श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीदिवाकरजी) (८७ भव निस्तारन हेतु, देत दृढ़ भक्ति सबनि नित। जासु सुजस ससि ऊदै, हरत अति तम भ्रम श्रम चित।। आनंद कंद श्रीनन्द सुत श्रीवृषभानु सुता भजन। श्रीभट्ट सुभट प्रगट्यौ अघट, रस रसिकन मनमोद घन।।७६।। श्रीहरिव्यासदेवजी हरिव्यास तेज हरिभजन बल, देवी को दीक्षा दई।। खेचर नर की शिष्य, निपट अचरज यह आवै। विदित बात संसार, सन्त मुख कीरति गावै।। वैरागिन के वृन्द, रहत सँग स्याम सनेही। ज्यौं जोगेश्वर मध्य, मनो सोभित वैदेही।। श्रीभट्ट चरण रज परस तैं सकल सृष्टि जाकौं नई। हरिव्यास तेज हरिभजन बल, देवी को दीक्षा दई।।७७।। चटथावल गाँव बाग देखि अनुराग भयौ, लयौ नित्त नेम करि चाहें पाक कीजियै। देवी को स्थान काहू बकरा लै मार्यो आनि देखत गलानि 'इहाँ पानी नाहिं पीजियै'। भूखे निसि भई भक्ति तेज मिड़ गई नई, देह धरि लई आय लखि मति भीजियै। 'करौ जू रसोई' 'कौन करै कछु औरै भोई' 'सोई मोकौं दीजै दान शिष्य करि लीजियै' ।।३३८।। करी देवी शिष्य सुनि नगर को सटकी यों, पटकी लै खाट जाकी बड़ौ सरदार है। चढ़ी मुख बोलै 'हौं तो भई हरिव्यास दासी, जो न दास होहु तो पै अभी डारौं मार है'। आये सब भृत्य भये मानौं नये तन लये, गये दुख पाप ताप किये भव पार है। कोऊ दिन रहे नाना भोग सुख लहे एक, श्रद्धा कै स्वपच आयो पायौ भक्ति सार है।।३३६।। श्रीदिवाकरजी अज्ञान ध्वांत अन्तहिं करन, दुतिय दिवाकर अवतर्यौ ।। उपदेशे नृपसिंह, रहत नित आज्ञाकारी। पक्व वृक्ष ज्यौं नाय, सन्त पोषक उपकारी।।