श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
श्रीनारायणभट्टजी) (६३ आये हरिराम जू पै सबही जताई रीति, प्रीति करि बोले चलौ आगे आवौं भाई है। गये बैठे आयो जन मन में न ल्यायौ नृप, तब समुझायौ झार्यौ फेरि भू दिवाई है॥ ३५५॥ श्रीकमलाकरभट्टजी कमलाकर भट्ट जगत् में, तत्त्ववाद रोपी धुजा॥ पण्डित कला प्रवीन, अधिक आदर दे आरज। सम्प्रदाय सिर छत्र, द्वितीय मनौ मध्वाचारज॥ जेतिक हरि अवतार, सबै पूरन करि जानै। परिपाटी ध्वजविजै, सदृश भागौत बखानै॥ श्रुति स्मृति सम्मत पुरान, तप्तमुद्रा धारी भुजा। कमलाकर भट्ट जगत् में तत्त्ववाद रोपी धुजा॥ ८६॥ श्रीनारायणभट्टजी ब्रजभूमि उपासक भट्ट सो, रचि पचि हरि एकै कियौ॥ गोप्य स्थल मथुरा मण्डल जिते वाराह बखाने। ते किये नारायण प्रगट, प्रसिद्ध पृथ्वी में जाने॥ भक्तिसुधा कौ सिन्धु, सदा सतसंग समाजन। परम रसज्ञ अनन्य, कृष्णलीला कौ भाजन॥ ज्ञान स्मारत पच्छ कौं, नाहिन कोउ खण्डन बियौ। ब्रजभूमि उपासक भट्ट सो रचि पचि हरि एकै कियौ॥ ८७॥ भट्ट श्रीनारायन जू भये ब्रज परायन, जायँ जाही ग्राम जहाँ व्रत करि ध्याये हैं। बोलिकै सुनावैं इहाँ अमुकौ सरूप हैं जू, लीला कुण्ड धाम श्याम प्रगट दिखाये हैं॥ ठौर–ठौर रास के विलास लै प्रकास किये, जिये यों रसिकजन कोटि सुख पाये हैं। मथुरा ते कही ‘चलौ वेनी’ पूछैं ‘वेनी कहाँ?’ ‘ऊँचे गाँव’ आय खोदि सोत लै लखाये हैं। ३५६॥
६४) (श्री भक्तमाल श्रीब्रजवल्लभजी ब्रजवल्लभ वल्लभ सुवन, दुर्लभ सुख नैननि दिये ।। नृत्य गान गुन निपुन, रास में रस बरषावत। अब लीला ललितादि, बलित दम्पतिहिं रिझावत ।। अति उदार निस्तार, सुजस ब्रजमण्डल राजत। महा महोत्सव करत, बहुत सबही सुख साजत ।। श्रीनारायण भट्ट प्रभु, परम प्रीति रस बस किये। ब्रजवल्लभ वल्लभ सुवन, दुर्लभ सुख नैननि दिये ।। ८८ ।। श्रीरूप-सनातन गोसाँईजी संसार स्वाद सुख बांत ज्यौं, दुहुँ रूप-सनातन त्यागि दियौ ।। गौड़देश बंगाल हुते, सबही अधिकारी। हय गय भवन भण्डार, विभौ भू-भुज उन हारी ।। यह सुख अनित्य विचारि, वास वृन्दावन कीन्हौ। यथा लाभ सन्तोष कुँज, करवा मन दीन्हौ ।। ब्रजभूमि रहस्य राधाकृष्ण, भक्त तोष उद्धार कियौ। संसार स्वाद सुख बांत ज्यौं, दुहुँ रूप-सनातन त्यागि दियौ ।। ८६ ।। कहत वैराग गये पागि नाभा स्वामी जू पै, गई यों निवर तुक पाँच लागी आँच है। रही एक माँझ धर्यौ कोटिक कवित्त अर्थ, याही ठौर लै दिखायो कविता कौ साँच है।। राधाकृष्ण रस की आचारजता कही यामें, सोई जीवनाथभट्ट छपै वानी नाँच है। बड़े अनुरागी ये तो कहिवौ बड़ाई कहा, अहो! जिन कृपादृष्टि प्रेम पोथी बाँच है।। ३५७ ।। वृन्दावन ब्रजभूमि जानत न कोऊ प्राय, दई दरसाय जैसी शुक मुख गाई है। रीति हूँ उपासना की भागवत अनुसार, लियौ रससार सो रसिक सुखदाई है।। आज्ञा प्रभु पाय पुनि गोपीश्वर लगे आय, किये ग्रन्थ भाय भक्ति भाँति सब पाई है। एक-एक बात में समात मन बुद्धि जब, पुलकित गात दृग झरी-सी लगाई है।। ३५८ ।। रहैं नन्दगाँव रूप आये श्रीसनातन जू, महासुख रूप भोग खीर कौ लगाइये। नेकु मन आई सुखदाई प्रिया लाड़िली जू, मानौ कोऊ बालकी सुसौज सब ल्याइये ।।
श्रीहितहरिवंश गोसाँईजी) (६५ करिकै रसोई सोई लै प्रसाद पायौ भायो, अमल सो आयो चढ़ि पूछी सो जिताइये। 'फेरि जिनि ऐसी करौ यही दृढ़ हिये धरौ, ढरौ निज चाल' कहि आँखें भरि आइये।। ३५६।। रूप गुण गान होत कान सुनि सभा सब, अति अकुलान प्रान मूरछा-सी आई है। बड़े आप धीर रहे ठाढ़े न सरीर सुधि, बुधि में न आवै ऐसी बात लै दिखाई है।। श्रीगुसाईं कर्णपुर पाछे आय देखे आछे, नेकु ढिंग भये स्वांस लग्यौ तब पाई है। मानौ आगि आँच लागी ऐसो तन चिह्न भयौ, नयौ यह प्रेम रीति कापै जात गाई है।। ३६०।। श्रीगोविन्दचन्द आय निसि कौ स्वप्न दियौ, दियौ कहि भेद सब जासौँ पहिचानियै। रहौं मैं खिरक माँझ पोषैं निसि भोर साँझ, सीचैं दूध धार गाय जाय देखि जानियै।। प्रगट लै कियौ रूप अति ही अनूप छबि, कवि कैसे कहै थकि रहे लखि मानियै। कहाँ लौं बखानौं भरै सागर न गागर में, नागर रसिक हिये निसिदिन आनियै।। ३६१।। रहैं श्रीसनातन जू नन्दगाँव पावन पै, आवन दिवस तीन दूध लैके प्यारियै। साँवरौ किशोर आप पूछें 'किहिं ओर रहो?' 