षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्मिका अनुभूति सभी तरहसे होने लग जाती है. न केवल इतना अपितु नित्यलीलामें भी उसे नूतन देह मिल जाती है, श्रीयमुनाके कारण. ८) श्रीयमुनाके तटपर तथा जलमें भी श्रीकृष्णकी अनेकविध लीलायें आधिदैविक रूपमें सनातन चलती रहती हैं. श्रीयमुनामें जलक्रीडानिरत परमा- नन्दात्मक प्रभुका आनन्द ही श्रमजलकणोंके रूपमें उच्छलित हो कर श्रीयमुनाजलमें तादात्म्य प्राप्त कर लेता है. अतः श्रीयमुनाजलस्नान पुष्टि- भक्तोंमें श्रीकृष्णके साथ अंगसंगकी अनुभूतिकी सिहरन पैदा करता है. श्रीयमुनाका यह आधिदैविक स्वरूप समग्रतया लीलासामयिक पुष्टि भक्तोंकी अनुभूतिका ही विषय होता है. आंशिक रूपमें परन्तु आधुनिक पुष्टिजीवोंके लिए भी प्रतिबन्धकारी दोषोंका निवारण, स्वभावविजय, भगवद्भक्ति तथा भगवत्प्रेमभाजनता श्रीयमुनाके द्वारा सम्पादित होती हैं. अतः श्रीयमुनाकी कृपासे पुष्टिजीव पुष्टिमार्गमें प्रवेशयोग्य बनता है यह मंगल- विधान श्रीयमुनाका कार्य है, अतः इनकी स्तुतिको पुष्टिमार्गीय उपदेशमें मंगलाचरणके रूपमें योजित किया गया है. प्रस्तुत संस्करण वि. सं. १९८५ में प्रकाशित हुए संस्करणका ऑफसेट द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है. श्रीमद्गोस्वामिकुलभूषण-विद्यानिधि-श्रीव्रजरतनलालजी महाराजकी श्रीबालकृष्ण शुद्धाद्वैत महासभा (सूरत) द्वारा यह प्रकाशित हुआ था तथा इसके सम्पादक थे श्रीचीमनलाल ह. शास्त्रीजी. श्रीयमुनाष्ट- कम्के पुनःप्रकाशनके अवसरपर इन दोनों महानुभावोंके प्रति हम हार्दिक कृतज्ञताज्ञापन प्रकट करते हैं. इति शम्.