श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णदासजी) (८६ सुनी न 'त्रिपुरदास !' बोल्यौ 'धन नास भयौ, मोटो एक थान आयौ राख्यो है बिछायकै'। 'ल्यावौ वेगि याही छिन' मन की प्रवीन जानि, ल्यायो दुख मानि व्यौंति लई सो सिंवायकै।। अँग पहिराई सुखदाई कापै गाई जात कही तब बात 'जाड़ौ गयौ भरि भायकै'। नेह सरसाई लै दिखाई उर आई सबै ऐसी रसिकाई हृदै राखी है बसायकै।। ३४३।। श्रीविट्ठलनाथजी के सुत (श्री) विट्ठलेश सुत सुहृद् श्रीगोवरधनधर ध्याइयै।। श्रीगिरिधर जू सरस शील, गोविन्द जु साथहिं। बालकृष्ण जसवीर, धीर श्रीगोकुल नाथहिं।। श्रीरघुनाथ जु महाराज, श्रीजदुनाथहिं भजि। श्रीघनश्याम जु पगे, प्रभु अनुरागी सुधि सजि।। ए सात प्रगट विभु भजन जग, तारन तस जस गाइयै। (श्री) विट्ठलेश सुत सुहृद श्रीगोवरधनधर ध्याइयै।।८०।। श्रीकृष्णदासजी गिरिधरन रीझि कृष्णदास कौं, नाम माँझ साझौ दियौ।। श्रीवल्लभ गुरुदत्त भजन, सागर गुन आगर। कवित नोख निर्दोष, नाथ सेवा में नागर।। वानी वन्दित विदुष, सुजस गोपाल अलंकृत। ब्रजरज अति आराध्य, वहै धारी सर्वसु चित।। सान्निध्य सदा हरिदासवर्य, गौरश्याम दृढ़ व्रत लियौ। गिरिधरन रीझि कृष्णदास कौं नाम माँझ साझौ दियौ॥८१॥ प्रेम रसरासि कृष्णदास जू प्रकास कियौ, लियौ नाथ मानि सो प्रमान जग गाइकै। दिल्ली की बाजार में जलेबी सो निहारि नैन, भोग लै लगाई लगी विद्यमान पाइयै।। राग सुनि भक्तिनी को भये अनुराग बस, ससिमुख लाल जू कौं जाइकै सुनाइयै। देखि रिझवार रीझि निकट बुलाइ लई, लई संग चले जग लाज को बहाइयै।। ३४४।।