भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

मोक्षप्रतिपादक ऋषिप्रोक्त चार शास्त्र : (१) त्यागसे स्वतोमोक्षका प्रतिपादक सांख्यशास्त्र (२) अत्यागसे स्वतोमोक्षका प्रतिपादक योगशास्त्र (३) शिवकी भक्ति या प्रपत्ति से परतोमोक्षका प्रतिपादक शैवतन्त्र (४) विष्णुकी भक्ति या प्रपत्ति से परतोमोक्षका प्रतिपादक वैष्णवतन्त्र (१) बाह्यत्याग द्वारा स्वतोमोक्षका प्रतिपादन करनेवाले सांख्यशास्त्रके अनुसार अहन्ता-ममताके सर्वथा नष्ट होनेपर जीवात्माका अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाना ही मोक्ष माना गया है. तत्तत् कालमें विभिन्न ऋषियोंने सांख्यशास्त्रका वर्णन अनेकविध प्रक्रियाओंके आधारपर किया है. पर मोक्षप्राप्तिके उपाय और स्वरूप के बारेमें प्रायः एकवाक्यता है. श्रीमहाप्रभुके अनुसार सांख्यशास्त्रीय प्रणालीका जो रूप मान्य वेदादि शास्त्रोंमें वर्णित हुआ है तदनुसार साधनाचरण करनेपर ही उल्लिखित प्रकारका मोक्षलाभ सांख्यसे मिल सकता है. अन्यथा नही. (२) चित्तवृत्ति-निरोधकी यौगिक प्रणालीसे स्वतोमोक्षका प्रतिपादन करनेवाले योगशास्त्रके अनुसार विषयोंके बाह्यत्यागकी उतनी अपेक्षा नहीं है जितनी कि यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-ध्यान-धारणा-समाधिके बाह्य तथा आन्तरिक समुचित उपायोंसे अनात्मरूप विषयोंमें भटकती चित्त- वृत्तिके निरोधकी आवश्यकता है. चित्तवृत्तिके निरुद्ध होनेपर ही आत्मा अपने स्वरूपमें अवस्थित या मुक्त हो सकती है. श्रीमहाप्रभुके अनुसार इन योगशास्त्रीय उपायोंका निरूपण मान्य वेदादि शास्त्रोंमें भी उपलब्ध होता है अतः तदनुसार अनुष्ठान करनेपर ही मोक्ष- प्राप्तिकी सम्भावना है. वैदिक प्रणालीसे विपरीतता बरतनेपर आत्माकी स्वरूपमें अवस्थिति सम्भव नहीं. (३) परतोमोक्षवादी पाशुपतादि शैवतन्त्रोंके अनुसार साधना करनेपर शिवके द्वारा भी मुक्ति मिल सकती है. श्रीमहाप्रभुके अनुसार क्योंकि सर्वात्मक निर्दोषपूर्णगुण ब्रह्म ही अथर्व- शिखा आदि उपनिषदोंके अनुसार जगत्संहारक शिवका रूप धारण करता है. अतः शिवके मुक्तिदाता होनेमें किसी सन्देहका अवसर नही है. फिरभी शिवके रूपमें भगवान् स्वयम् मुक्तताके आनन्दके उपभोगकी लीला करते हैं.