'कहे चारि भाई' पिता रीतिहूँ उचारियै।। गये ग्राम बूझी घर हरि पै न पाये कहूँ, चहुँ दिसि हेरि-हेरि नैन भरि डारियै। अबकै जो आवै फेर जान नहीं पावै सीस, लाल पाग भावै निसिदिन उर धारियै।। ३६२।। कही व्याली रूप वेनी निरखि सरूप नैन, जानी श्रीसनातन जू काव्य अनुसारियै। राधासर तीर द्रुम डार गहि झूलैं-फूलैं, देखत लफलफात गति मति वारियै।। आये यों अनुज पास फिरे आस-पास देखि, भयौ अति त्रास गहे पाउँ उर धारियै। चरित अपार उभै भाई हितसार पगे, जगै जग माहिं मति मन में उचारियै।। ३६३।। श्रीहितहरिवंश गोसाँईजी (श्री) हरिवंश गुसाँई भजन की, रीति सकृत् कोउ जानिहै।। (श्री) राधाचरण प्रधान, हृदै अति सुदृढ़ उपासी। कुँजकेलि दम्पत्ति तहाँ, की करत खवासी।। सर्वसु महा प्रसाद, प्रसिद्ध ताके अधिकारी। विधि निषेध नहिं दास, अनन्य उतकट व्रतधारी।। व्यास सुवन पथ अनुसरै, सोई भले पहिचानिहै। (श्री)हरिवंश गुसाँई भजन की रीति सकृत् कोउ जानिहै ॥६०॥
६६) (श्री भक्तमाल) हित जू की रीति कोऊ लाखनि में एक जानै, राधा ही प्रधान मानै पाछे कृष्ण ध्याइयै। निपट विकट भाव होत न सुभाव ऐसो, उनहीं की कृपादृष्टि नेकु क्यौं हूँ पाइयै।। विधि औ निषेध छेद डारे प्रान प्यारे हिये, जिये निज दास निसिदिन वहै गाइयै। सुखद चरित्र सब रसिक विचित्रन के, जानत प्रसिद्ध कहा कहिकै सुनाइयै॥ ३६४॥ आये घर त्याग राग बढ़यौ प्रिया-प्रियतम सौं, विप्र बड़भाग हरि ओझा दई जानियै। तेरी उभै सुता ब्याहि देवौ लेवौ नाम मेरौ, इनकौ जो वंस सो प्रशंस जग मानियै।। ताही द्वार सेवा विस्तार निज भक्तन की, अगतिन गति सो प्रसिद्ध पहिचानियै। मानि प्रिय बात ग्रहगयौ सुख लह्यौ तब, कह्यौ कैसे जात यह मन, मन आनियै॥ ३६५॥ राधिकावल्लभ लाल आज्ञा सो रसाल दई, सेवा मो प्रकास औ विलास कुंज धाम कौ। सोई विस्तार सुखसार दृग रूप पियौ, दियौ रसिकानि जिन लियौ पच्छ बाम कौ।। निसिदिन गान रस माधुरी कौ पान उर, अन्तर सिहान एक काम स्यामा-स्याम कौ। गुन सो अनूप कहि कैसे कै सरूप कहै, लहै मनमोद जैसे और नहीं नाम कौ॥ ३६६॥ स्वामी श्रीहरिदासजी (श्री) आसुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की।। जुगल नाम सौं नेम, जपत नित कुंजविहारी। अवलोकत रहैं केलि, सखी सुख के अधिकारी।। गान कला गन्धर्व, स्याम-स्यामा कौं तोषैं। उत्तम भोग लगाय, मोर मरकट तिमि पोषैं।। नृपति द्वार ठाढ़े रहैं, दरसन आसा जास की। (श्री) आसुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की॥६१॥ स्वामी हरिदास रसरासि को बखान सकै, रसिकता छाप जोई जाप मधि पाइयै। ल्यायो कोऊ चोवा वाकौ अति मन भोवा वामें, डार्यौ लै पुलिन यह खोवा हिये आइयै।। जानिकै सुजान कही 'लै दिखावौ लाल प्यारे', नैसुकु उघारे पट सुगंध बुड़ाइयै। पारस पाषान करि जल डरवाय दियौ, कियौ तब शिष्य ऐसे नाना विधि गाइयै॥ ३६७॥ मास परायण सोलहवाँ विश्राम
श्रीहरिराम व्यासजी) (६७
श्रीहरिराम व्यासजी
उतकर्ष तिलक अरु दाम को, भक्त इष्ट अति व्यास के। काहू के आराध्य मच्छ, कच्छ नरहरि सूकर। वामन परसाधरन, सेतबन्धन जु सैलकर॥ एकन कें यह रीति, नेम नवधा सौं लाये। सुकुल सुमोखन सुवन, अच्युत गोत्री जु लड़ाये॥ नौगुण तोरि नूपुर गुह्यौ, महत सभा मधि रास के। उत्कर्ष तिलक अरु दाम कौ भक्त इष्ट अति व्यास के।।६२।।
आये गृह त्यागि वृन्दावन अनुराग करि, गयौ हियौ पागि होय न्यारो तासौं खीजियै। राजा लैन आयो ऐपै जायवौ न भायो, श्रीकिशोर उरझायौ मन सेवा मति भीजियै।। चीरा जरकसी सीस चीकनौ खिसिलि जाय, 'लेहु जू बँधाय नहीं आप बाँध लीजिये'। गये उठि कुंज सुधि आई सुखपुंज आये, देख्यौ बँध्यौ मंजु कही कैसे मोपै रीझियै।।३६८।।
सन्त सुखदैन बैठे संग ही प्रसाद लेन, परोसति तिया सब भाँतिन प्रवीन है। दूध बरताई लै मलाई छिटकाई निज, खीझि उठे जानि पति पोषति नवीन है।। सेवा सौं छुटाय दई अति अनमनी भई, गई भूख बीते दिन तीन तन छीन है। सब समझावैं तब दण्ड को मनावैं अँग, आभरन बेंच साधु जेंवैं यों अधीन हैं।। ३६९।।
सुता कौ विवाह भयौ बड़ौ उतसाह कियौ, नाना पकवान सब नीके बनि आये हैं। भक्तनि की सुधि करी खरी अरबरी मति, भावना करत भोग सुखद लगाये है।। आय गये साधु सो बुलाय कही पावौ जाय, पोटनि बँधाय चाय कुंजनि पठाये है। वंसी पहिराई द्विज भक्ति लै दृढ़ाई सन्त, सम्पुट में चिरिया दै हित सौं बसाये हैं।। ३७० ।।
