भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 103

८८) (श्री भक्तमाल

वानी भोलाराम, सुहृद सबहिन पर छाया। भक्त चरणरज जाँचि, विशद राघौ गुण गाया।। करमचन्द कश्यप सदन, बहुरि आय मनो वपु धर्यौ। अज्ञान ध्वांत अन्तर्हिं करन दुतिय दिवाकर अवतर्यौ।।७८।।

श्रीविट्ठलनाथ गोसाँईजी

विट्ठलनाथ ब्रजराज ज्यौं लाल लड़ायकै सुख लियौ।। राग भोग नित विविध, रहत परिचर्या तत्पर। सय्या भूषन वसन रचित रचना अपने कर।। वह गोकुल वह नन्दसदन दीच्छित को सौहे। प्रगट विभौ जहाँ घोष, देखि सुरपति मन मौहै।। वल्लभ सुत बल भजन कें, कलियुग में द्वापर कियौ। विट्ठलनाथ ब्रजराज ज्यौं लाल लड़ायकै सुख लियौ।।७९।।

श्रीत्रिपुरदासजी

कायथ त्रिपुरदास भक्ति सुख रासि भर्यो, कर्यौ ऐसो पन सीत दगला पठाइयै। निपट अमोल पट हियें हित जटि आवै, तातें अति भावै नाथ अंग पहिराइयै।। आयो कोऊ काल नरपति नैं विहाल कियौ, भयौ ईश ख्याल नेकु घर में न खाइयै। वही ऋतु आई सुधि आई आँखि पानी भरि, आई एक द्वाति दीठि आई बेंच ल्याइयै।।३४०।। बेंचिकै बजार यों रुपैया एक पायौ ताकौ, ल्यायौ मोटौ थान मात्र रंग लाल गाइयै। भीज्यो अनुराग पुनि नैन जलधार भीज्यो-भीज्यो दीनताई धरि राख्यो और आइयै।। कोऊ प्रभुजन आय सहज दिखाई दई, भई मन दियौ लै भण्डारी पकराइयै। काहू दास दासी के न काम कौ पै जाउँ लैकै, विनती हमारी जू गुसाँई न सुनाइयै।।३४१।। दियो लै भण्डारी कर राखे धरि पट वापै, निपट सनेही नाथ बोले अकुलायकै। 'भये हैं जड़ाये कोऊ वेगि ही उपाय करो', विविध उढ़ाये अंग वसन सुहायकै।। आज्ञा पुनि दई यों अँगीठी बारि दई, फेर वही भई सुनि रहे अति ही लजायकै। सेवक बुलाय कही 'कौन की कबाय आई?' सबै की सुनाई एक वही ली बचायकै।।३४२।।