षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished408 पृष्ठ
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॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥ ग्रन्थ--परिचय सुना जाता है कि अपनी व्रजयात्राके दरम्यान श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु महावनमें यमुना तटपर गोकुल ग्रामकी खोजमें परिभ्रमण कर रहे थे तब स्वयम् श्रीयमुनाने प्रकट होकर वर्तमान गोकुलका स्थल दिखलाया था. प्राचीन गोकुल ग्रामके स्थलकी पहचानके बाद श्रीमहाप्रभु वहां बिराजे और तब श्रीयमुनाके पुष्टिमार्गीय माहात्म्य या महत्त्व का गान उनके मुखसे बरवस निकलने लगा. वही षोडशग्रन्थोंमें मंगलाचरणके रूपसे योजित हुआ श्रीयमुनाष्टकस्तोत्रम् है. एक किंवदन्तीके अनुसार श्रीयमुनाष्टक वि. सं १५४९ में श्रावण शुक्ल तृतीयाके दिन श्रीगोकुलमें रचा गया था. १ जैसे श्रीगंगाके साथ दास्यभावात्मिका मर्यादाभक्तिकी एक अन्तर्धारा बहती है, वैसे ही श्रीयमुनाके साथ पुष्टिभक्तिकी अन्तर्धारा बहती है. श्रीयमुनाके साथ बहती पुष्टिभक्तिकी यह अन्तर्धारा व्यापिवैकुण्ठके नाथको छोटेसे गोकुलके नाथ बननेके लिए मार्ग तथा पुष्टिमार्गीय गरिमा प्रदान करती है. क्षयकृत् कालके प्रवाहमें बहते जीवोंको वहांसे बरबस खींचकर अपने साथ बहाती हुई यह धारा उन्हें श्रीकृष्णकी दिव्य मधुर नित्यलीलाओंतक पहुंचा देती है. श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभुने इस यमुनाष्टक स्तोत्रमें श्रीयमुनाके आधि- भौतिक आध्यात्मिक एवम् आधिदैविक रूपोंका वर्णन करते हुए पुष्टिमार्गीय दृष्टिकोणसे श्रीयमुनाके असाधारण अष्टविध वैशिष्ट्य अथवा ऐश्वर्य का आठ श्लोकोंमें वर्णन किया है. क्रमशः एक-एक श्लोक श्रीयमुनाके एक-एक ऐश्वर्यके वर्णनार्थ कहा गया है. वे ऐश्वर्य श्रीयमुनाके ये हैं : १) श्रीयमुना पुष्टिमार्गीय अनेकविध सिद्धियोंको देनेवाली हैं. उदाहरण- तया- साक्षाद्भगवत्सेवोपयोगी देहकी प्राप्ति, भगवान्की विविध पुष्टिलीला- ओंके दर्शन कर पानेका सामर्थ्य, उन लीलाओंमें अभिव्यक्त होते रसोंको
१. दृष्टव्य श्रीनागरदास बांभणिया द्वारा लिखित- "श्रीषोडशग्रन्थनी रचना तथा श्रीमहा- प्रभुना चरित साथे संकालायेल महत्व नी तवारीखो" लेख. वैष्णववाणी अंक ४ वर्ष १९७९