शरद उज्यारी रास रच्यौ पिया प्यारी तामें, रंग बढ़्यौ भारी कैसे कहिकै सुनाइयै। प्रिया अति गति लई बिजुरी-सी कौंधि गई, चकचौंधी भई छबि मण्डल में छाइयै।। नूपुर सी टूटि छूटि पर्यौ अरबर्यौ मन, तोरिकै जनेऊ कर्यौ वाही भाँति भाइयै। सकल समाज में यों कह्यौ 'आज काम आयौ, ढोयो हौं जनम' ताकी बात जिय आइयै।।३७१।।
गायौ भक्त इष्ट अति सुनिकै महन्त एक, लैन कौं परीक्ष्या आयौ संग सन्त भीर है। भूख कौं जतावै वानी व्यास कौ सुनावै सुनि, कही भोग आवै इहाँ मानै हरि धीर है।।
६८) (श्री भक्तमाल तब न प्रमान करी शंक धरी लै प्रसाद, ग्रास दोय चार उठे मानौं भई पीर है। पातरि समेटि लई सीत करि मोकौं दई, पावै तुम और पाँव लिये दृग नीर है।। ३७२।। भये सुत तीन बाँट निपट नवीन कियौ, एक ओर सेवा एक ओर धन धर्यौ है। तीसरी जु ठौर श्यामवन्दनी और छाप धरी, करी ऐसी रीति देखि बड़ौ सोच पर्यौ है।। एक ने रुपैया लिये एक ने किशोर जू कौं, श्रीकिशोरदास भाल तिलक लै कर्यौ है। छापे दिये स्वामी हरिदास निसि रास कीनौ, वही रास ललितादि गायो मन हर्यौ है।। ३७३।। श्रीजीव गोसाँईजी (श्री) रूप सनातन भक्तिजल, जीवगुसाँई सर गँभीर।। बेला भजन सुपक्व, कषाय न कबहुँ लागी। वृन्दावन दृढ़वास, जुगल चरननि अनुरागी।। पोथी लेखन पान, अंघट अक्षर चित दीनौ। सद्ग्रन्थनि कौ सार, सबै हस्तामल दीनौ। सन्देह ग्रन्थि छेदन समर्थ, रस रास उपासक परम धीर। (श्री) रूप सनातन भक्तिजल जीवगुसाँई सर गँभीर ।।६३।। किये नाना ग्रन्थ हृदै ग्रन्थि दृढ़ छेदि डारैं, डारैं धन यमुना में आवै चहुँओर तें। कही दास 'साधुसेवा कीजै' कहैं 'पात्रता न', करौं नीके करी बोल्यौ कटु कोप जोर तें।। तब समझायौ सन्त गौरव बढ़ायौ यह, सबकों सिखायौ बोलौ मीठौ निसि भोर तें। चरित अपार भाव-भक्ति कौ न पारावार, कियोऊ वैराग सार कहै कौन छोर तें ।। ३७४ ।। श्रीवृन्दावनवासी भक्त वृन्दावन की माधुरी, इन मिलि आस्वादन कियौ।। सर्वसु राधारमन, भट्ट गोपाल उजागर। हृषीकेश भगवान, विपुलबीठल रससागर।। थानेश्वरी जगन्नाथ, लोकनाथ महामुनि मधु श्रीरंग। कृष्णदास पण्डित, उभै अधिकारी हरि अंग।।
श्रीलोकनाथ गोसाँईजी) (६६ घमण्डी युगलकिशोर भृत्य, भूगर्भ जीव दृढ़व्रत लियौ। वृन्दावन की माधुरी इन मिलि आस्वादन कियौ॥६४॥ श्रीगोपालभट्ट गोसाँईजी श्रीगोपाल भट्ट जू के हिये वै रसाल बसे, लसे यों प्रगट राधारवन सरूप हैं। नाना भोग राग करैं अति अनुराग पगे, जगे जग माहिं हित कौतुक अनूप हैं॥ वृन्दावन माधुरी अगाध कौ सवाद लियौ, जियौ जिन पायौ सीथ भये रस रूप हैं। गुन ही कौ लेत जीव अवगुन को त्यागि देत, करुनानिकेत धर्मसेत भक्तभूप हैं॥३७५॥ श्रीअलि भगवान् अलि भगवान रामसेवा सावधान मन, वृन्दावन आये कछु औरै रीति भई है। देखे रासमण्डल में विहरत रस रास, बाढ़ी छबि प्यास दृग सुधि-बुधि गई है॥ नाम धरि रास औ विहारी सेवा प्यारी लागी, खगी हिय माँझ गुरु सुनी बात नई है। विपिन पधारे आप जाय जग धारे सीस, 'ईश मेरे तुम' सुख पायौ कहि दई है॥३७६॥ नवाह परायण पंचम विश्राम श्रीबीठलविपुलजी स्वामी हरिदास जू के दास नाम बीठल है, गुरु के वियोग दाह उपज्यौ अपार है। रास के समाज में विराज सब भक्तराज, बोलिकै पठाये आये आज्ञा बड़ी भार है॥ युगल सरूप अवलोकि नाना नृत्य भेद, गान तान कान सुनि रही न सँभार है। मिलि गये वाही ठौर पायौ भाव तन और, कह्यौ रससागर सो ताकौं यों विचार है॥३७७॥ श्रीजगन्नाथजी थानेश्वरी महाप्रभु पारषद थानेश्वरी जगन्नाथ, नाथ कौ प्रकास घर दिना तीनि देख्यो है। भये शिष्य जान आप नाम कृष्णदास धर्यौ, कृष्ण जू कहत सबै आदर बिसेख्यो है॥ सेवा मनमोहन जू कूप में जनाइ दई, बाहर निकालि करी लाड़ उर लेख्यो है। सुत रघुनाथ जू कौं स्वप्न में श्लोक दान, दया के निधान पुत्र दियौ प्रेम पेख्यो है॥३७८॥ श्रीलोकनाथ गोसाँईजी महाप्रभु कृष्णचैतन्य जू के पारषद, लोकनाथ नाम अभिराम सब रीति है। राधाकृष्ण लीला सौं रंगीन में नवीन मन, जैसे जल मीन तैसें निसि दिन प्रीति है॥ भागवत गान रसखान सो तौ प्रान तुल्य, अति सुख मान कहैं गावै जोई मीति है। रसिक प्रवीन मग चलत चरन लागि, कृपा कै जताय दई जैसी नेह नीति है॥३७६॥
