भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 408 में से

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पृष्ठ 82

न करे अरु चित्त श्रीठाकोरजीके चरणारविन्दमे लग्यो रहे". श्रीमहाप्रभुने अपना चरणामृत दिया और उन्हें यह बालबोध ग्रन्थ पढ़ाया. बालबोधमें सर्वसिद्धान्तोंका संग्रहरूपेण निरूपण है किन्तु स्वसिद्धान्तका नहीं. अन्यान्य सिध्दान्तोंके साधन एवम् फलों का एकबार बराबर ज्ञान हो जानेपर पुष्टिजीवके अन्य मार्गोंपर भटक जानेका भय नहीं रह जाता. सभी मोक्षशास्त्र या तो सांसारिक दुःख दूर करनेके रूपमे या फिर पारलौकिक सुखकी प्राप्तिके रूपमे मोक्षका प्रतिपादन करते हैं. इस संसारमें रहते हुए भी भगवत्सेवा और/अथवा भगवत्कथा के द्वारा भजनानन्दकी प्राप्ति ही पुष्टि- जीवके लिए मोक्ष है. इसका निरूपण किन्तु चतुश्लोकीमे किया जायेगा. यहां वह विवक्षित नहीं है. वैसे तो मनुष्यके मनमे अगणित कामना या महत्त्वाकांक्षा भरी रहती हैं. विद्वानोंने उन्हे किन्तु चार पुरुषार्थोंके रूपमे वर्गीकृत किया है: (१) धर्म (२) अर्थ (३) काम और (४) मोक्ष. स्थूल अर्थोमे इन्हे क्रमशः (१) कर्तव्य (२) सम्पदा (३) प्रेयस् और (४) श्रेयस् कह सकते हैं. जीवनमे दिखलाई देती हर तरहकी कामनाओका इन चार पुरुषार्थोंमे अन्तर्भाव हो जाता है. इनके वास्तविक सहज एवम् शुभ स्वरूपकी जिज्ञासाका समाधान अलौकिक वेदादि शास्त्रोंमे भी मिलता है तथा विभिन्न ऋषियोंके द्वारा प्रणीत आर्ष शास्त्रोंमे भी. प्रस्तुत बालबोध ग्रन्थमे वैदिक धर्मार्थकाममोक्ष पुरुषार्थोंका निरूपण अभिप्रेत नही है. वह तो सर्वनिर्णयमे ही विशदतया निरूपित हो गया है. आर्ष अथवा लौकिक शास्त्र, जिनमे त्रिवर्ग धर्म अर्थ या काम पुरुषार्थ का निरूपण किया गया है, यहां उन शास्त्रोंका विवेचन भी अभिप्रेत नहीं है. यहां तो केवल अन्यान्य ऋषियों द्वारा प्रणीत मोक्षशास्त्र और उनमे प्रतिपाद्य मोक्षस्व- रूपके बारेमें ही श्रीमहाप्रभु अपना अभिमत प्रगट करना चाहते हैं. मोक्षका निरूपण करनेवाले विभिन्न ऋषियोंद्वारा प्रणीत शास्त्रोंमें चार शास्त्र प्रमुख है. अन्य शास्त्रोंका या तो इन्हींमें अन्तर्भाव समझना चाहीये या फिर उन्हें सिद्धान्ततः उपेक्षणीय ही समझना चाहिये.