षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाम-काजमें व्यापृत हो जानेपर भी इनका चित्त सदा गोकुल और श्री- महाप्रभु की ओर दोडता रहता था- "भैयाजी श्रीगोकुल श्रीआचार्यजीके दरस- नको कब चलोगे ?" तब नारायणदास कहते-'हाँ, अब चलूंगो ? नेत्रनमें जल भरि लीलारसमें मगन होय जाते. फेरि वह चाकर कहतो (कब श्रीगोकुल चलोगे) फेरि मगन होय जाते." श्रीमहाप्रभुने इस बालप्रबोधनद्वारा नारायणदासको कितना स्वकीय- कितना पुष्टिमार्गीय बना लिया होगा ! अतएव श्रीमत्प्रभुने 'बीज' रूपसे पुष्टिके रहस्योंको यहां अवतारी कृष्णके सन्दर्भमें न देकर उनके गुणावतार शिव और विष्णु के सन्दर्भमें 'उपक्षिप्त' किया है- "समर्पणेनात्मनो ही तदीयत्वं भवेद् ध्रुवम्. अतदीयतया चापि केवलञ्चेतसमाश्रितः तदाश्रयतदीयत्वबुद्ध्यर्थे किञ्चित्समाचरेत्. स्वधर्ममनुतिष्ठन्वै भारद्वैगुण्यमन्यथा. इत्येवं कथितं सर्वं नैतज्ज्ञाने भ्रमः पुनः" (बालबोध १८-१९) नारायणदासको स्वरूपसेवाकी आज्ञा न मिली-अतएव स्वरूपसेवाके अनुकल्प श्रीहस्ताक्षरकी सेवाका उल्लेख हमें मिलता है-और न स्वसिद्धान्तका उपदेश ही-अतएव बालबोध द्वारा सर्वसिद्धान्तसंग्रह उपदिष्ट हुआ-फिरभी स्वकीयता-सार-सर्वस्व चिर-उत्कण्ठा और तापभाव का उन्हें वरदान मिला -"भैयाजी! श्रीगोकुल श्रीआचार्यजीके दरसन को कब चलोगे ? हां, अब चलूंगो ! नेत्रनमें जलभरि लीलारसमें मगन होय जाते....." बालबोध वस्तुतः श्रीमहाप्रभु, उनके सिद्धान्त और मार्ग की ओर प्रयाण करने की तीव्र उत्कण्ठा जगाता है-'समर्पणेनात्मनो हि तदीयत्वं भवेद् ध्रुवम्... इत्येवं कथितं सर्वं नैतज्ज्ञाने भ्रमः पुनः" प्रस्तुत संस्करण वि. सं १९८३ में प्रकाशित संस्करणका ऑफसेट प्रॉसेस द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है. श्रीमद्गोस्वामि-कुलभूषण-विद्यानिधि-श्रीव्रजरत्न- लालजी महाराजने श्रीचीमनलाल ह. शास्त्रीद्वारा सम्पादित करवा कर अपनी श्रीबालकृष्ण शुद्धाद्वैत-महासभा (सूरत) द्वारा इसे प्रकाशित कराया था. उस संस्करणके पुनः प्रकाशनपर आदरणीय महाराजश्री तथा श्री- शास्त्रीजी के प्रति हम अपनी कृतज्ञता प्रकट करते है! इति शम्.