१००) (श्री भक्तमाल श्रीमधु गोसाँईजी श्रीमधुगोसाँई आये वृन्दावन चाह बढ़ी, देखें इन नैननि सौं कैसो धौं सरूप है। ढूँढ़त-फिरत वन-वन कुजलता द्रुम, मिटी भूख-प्यास नहीं जानैं छाँह धूप है।। जमुना चढ़त काट करत करारे जहाँ, वंसीवट तट डीठ परे वे अनूप है। अँक भरि लिये दौर अजहूँ लौं सिरमौर, चाहै भाग भाल साथ गोपीनाथ रूप है।। ३८०।। श्रीकृष्णदासजी ब्रह्मचारी गुसाँईं श्रीसनातन जू मदनमोहन रूप, माथैं पधराये कही 'सेवा नीके कीजियै'। जानौं कृष्णदास ब्रह्मचारी अधिकारी भये, भट्ट श्रीनारायण जू शिष्य किये रीझियै।। करिकै सिंगार चारु आप ही निहारि रहैं, गहैं नहीं चेत भाव माँझ मति भीजियै। कहाँ लौं बखान करौं राग भोग रीति भाँति, अबलौं विराजमान देखि-देखि जीजियै।। ३८१।। श्रीकृष्णदासजी पण्डित श्रीगोविन्दचन्द रूपरासि रसरासि दास, कृष्णदास पण्डित ये दूसरे यों जानि लै। सेवा अनुराग अंग-अंग मति पागि रही, पागि रही मति जोपै तोपै यह मानि लै।। प्रीति हरिदासन सौं विविध प्रसाद देत, हिये लाय लेत देखि पद्धति प्रमानि लै। सहज की रीति में प्रतीति सो विनीत करें, ढरै वाही ओर मन अनुभव आनि लै।। ३८२।। श्रीभूगर्भ गोसाँईजी गुसाँईं भूगर्भ वृन्दावन दृढ़ वास कियौ, लियौ सुख बैठि कुंज गोविन्द अनूप हैं। बड़ेई विरक्त अनुरक्त रूपमाधुरी में, ताही को सवाद लेत मिले भक्तभूप हैं।। मानसी विचार ही अहार सौं निहारि रहैं, गहैं मनवृत्ति वेई युगल सरूप हैं। बुद्धि के प्रमान उनमान में बखान कर्यो, भर्यौ बहुरंग जाहि जानै रसरूप हैं।। ३८३।। श्री रसिकमुरारिजी (श्री) रसिकमुरारि उदार अति मत्त गजहिं उपदेश दियौ।। तन मन धन परिवार सहित सेवत सन्तन कहँ। दिव्य भोग आरती अधिक हरिहूँ ते हिय महँ।। श्रीवृन्दावनचन्द स्याम - स्यामा रँग भीने। मगन प्रेम पीयूष पयध परचै बहु दीने।।
श्री रसिकमुरारि जी) (१०१ श्रीहरिप्रिय श्यामानन्दवर भजन भूमि उद्धार कियौ। (श्री) रसिकमुरारि उदार अति मत्त गजहिं उपदेश दियौ।। ६५।। रसिकमुरारि साधुसेवा विसतार कियो, पावै कौन पार, रीति भाँति कछु न्यारियै। सन्त चरनामृत के माट गृह भरे रहें, ताही कौ प्रनाम पूजा, करि उर धारियै।। आवैं हरिदास, तिन्हें देत सुखरासि, जीभ एक न प्रकासि सकै, थकै सो विचारियै। करैं गुरु उत्सव लै, दिन मान सबै कोऊ द्वादस दिवस जन घटा लागी प्यारियै।। ३८४।। सन्त चरनामृत कौं ल्यावो जाय नीकी भाँति, जीय की भाँति जानिवे को दास लै पठायौ है। आनिकै बखान कियौ, लियो सब साधुन कौ, पान करि बोले, सो सवाद नहीं आयौ है।। जिते सभाजन कही, चाखौ देहु मन कोऊ महिमा न जानै कन जानी छोड़ि आयौ है। पूछी कही कोढ़ी एक रह्यौ, आनो, ल्यायो, पीयो, दियो सुख पाय नैन नीर ढरकायौ है।। ३८५।। नृपति समाज में विराजमान भक्तराज, कहैं वे विवेक कोऊ कहनि प्रभाव है। तहाँ एक ठौर, साधु भोजन करत रौर, देवो दूजी सोंटा संग, कैसे आवै भाव है।। पातरि उठाय श्रीगुसाँई पर डारि दई, दई गारी सुनी आप, बोले देखो दाव है। सीथ सौं विमुख मैं तो, आनि मुख मध्य दियो, कियो दास दूर, सन्तसेवा में न चाव है।। ३८६।। बाग में समाज सन्त, चले आप देखिवें को, देखत दुरायौ जन हुक्का सोच पर्यो है। बड़ौ अपराध मानि, साधु सनमान चाहें, घूमितन बैठि कही देखौ कहूँ धर्यो है।। जायकै सुनाई दास, काहू के तमाखू पास, सुनिकै हुलास बढ़्यौ, आगैं आनि कर्यो है। झूठे ही उसांस भरि, साँचे प्रेम पाय लिये, किये मनभाये ऐसे, शंका दुख हर्यो है।। ३८७।। उपजत अन्न गाँव, आवै साधुसेवा ठांव, नयौ नृप दुष्ट, आय कांव-कांव कियौ है। ग्राम सो जबत कर्यो, कर्यो लै विचार आप, स्यामानन्द जू मुरारि पत्र लिखि दियौ है। जाही भाँति होहु, ताही भाँति उठि आवौ इहाँ, आये हाथ बाँधि करि अँचैहू न लियौ है। पाछे साष्टांग करी, करी लै निवेदन सो भोजन में कही चलि आयो भीज्यौ हियौ है।। ३८८।। आज्ञा पाय अँचयौ लै, दै पठाये वाही ठौर, दुष्ट सिरमौर जहाँ, तहाँ आप आये हैं। मिले मुतसद्दी शिष्य, आइकै सुनाई बात, जावौ उठि प्रात, यह नीच जैसे गाये हैं।। हमही पठावैं, काम करि समझावैं सब, मन में न आवै, जानी नेह डर पाये है। चिन्ता जिनि करौ, हिये धरौ निहचिन्तताई, भूप सुधि आई, दिना तीन कहाँ छाये है।। ३८६।।
