श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीनारायणभट्टजी) (६३ आये हरिराम जू पै सबही जताई रीति, प्रीति करि बोले चलौ आगे आवौं भाई है। गये बैठे आयो जन मन में न ल्यायौ नृप, तब समुझायौ झार्यौ फेरि भू दिवाई है॥ ३५५॥ श्रीकमलाकरभट्टजी कमलाकर भट्ट जगत् में, तत्त्ववाद रोपी धुजा॥ पण्डित कला प्रवीन, अधिक आदर दे आरज। सम्प्रदाय सिर छत्र, द्वितीय मनौ मध्वाचारज॥ जेतिक हरि अवतार, सबै पूरन करि जानै। परिपाटी ध्वजविजै, सदृश भागौत बखानै॥ श्रुति स्मृति सम्मत पुरान, तप्तमुद्रा धारी भुजा। कमलाकर भट्ट जगत् में तत्त्ववाद रोपी धुजा॥ ८६॥ श्रीनारायणभट्टजी ब्रजभूमि उपासक भट्ट सो, रचि पचि हरि एकै कियौ॥ गोप्य स्थल मथुरा मण्डल जिते वाराह बखाने। ते किये नारायण प्रगट, प्रसिद्ध पृथ्वी में जाने॥ भक्तिसुधा कौ सिन्धु, सदा सतसंग समाजन। परम रसज्ञ अनन्य, कृष्णलीला कौ भाजन॥ ज्ञान स्मारत पच्छ कौं, नाहिन कोउ खण्डन बियौ। ब्रजभूमि उपासक भट्ट सो रचि पचि हरि एकै कियौ॥ ८७॥ भट्ट श्रीनारायन जू भये ब्रज परायन, जायँ जाही ग्राम जहाँ व्रत करि ध्याये हैं। बोलिकै सुनावैं इहाँ अमुकौ सरूप हैं जू, लीला कुण्ड धाम श्याम प्रगट दिखाये हैं॥ ठौर–ठौर रास के विलास लै प्रकास किये, जिये यों रसिकजन कोटि सुख पाये हैं। मथुरा ते कही ‘चलौ वेनी’ पूछैं ‘वेनी कहाँ?’ ‘ऊँचे गाँव’ आय खोदि सोत लै लखाये हैं। ३५६॥