श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०) (श्री भक्तमाल
नीके अन्हवाय पट आभरन पहिराय, सौंधौ हूँ लगाय हरि मन्दिर में ल्याये हैं। देखि भई मतवारी कीनी लै आलापचारी, कह्यो 'लाल देखे?' बोली 'देखे में ही भाये हैं'।। नृत्य गान तान भाव भरि मुसक्यान, दृग रूप लपटान नाथ निपट रिझाये हैं। ह्वै कैं तदाकार तन छूट्यौ अंगीकार करी, धरी उर प्रीति मन सबके भिजाये हैं।।३४५।। आये सूर सागर सो कही बड़े नागर हौ, कोऊ पद गावौ मेरी छाया न मिलाइयै। गाये पाँच सात सुनि जान मुसुकात कही, भलें जू प्रभात आनि करिकै सुनाइयै।। पर्यौ सोच भारी गिरिधारी उर धारी बात, सुन्दर बनाय सेज धर्यो यो लखाइयै। आयकै सुनायौ सुख पायौ पच्छपात लै बतायौ औ मनायौ रंग छायौ अभू गाइकै।।३४६।। कुँवा में खिसिल देह छूटि गई नई भई, भई यों अशंका कछु औरै उर आई है। रसिकन मन दुख जानि सो सुजान नाथ, दियो दरसाय तन ग्वाल सुखदाई है।। गोवर्द्धन तीर कही 'आगे बलवीर गये, श्रीगुसाँई धीर सौं प्रनाम' यों जनाई है। धनहूँ बतायो खोदि पायो विसवास आयो, हिये सुख छायो शंक पंक लै बहाई है।।३४७।।
श्रीवर्द्धमानजी, श्रीगंगलजी
वर्द्धमान गंगल गम्भीर, उभै थंभ हरिभक्ति कै।। श्रीभागौत बखानि, अमृतमय नदी बहाई। अमल करी सब अवनि, ताप हारक सुखदाई।। भक्तन सौं अनुराग, दीन सौं परम दयाकर। भजन जसोदानन्द, सन्त संघट के आगर।। भीषमभट्ट अंगज उदार, कलियुग दाता सुगति के। वर्द्धमान गंगल गम्भीर उभै थंभ हरिभक्ति के।।८२।।
श्रीखेम गोसाँईजी
रामदास परताप तें, खेम गुसाँई खेमकर।। रघुनन्दन को दास, प्रगट भू-मण्डल जानै। सर्वसु सीताराम, और कछु उर नहिं आनै।।