सुनी आये गुरुवर, कही ल्यावो मेरे घर, देखें करामात, बात यह लै सुनाई है। कह्यौ आनि अभूँ जावौ चलौ उनमान देखें, चले सुख मानि आयौ हाथी धूम छाई है। छोड़िकै कहार भाजि गये न निहारि सके, आप रससार वानी बोले, जैसी गाई है। बोलौ हरे कृष्ण-कृष्ण, छाड़ौ गज तम तन, सनि गयौ हिये भाव, देह सो नवाई है॥३६०॥ बहै दृह नीर, देखि ह्वै गयौ अधीर, आप कृपा करि शिष्य कियौ, दियौ भक्तिभाव है। कान में सुनायौ नाम, नाम दै गुपालदास, माल पहिराई गरें, प्रगट्यौ प्रभाव है॥ दुष्ट सिरमौर भूप, लखि उहिं ठौर आयौ, पाँय लपटायौ, भयौ हिये अति चाव है। निपट अधीन, गाँव केतिक नवीन दिये, लिये कर जोरि, मेरौ फल्यो भाग दाव है॥३६१॥ भयौ गजराज, भक्तराज साधुसेवा साज, सन्तनि समाज देखि, करत प्रनाम है। आनि डारै गोनि, बनजारनि की बारन सौं, आयेई पुकारन वे जहाँ, गुरू धाम है॥ आवत महोच्छौ मध्य, पावत प्रसाद सीथ, बोले आप हाथी सौं यों, निंद्य वह काम है। छोड़ि दई रीति तब, भक्तन सौं प्रीति बढ़ी, संग ही समूह फिरै, फैलि गयो नाम है॥३६२॥ सन्त सत पाँच, सात, संग जित जात तित, लोग उठि धावैं, ल्यावैं सीधे बहु भीर है। चहुँदिसि परी हई सूबा सुनि चाह भई हाथ पै न आवत सो आनै कोऊ धीर है॥ साधु एक गयौ, गही लयौ भेष दास तन, मन में प्रसाद, नेम पीवै नहीं नीर है। बीते दिन तीन चारि, जल लै पियावैं धारि, गंगा जू निहारि मधि, तज्यौ यों सरीर है॥३६३॥ सप्ताह परायण चौथा विश्राम मास परायण सत्रहवाँ विश्राम भव प्रवाह निस्तार हित अवलम्बन ये जन भये॥ सोझा सींवा अधार धीर हरिनाभ त्रिलोचन। आसाधर घौराजनीर सधना दुखमोचन॥ काशीश्वर अवधूत कृष्ण किंकर कटहरिया। सोभू ऊदाराम नाम डूँगर व्रत धरिया॥ पदम पदारथ रामदास विमलानन्द अमृतश्रये। भव प्रवाह निस्तार हित अवलम्बन ये जन भये॥ ६६॥ श्रीसदन (सधनजी) सदना कसाई, ताकी नीकी कस आई, जैसे बाराबानी सोने की, कसौटी कस आई है। जीव को न बध करैं, ऐपै कुलाचार ढरै, बेंचै मांस लाय, प्रीति हरि सौं लगाई है॥
श्रीकलिकल्पवृक्ष भक्त) (१०३ गण्डकी कौ सुत, बिन जाने तासो तौल्यौ करै, भरै दृग साधु, आनि पूजे पै न भाई है। कही निसि सपने में, वाही ठौर मोकौं देवौ, सुनौं गुनगान रीझौ, हिय की सचाई है।। ३६४।। लैके आयौ साधु, मैं तौ बड़ौ अपराध कियौ, कियौ अभिषेक सेवा करी पै न भाई है। ए तौ प्रभु रीझे तोपै, जोई चाहौ सोई करौ, गरो भरि आयौ, सुनि मति बिसराई है।। वेई हरि उर धारि, डारि दियौ कुलाचार, चले जगन्नाथदेव, चाह उपजाई है। मिल्यौ एक, संग-संग जात वे सुगात सब, तब आप दूर-दूर रहैं जानि पाई है।। ३६५।। आयौ मग गाँव, भिक्षा लेन इक ठांव गयौ, नयो रूप देखि, कोऊ तिया रीझि परी है। बैठौ याही ठौर, करौ भोजन निहोरि कह्यौ, रह्यौ निसि सोय, आई मेरी मति हरी है।। लेवो मोकौं संग, गरौ काटौ तौ न होय रंग, बूझी और काटी पति ग्रीव, पै न डरी है। कही अब पागो मोसौँ, नातौ कौन तोसौँ मोसौँ शोर करि उठी इन मार्यौ भीर करी है।। ३६६।। हाकिम पकरि पूछे, कहै हँसि मार्यौ हम, डार्यौ सोच भारी, कही हाथ काटि डारियै। कट्यौ कर, चले हरि रंग माँझ झिले मानी जानी कछु चूक मेरी यहै उर धारियै।। जगन्नाथदेव आगे, पालकी पठाई लेन, सधना सो भक्त कहाँ? चढैं न विचारियै। चढ़ि आये प्रभु पास, सपनो सो मिट्यो त्रास, बोले दै कसौटी हूँ पै भक्ति बिसतारियै।। ३६७।। श्रीकाशीश्वर गोसाँईजी श्रीगुसाँई काशीश्वर, आगे अवधूत वर, करि प्रीति नीलाचल, रहे लाग्यो नीको है। महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य जू की आज्ञा पाय, आये वृन्दावन, देखि भायौ भयौ हीको है।। सेवा अधिकार पायौ, रसिक गोविन्दचन्द, चाहत मुखारविन्द, जीवनि जो जीको है। नित ही लड़ायैं, भवसागर बुड़ायैं, कौन पारावार पावै, सुनैं लागैं, जग फीको है।। ३६८।। श्रीकलिकल्पवृक्ष भक्तजी करुना छाया भक्तिफल ए कलिजुग पादप रचे।। जतीरामरावल्लि श्यामखोज़ी सन्त सीहा। दलहा पद्म मनोरथ राँका घौगू जपजीहा।। जाड़ा चाचागुरू सवाई चाँदा नापा। पुरूषोत्तम सौँ साँच चतुर कीता (मनकौ) जिहि मेट्यौ आपा।।
मति सुन्दर, धीधांग श्रम, संसार चाल नाहिन नचे। करुना छाया, भक्तिफल, ए कलियुग पादप रचे ॥६७॥
