच्यः, 'देवान् देवयजो यान्ती'ति भगवद्वाक्यात् । तथा निबन्धेऽपि 'आदिमूर्त्तिः कृष्ण एव सेव्यः सायुज्यकाम्यया । निर्गुणा मुक्तिरस्माद्धि सगुणा साऽन्यसेवये'ति । नन्वू- भयोः समत्वेनाऽविशेषात्कथं नोभाभ्यां मुक्तिरिति चेद्, उच्यते । 'ज्ञानान्मोक्ष' इति सर्वशास्त्रसिद्धम् । तथा च 'सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानमि'ति वाक्यात्तद्गुणाधिष्ठात्रा स सुलभ इत्युच्यते । भोगस्य तत्प्रतिबन्धकत्वाददानमपि । तमसो ज्ञानप्रतिबन्धकत्वात्तद्गुणाधिष्ठात्रा स दुर्लभ इत्युच्यते । भोगस्तन्मूलक एवेति सुलभत्वं युक्तमेव । ननु तत्तच्छास्त्रेषु स सुलभ एवेति चेद्, ओमिति ब्रूमः । “शक्तौ द्वावपी”ति पूर्वमुपपादितं च । न तावताऽस्माकं काऽपि क्षतिः, उभयो- रस्वीकारात् । एवं जीवविचारेण लौकिको मोक्षश्चतुर्द्धा प्रतिपादितः । तस्याऽनीश्वर- विचारितत्वादस्वीकारोऽप्यर्थादुक्तः । यद्यपि भगवदीयानां मोक्षाभिलाषराहित्यादेत- दुक्तं नोपयुज्यते । तथापि “ पाक्षिकोऽपि दोषः परिहरणीय ” इति न्यायेन यदि कस्याऽपि तत्रोपादेयबुद्धिः स्यात्प्रमाणसिद्धत्वात्साऽपि मा भूदित्याशयेन जीवभ्रान्ति- कल्पितास्ते चत्वारोऽपीत्युक्तम् । अत एतद्गृहारस्तन्न प्रपत्स्यन्त इति पर्यवसितो- ऽर्थः । ननु भक्तिमार्गे मोक्षस्याऽनीप्सितत्वेन न तद्दातुर्विष्णोर्भजनापेक्षा । किन्तु विषयाणां भगवत्सेवोपयोगित्वेन तदभावे तद्दातुः शिवस्य तदपेक्षाऽस्त्विति चेत्, तत्राऽऽहुर्लोकेऽपीति । प्रभुः सेवकानां पतिः श्रीकृष्णो यद्भक्तसम्बन्धि वस्तु भुङ्क्ते स्वयमभ्यवहरति, तद्वस्तु कर्हिचित्कदाऽपि शिवो न यच्छति न ददातीत्यर्थः । तथा सति भगवतो भक्तकामनापूरकत्वं “सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसे”ति वाक्याद्भक्तेर्वा कल्पतरुत्वं भज्येत । अतः सर्वथेतरापेक्षा भक्तिमतां नोचितेति भावः । अत एव नैरपेक्ष्यं भक्तेरङ्गमिवि भगवानप्याह । “तस्मान्निराशिषो भक्ति- र्निरपेक्षस्य मे भवेदि”ति । किञ्च, “ यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिगि”ति । वचनाद्यत्र स्वार्थं भगवदपेक्षाऽपि दोषाय तत्राऽन्यापेक्षायास्तथात्वे किं वाच्यमिति । तस्मात्स्वीयानां सर्वं स्वयमेव हरिः सम्पादयतीति सिद्धान्तर- हस्यम्। “अप्रतर्क्यादनिर्देश्यादिति केष्वपि निश्चय ” इति वचनाच्च ॥१२॥१३॥१४॥
१ तदुच्येतेति ख. ग. २ अत्र ब्रूम इति क. ३ यत इति क. ४ अनिर्वाच्यादिति ख. ग.