षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअतः शिवसे उनकी स्वोपभोग्य मुक्तिके बजाय भोगकी प्राप्ति सुलभ मानी जाती है किसी अतिप्रिय जीवको ही शिव मुक्तिदान करते हैं. यह असा- धारण प्रेमभाजन वे ही बन सकते हैं जो पूर्णतया शिवके प्रति समर्पित होते हैं. अतः शिवकी भक्ति या शरणागतिके साथ जो वर्णाश्रमोचित स्वधर्मकी उपेक्षा नहीं करते उन्हें शिवसे मोक्ष मिलता है. (४) परतोमोक्षवादी पांचरात्र वैष्णवतन्त्रके अनुसार साधना करनेपर विष्णुद्वारा मुक्ति मिल सकती है. श्रीमहाप्रभुके अनुसार क्योंकि सर्वात्मक निर्दोषपूर्णगुण ब्रह्म ही महानारा- यण आदि उपनिषदोंके अनुसार जगत्पालक विष्णुका रूप धारण करता है. विष्णुके रूपमें भगवान् स्वयम् अलौकिक दिव्य भागोंके उपभोगकी लीला करते हैं. अतः विष्णुसे उनके स्वोपभोग्य भोगके बजाय मोक्षकी प्राप्ति सुलभ मानी जाती है. विष्णु अपने किसी अतिप्रिय भक्तको ही भोगका दान करते हैं. यह असाधारण प्रेमभाजन बन पाना पूर्णतया विष्णुके प्रति समर्पित होने- पर ही सम्भव है. अतः विष्णुकी भक्ति या शरणागति के साथ जो वर्णा- श्रमोचित स्वधर्मकी उपेक्षा नहीं करते उन्हें विष्णुसे मुक्ति मिल सकती है. स्वतौमोक्षके प्रकारमें सांसारिक दुःख तो दूर होते है किन्तु पारलौकिक सुखकी सम्भावना नहीं है जबकि परतोमोक्षके प्रकारमें वह सम्भव है. इस तरह ब्रह्मा-विष्णु-शिवकी त्रिपुटोंमें शिव और विष्णु भोग-मोक्ष दोनोके दानमें समर्थ होनेपर भी अधिकांशमें शिव भोगके दाता बनते हैं और विष्णु मोक्षके दाता. ब्रह्मा केवल भोगके दाता हैं मोक्षके नहीं. अतः मोक्षदाता देवताके रूपमें ब्रह्माका भजन व्यर्थ है परन्तु मोक्षशास्त्रके उपदेशक गुरूके रूपमें ब्रह्माको भी मोक्षदाता माना जाता है. यह सारे मोक्षशास्त्रोंके सिद्धान्तोंका संग्रहरूपेण निरूपण है. इसे जाननेसे पुष्टिजीवको पूर्णतया पुष्टिमार्गीय बननेमें अथवा बने रहनेमें सहायता मिलती है स्वसिद्धान्तका निरूपण तो आगे चलकर सिद्धान्तमुक्तावलीमें किया जायेगा. नारायणदास अंबालावालेको श्रीमहाप्रभुने यही सर्वसिद्धान्त- संग्रह पढ़ाया था ताकि उनका चित्त पुष्टिके प्रशस्त पथको छोड़कर कहीं यहां- वहां न भटक जाये. वार्तामें उल्लेख मिलता है कि अपने घर लौटनेके बाद