श्रीखोजीजी खोजी जू के गुरु, हरि भावना प्रवीन महा, देह अन्त समैं, बाँधि घण्टा सो प्रमानियै। पावै प्रभु जब तब बाजि उठै जानौ यही, पाये पै न बाजी, बड़ी चिन्ता मन आनियै॥ तन त्याग बेर नहीं हुते फेरि पाछे आये, वाही ठौर पौढ़ि देख्यौ, आम पक्यौ मानियै। तोरि ताके टूक किये, छोटौ एक जन्तु मध्य, गयौ सो विलाय बाजि उठो जग जानियै॥३६६॥
शिष्य की तौ जोग्यताई, नीके मन आई, अजू, गुरू की प्रबल ऐपै नेकु घटी क्यों भई। सुनौ याकी बात, मन बातवत गति कही, सही लै दिखाई, और कथा अति रसमई॥ वेतौ प्रभु पाय चुके, प्रथम, प्रसिद्ध पाछे, आछो फल देखि, हरि जोग उपजी₁ नई। इच्छा सो सफल स्याम भक्तवश करी, वही रही पूरपच्छ सब विथा उर की गई॥४००॥
श्रीराँकाजी, श्रीबाँकाजी राँका पति बाँका तिया, बसैं पुर पण्ढर में, उर में न चाह, नेकु रीति कछु न्यारियै। लकरीन बीनि करि, जीविका नवीन करैं, धरैं हरिरूप हिये, ताही सौं जियारियै॥ विनती करत, नामदेव श्रीकृष्णदेव जू सौं, कीजै दुख दूर, कही मेरी मति हारियै। चलौ लै दिखाऊँ तब, तेरे मन भाऊँ रहे, वन छिपि दोऊ, थैली मग माँझ डारियै॥४०१॥
आये दोऊ तिया पति, पाछे बधू आगे स्वामी, औचक ही मन माँझ, सम्पति निहारियै। जानी यों जुवति जाति, कभूँ मन चलि जात, याते वेगि सम्भ्रम सौं, धूरि वापै डारियै॥ पूछी अजू ! कहा कियौ भूमि में निहूरि तुम? कही वही बात, बोली धनहूँ विचारियै। कहै मोसौँ राँका, ऐपै बाँका आज देखी तुही, सुनि प्रभु बोले, बात साँची है हमारियै॥४०२॥
नामदेव हारे, हरिदेव कही और बात, जोपै दाह गात, चलौ लकरी सकेरियै। आये दोउ बीनिवे को, देखी इकठौरी ढेरी, द्वैहूँ मिली पावैं, तऊ हाथ नाहिं छेरियै॥ तबतौ प्रगट श्याम, ल्याये यों लिवाय घर, देखि मूँड फोरौ कह्यौ, ऐसे प्रभु फेरियै। विनती करत, कर जोरि अंग पटधारौ भारौ, बोझ पर्यो लियौ चीर मात्र हेरियै॥४०३॥
कलि में कामधेनु भक्तजी पर अर्थ परायन भक्त ये, कामधेनु कलियुग्ग के॥
लक्ष्मण लफरा लड्डू सन्त जोधपुर त्यागी। सूरज कुम्भनदास, विमानी खेम विरागी॥ भावन विरही भरत, नफर हरिकेश लटेरा॥ हरिदास अयोध्या चक्रपानि, (दियो) सरजू तट डेरा॥ तिरलोक पुखरदी बिज्जुली, उद्धव वनचर वंस के। पर अर्थ परायन भक्त ये, कामधेनु कलियुग्ग के॥६८॥
श्रीलड्डू भक्तजी
लड्डू नाम भक्त जाय, निकसे विमुख देस, लेशहूँ न सन्तभाव, जानैं पाप पागे हैं। देवी कौं प्रसन्न करें, मानुस को मारि धरैं, लै गये पकरि तहाँ, मारिवे कौं लागे हैं॥ प्रतिमा कौं फारि बिकरार रूप धारि आई, लैकै तरवार, मूँड़ काटे भीजे बागे हैं। आगे नृत्य करैं, दृग भरैं, साधु पाँव धरैं, ऐसे रखवारे जानि, जन अनुरागे हैं॥४०४॥
श्रीसन्तजी
सदा साधुसेवा अनुराग रंग पागि रह्यौ, गह्यौ नेम भिक्षा व्रत, गाँव-गाँव जायकै। आये घर सन्त पूछैं, तिया सौं यों, सन्त कहाँ? सन्त चूल्हे माँझ, कही ऐसे अलसायकै॥ वानी सुनि जानी चले मग सुखदानी मिले, कही कित हुते? सो बखानी उर आयकै। बोली वह साँच, वही आँच ही कौ ध्यान मेरे, आनि गृह फेरि किये मगन जिंवायकै॥४०५॥
श्रीतिलोकजी सुनार
पूरब में ओक, सो तिलोक हो सुनार जाति, पायौ भक्तिसार साधुसेवा उर धारियै। भूप के विवाह, सुता जोरो एक जेहरि कौं, गढ़िवे को दियौ, कह्यौ नीके कै, सँवारियै॥ आवत अनन्त सन्त, औसर न पावैं किहूँ, रहे दिन दोय, भूप रोष यों सँभारियै। ल्यावो रे पकरि, ल्याये, छाड़ियै मकर कही नेकु, रह्यौ काम आवै, नातो मारि डारियै॥४०६॥
आयौ वही दिन, कर छुयौहूँ न इन नृप, करै प्रान बिन, वन माँझ छिप्यौ जायकै। आये नर चारि पाँच, जानी प्रभु आँच, गढ़ि लियौ सो दिखायौ, साँच चले भक्त भायकै। भूप कौ सलाम कियौ, जेहरि कौ जोरौ दियौ, लियो कर देखि, नैन छोड़ैं न अघायकै। भई रीझि भारी, सब चूक मेटि डारी, धन पायौ लै मुरारी, ऐसे बैठे घर आयकै॥४०७॥
