भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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८६) (श्री भक्तमाल विनै बहु करी, करी कृपा आप बोले 'अजू ! भक्तिफल लीजै कहू भूलि न हराइयै'। हिये धरि लई भीर-भार छोड़ि दई पुनि, नई यह भई सुनि दुष्ट मरवाइयै।। आपु काश्मीर सुनी बसत विश्रान्त तीर, तुरक समूह द्वार जन्त्र इक धारियै। सहज सुभाय कोऊ निकसत आय ताको, पकरत जाय तातें सुन्नत निहारियै।। संग लै हजार शिष्य भरे भक्तिरंग महा, अरे वाही ठौर बोले नीच पट टारियै। क्रोध भरि झारे आय सूबा पै पुकारे वे तौ, देखि सबै हारे मारे जल बोरि डारियै ।। ३३३ ।। गये सब दौरि जहाँ काजी की जु पौरि हुती, कियौ तिन सोई अजू कीजिये पुकार है। आजु कोऊ ऐसो एक आयो है जु मथुरा में, संग हैं हजार शिष्य तेज को न पार है।। लैकै झरकारे धिरकारे मति भाँति कह्यौ, क्यों रे अधरमी हिन्दूधर्म कियौ खार है। होहु तुम राँड कियौ पुरुषार्थ भाँड़ जोई, हरि सौं विमुख ताको नहीं पारावार है।। ३३४।। काजी अति डर्यौ हिये पर्यौ खरभर्यौ, यह कौन आय अर्यौ अब करौं का उपाय मैं। रचे भूत बयताल मूठि दीठि मायाजाल, सुदर्शन किये ख्याल सहज सुभाय मैं।। असुर के तन में सो अगिनि लगाइ दई, दई कहो दई कहा, कहा कियो हाय मैं। ये तो हैं बड़े प्रतापी मैं तो अहौं महापापी, अहो! मति थापी आवैं परौं धाय पाय मैं।। ३३५ ।। आय पाँय पर्यौ नीर नैननि ते ढर्यौ बैन, कहै मर्यौं-मर्यौ प्रभु मेरी रक्षा कीजिये। तब स्वामी कह्यौ तोहि लैहौं मैं बचाय पुनि, एक है उपाय सीख मेरी सुनि लीजिये।। फेरिकै अधर्म ऐसो करौगे न कर्म अब, मेटौ सब गर्व सदा सीतल ह्वै जीजिये। और जिते वादी हरि विमुख प्रमादी तिन्हें, लीये सत मारग में नौधा रस पीजिये ।। ३३६ ।। जिते हिन्दु तुरकनि सैक़रान मारे हारे, भरे दुख भारे वेतौ स्वामी जू पै आये हैं। प्रभु कह्यौ आवौ अब दुख जनि पावौ, केशौराय गुन गावौ जल जमुना के न्हाये हैं।। झीन एक वस्त्र लाय तिन कहँ पहिराय, हिन्दू केर चिह्न पाय जग जस गाये हैं। तुर्क तिया कान धरीं आइ सब पाँय परीं, करी प्रभु दया नर-नारी दरसाये हैं।। ३३७।। मास परायण पन्द्रहवाँ विश्राम श्रीश्रीभट्टजी श्रीभट्ट सुभट प्रगट्यौ अघट, रस रसिकन मनमोद घन ।। मधुर भाव सम्मिलित, ललित लीला सु बलित छवि । निरखत हरखत हृदै, प्रेम बरषत सु कलित कवि ।।