षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुभव कर पानेका सामर्थ्य तथा सर्वात्मभाव आदि. ये सब पुष्टिमार्गीय सिद्धियां हैं जो श्रीयमुनाद्वारा पुष्टिजीवको प्राप्त होती हैं. २) श्रीयमुना भगवद्भावको बढ़ानेवाली हैं. देवादिविषयीणी रति या प्रीति भाव कहलाती है. पुष्टिमार्गके आराध्य देव श्रीकृष्ण ही हैं तथा श्रीयमुना पुष्टिजीवको इसी कृष्णस्नेहरूप भगवद्भावसे सम्पन्न करती हैं. ३) अपने आराध्य श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध जोडनेमें पुष्टिभक्तके सामने जो भी प्रतिबन्ध या विघ्न आते हैं उन्हें श्रीयमुना दूर करती हैं. इन विघ्नोंको हर कर पुष्टिभक्तको भगवदनुभव करने योग्य शुद्ध बना देती हैं. अतः पुष्टि- जगत्को ये पावन करनेवाली हैं. ४) जैसे गुणधर्म और रूप भगवान्ने पुष्टिलीलामें प्रकट किये हैं वे सभी श्रीयमुनामें भी प्रकट किये हैं. अतः श्रीयमुनासे जिसका सम्बन्ध स्थापित हुआ हो उसका परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके साथ भी सम्बन्ध अनायास ही स्थापित हो गया समझ लेना चाहिये. ५) भगवान्के प्रिय भक्तोंमें जो भी कलिरूप दोष हों उन्हें श्रीयमुना दूर कर देती हैं. ६) रासलीलामें भगवान्के तिरोहित हो जानेपर जैसे गोपिकाओने श्रीयमुनातटपर निःसाधनताके भावसे श्रीकृष्णकी प्रतीक्षा की, वैसे ही जो भी पुष्टिजीव श्रीयमुनाके आश्रयसे भगवान्को खोजना चाहता है वह भगवान्का प्रेमपात्र बनता है तथा भगवान्को पा सकता है. यमुना-जल-पानका यह असा- धारण महत्त्व है कि पानकर्ताके देह-इन्द्रिय-आदि कालप्रवाहमें उसकी आत्माको बहाकर कभी यमालयतक नहीं पहुंचाते. किन्तु कालातीत परमा- त्माको प्रणयरशनामें बांधकर पानकर्ता भक्ततक अवश्य पहुंचा देते हैं. ७) देह इन्द्रिय प्राण अन्तःकरण एवम् आत्मा यों सभीके द्वारा भगवत्- लीला एवम् भगवत्स्वरूप की अनुभूति-इस अलौकिक सामर्थ्यको तनुनवत्व अर्थात् तनु-देहका नवीनीकरण माना गया है. श्रीयमुना पुष्टिजीवोंके देहादि- में ऐसा अलौकिक सामर्थ्य प्रकट कर देती हैं कि सहस्रों परिवत्सरसे अपने प्रभुसे बिछुड़ा हुआ जीव अपने कालजर्जरित देहेन्द्रियादिमें एक ऐसी विलक्षण शक्ति या नूतनताका अनुभव करने लग जाता है कि उसे भगवान्की रसा-