१०६) (श्री भक्तमाल भोर ही महोच्छौ कियौ, जोई माँगै सोई दियौ, नाना पकवान रस खान स्वाद लागे हैं। सन्त कौ सरूप धरि, लै प्रसाद गोद भरि, गये तहाँ पावै जू तिलोक गृह पागे हैं।। कौन सो तिलोक? अरे दूसरो तिलोक मैं न, बैन सुनि चैन भयौ, आये निसि रागे हैं। चहल-पहल धन, भर्यौ, घर देखि ठर्यो, प्रभु, पदकंज जानी, मेरे भाग जागे है।।४०८।। अभिलाषपूरक भक्तजी अभिलाष अधिक पूरन करन ये चिन्तामणि चतुरदास।। सोम भीम सोमनाथ विको विशाखा लमध्याना। महदा मुकुन्द गयेश त्रिविक्रम रघु जग जाना।। बालमीकि वृद्धव्यास जगन झाँझू बीठल आचारज। हरभूलाला हरिदास बाहुबल राघव आरज।। लाखा छीतर उद्धव कपूर घाटम घोरी कियौ प्रकास। अभिलाष अधिक पूरन करन ये चिन्तामणि चतुरदास।।६६।। दिग्गज भक्तजी भक्तपाल दिग्गज भगत, ए थानापति सूर धीर।। देवानन्द नरहरियानन्द, मुकुन्द महीपति सन्तराम तम्बोली। खेम श्रीरंग नन्द विष्णु बीदा बाजूसुत जोरी।। छीतम द्वारकादास माधव मांडन रूपा दामोदर। भल नरहरि भगवान बालकान्हर केशव सोहैं घर।। दास प्रयाग लोहंग गुपाल नासूसुत गृह भक्तभीर। भक्तपाल दिग्गज भगत, ए थानापति सूर धीर।। १००।। श्रीहरिभजन परायण भक्तजी बद्रीनाथ उड़ीसे द्वारका, सेवक सब हरिभजन पर।। केसौ पुनि हरिनाथ, भीम खेता गोविन्द ब्रह्मचारी। बालकृष्ण बड़भरथ, अच्युत अपया व्रत धारी।।
श्रीगोविन्दस्वामीजी) (१०७ पण्डा गोपीनाथ, मुकुन्दा, गजपति महाजस। गुननिधि जस गोपाल, देइ भक्तनि कौ सरबस॥ श्रीअंग सदा सानिधि रहें, कृत पुण्यपुंज भल भाग भर। बद्रीनाथ उड़ीसे द्वारका, सेवक सब हरिभजन पर ॥१०१॥ श्रीरुद्रप्रताप गजपतिजी श्रीप्रतापरुद्र, गजपति कौ बखान कियौ, लियौ भक्तिभाव, महाप्रभु पै न देखहीं। कियेहूँ उपाय कोटि, ओटि लै संन्यास लियौ, हियौ अकुलायौ, अहो! किहूँ मोको पेखहीं॥ जगन्नाथ रथ आगे, नृत्य करैं मत्त भये, नीलाचल नृप पाँय पर्यौ भाग लेखहीं। छाती सौं लगायौ, प्रेमसागर बुड़ायौ भयौ, अति मन भायौ, दुख देत ये निमेखहीं॥४०६॥ श्रीहरिसुयश प्रचारक भक्तजी हरि सुजस प्रचुर कर जगत् में, ये कविजन अतिसय उदार॥ विद्यापति ब्रह्मदास, बहोरन चतुरविहारी। गोविन्द गंगा रामलाल बरसानियाँ मंगलकारी॥ प्रियदयाल परसराम, भक्त भाई खाटी कौ। नन्दसुवन की छाप, कवित केशव कौ नीकौ॥ आसकरन पूरन नृपति, भीषम जनदयाल गुन नहिन पार। हरि सुजस प्रचुर कर जगत् में, ये कविजन अतिसय उदार। १०२। श्रीगोविन्दस्वामीजी गोवर्द्धननाथ साथ, खेलैं सदा झेलैं रंग, अंग सख्यभाव, हिये गोविन्द सुनाम है। स्वामी करि ख्यात, ताकी बात सुनि लीजै नीके, सुने सरसात नैन, रीति अभिराम है॥ खेलत हो लाल संग, गयौ उठि दाँव लैके, मारी खैंचि गिल्ली, देखि मन्दिर में स्याम है। मानि अपराध साधु, धक्का दै निकारि दियो, मति सो अगाध कैसे, जानै वह बाम है॥४१०॥ बैठ्यौ कुण्ड तीर जाय, निकसैगो आय वन, दिये हैं लगाय, ताको फल भुगताइयै। लाल हिय सोच पर्यौ, कैसे भयौ जात वह, अऱ्यौ मग माँझ, भोग धर्यौ पै न खाइयै। कही श्रीगुसाँई जू सौं, मोकौं ये न भायो कछू, चाहौ जो खवावौ तौपै, वाकौं जा मनाइये। वाको हुतो दाँव, मोपै सो तौ भाव जान्यौ नहीं, कहै मोसौँ बातै सो कुमारै वेगि ल्याइये॥४११॥
१०८) (श्री भक्तमाल वन-वन खेले बिन, बनत न मोकौं नेकु, भनत जु गारी, अनगनत लगावैगो। सुधि-बुधि मेरी गई, भई बड़ी चिन्ता मोहिं, ल्याइये जू ढूँढ़ि, कहूँ चैन ढिंग आवैगो।। भोग जे लगाये मैं तौ, तनक न पाये रिस, वाकी जब जाय, तब मोहिं कछु भावैगो। चले उठि धाय, नीठ-नीठ कैं मनाय ल्याये, मन्दिर में खाय मिलि, कही गरें लावैगो।।४१२।। गये हैं बहिर भूमि, तहाँ कृष्ण आये झूमि, करी बड़ी धूम, आक बोड़िन सौं मारिकै। इनहूँ निहारि, उठि मार दई वाही सौं जु, कौतुक अपार, सख्यभाव रससारकै।। माता मग चाहै बड़ी, बेर भई आई तहाँ, कहाँ बार लाई ओट, पाई उर धारिकै। आयौ यों विचार, अनुसार सदाचार कियौ, लियौ प्रेम गाढ़ कभूँ, करत सँभारिकै।।४१३।। आवत हो भोग, महासुन्दर मन्दिर कौं, रह्यौ मग बैठि, कही आगै मोहिं दीजिये। भयौ कोप भारी, थार डारि जा पुकार करी, भरी न अनीति जात, सेवा यह लीजिये। बोलिकै सुनाई अहो, कहा मनभाई? तब, बोलिकै बताई, अजू बात कान किजिये। पहिले जु खाय, वन माँझ उठि जाय पाछे, पाऊँ कहाँ धाय, सुनि मति रस भीजिये।।४१४।। मास परायण अठाहरवाँ विश्राम श्रीमथुरामण्डलवासी भक्तजी जे बसे बसत मथुरा मण्डल, ते दयादृष्टि मो पर करौ।। रघुनाथ गोपीनाथ, रामभद्र दासूस्वामी। गुँजामाली चित उत्तम, बीठल मरहठ निहकामी।। यदुनन्दन रघुनाथ रामानन्द, गोविन्द मुरली सोती। हरिदास मिश्र, भगवान् मुकुन्द केसौ दण्डोती।। चतुरभुज चरित्र विष्णुदास, बेनी पद मो सिर धरौ। जे बसे बसत मथुरा मण्डल, ते दयादृष्टि मो पर करौ।।१०३।। श्रीगुँजामालीजी और उनकी पुत्रवधू कही नाभा स्वामी आप, गायौ मैं प्रताप सन्त, बसे ब्रज बसैं सो तौ, महिमा अपार है। भये गुँजामाली, गुँजाहार धारि नाम पर्यौ, कर्यौ वास लाहौर में, आगें सुनौ सार है।। सुत बधू विधवा सौं, बोलिकै सुनायौ लेहु, धनपति गेह श्रीगोपाल भरतार है। देवौ प्रभुसेवा माँगे, नारि बार-बार यहै, डारै सब वारि यापै, गनै जग छार है।।४१५।।
श्रीगणेशदेईरानी) (१०६ दई सेवा वाहि, और घर धन तिया दियौ, लियौ ब्रजवास, वाकी प्रीति सुनि लीजिये। ठाकुर विराजैं तहाँ, खेलैं सुत औरनि के, डारैं ईंटा खोहा, पर्यौ प्रभु पर खीझियै॥ दिये वे बिझारि, धर्यौ भोग पै न खात हरि, पूछी कही वेई आवैं, तबही तौ जीजियै। कह्यौ रिस भरि, धूरि नीकी भोर डारौं भरि, खावौ अब हा-हा करी, पायौ ल्याई रीझियै॥४१६॥ श्रीभक्तराज युवतीजनजी कलिजुग जुवतीजन भक्तराज, महिमा सब जानै जगत्॥ सीता झाली सुमति सोभा प्रभुता उमा भटियानी। गंगा गौरी कुँवरि उबीठा, गोपाली गनेसदे रानी॥ कला लखा कृतगढौ, मानमती सुचि सतिभामा। जमुना कोली रामा, मृगा देवादे भक्तन विश्रामा॥ जुग जेवा कीकी कमला, देवकी हीरा हरिचेरी पोखे भगत। कलिजुग जुवतीजन भक्तराज, महिमा सब जानै जगत्॥१०४॥ श्रीगणेशदेई रानीजी मधुकरसाह भूप भयौ देस ओड़छे कौ, रानी सो गनेसदेई काम बाँकौ कियौ है। आवैं बहु सन्त सेवा करत अनन्त भाँति, रह्यौ एक साधु, खान-पान सुख लियौ है॥ निपट अकेली देखि, बोल्यौ धन थैली कहाँ? होय तौ बताऊँ, सब तुम जानौ हियौ है। मारी जाँघ छुरी, लखि लोहू वेगि भागि गयौ, भयौ सोच जानै जिनि, राजा बन्द दियौ है॥४०७॥ बाँधि नीकी भाँति पौढ़ि, रही कही काहू सौं न, आयो ढिंग राजा, मति आवौ तिया धर्म है। बीते दिन तीन, जानी वेदन नवीन कछू, कहिये प्रवीन मोसौँ, खोलि सब मर्म है॥ टारी बार दोय चारि, नृप के विचार पर्यो, कर्यौ समाधान जिन, आनौ जिय भर्म है। फिर्यौ आस-पास भूमि, पर तन रास करी, भक्तिकौ प्रभाव छाँड़ि, तिया पति सर्म है॥४१८॥ हरि के सम्मत जे भगत, ते दासनि के दास॥ नरबाहन बाहन बरीस जापू जैमल बीदावत। जयन्त धारा रूपा अनुभई ऊदारावत।
गम्भीरे अर्जुन जनार्दन गोविन्द जीता। दामोदर साँपिले गदा ईश्वर हेमविदीता॥ मयानन्द महिमा अनन्त, गुढीले तुलसीदास। हरि के सम्मत जे, भगत, ते दासनि के दास॥१०५॥ श्रीनरबाहनजी रहैं भौगाँव नांव नरबाहन साधुसेवी, लूटि लई नाव, जाकी बन्दीखानै दियौ है। लौंड़ी आवै दैन कछू, खायवे को, आई दया, अति अकुलाई लै, उपाय यह कियौ है॥ बोलौ राधवल्लभ औ, लेवौ हरिवंश नाम, पूछै शिष्य नाम कहौ, पूछी नाम लियौ है। दई मँगवाय वस्तु, राखियो दुराय बात, आय दास भयौ, कही रीझि पद दियौ है॥४१६॥ श्रीमुख पूजा सन्त की, आपुन तें अधिकी कही॥ यहै वचन परमान, दास गाँवरी जटीयाने भाऊ। बूँदी बनियाँ राम, मँड़ौते मोहनवारी दाऊ॥ माड़ौठी जगदीसदास, लछमन चट्टूथावल भारी। सुनपथ में भगवान, सबै सलखान गुपाल उधारी॥ जोबनेर गोपाल के, भक्त इष्टा निर्वही। श्रीमुख पूजा सन्त की, आपुन तें अधिकी कही॥१०६॥ श्रीगोपालदास जोबनेरी जोबनेर वास, सो गोपाल भक्त-इष्ट ताकौं, कियौ निर्वाह बात, मोकौं लागी प्यारियै। भयौ हो विरक्त कोऊ कुल में प्रसंग सुन्यौ, आयौ यों परीच्छा लैन, द्वार पै विचारियै॥ आय पर्यौ पाँय, पाँय धारौ निज मन्दिर में, सुन्दरी न देखौं मुख, पन कैसे टारियै। चलो जिन टारौ तिया, रहैंगी किनारौ करि, चले सब छिपीं नेकु, देखी याकै मारियै॥४२०॥ एक पै तमाचो दियौ, दूसरे ने रोष कियौ, देवौ या कपोल पै यों, वानी कही प्यारी है। सुनि आँसू भरि आये, जाय लपटाये पाँय, कैसे कही जाय, यह रीति कछु न्यारी है॥ भक्त इष्ट सुन्यौ मेरे, बड़ौ अचरज भयौ, लई मैं परीच्छा, भई सिच्छ मोकौं भारी है। बोल्यौ अकुलाय, अजू पैयै कहाँ भाय ऐपै, साधु सुख पाय कहैं, यही मेरी ज्यारी है॥४२१॥
श्रीलाखाजी) (१११ श्रीलाखाजी परमहंस वंशानि में, भयौ विभागी बानरौ॥ मुरधरखण्ड निवास, भूप सब आज्ञाकारी। राम-नाम विश्वास, भक्त पद रज व्रतधारी। जगन्नाथ के द्वार, दँडौतनि प्रभु पै धायौ। दई दास की दादि, हुण्डी करि फेरि पठायौ॥ सुरधुनी ओघ संसर्ग तैं, नाम बदल कुच्छित नरौ। परमहंस वंशानि में, भयौ विभागी बानरौ॥१०७॥ लाखा नाम भक्त, वाकौ बानरौ बखान कियौ, कहै, जग डूब, जासौ मेरो सिरमौर है। करैं साधुसेवा बहु, पाक डारि मेवा, सन्त जेंवत अनन्त, सुख पावै कौर-कौर है॥ ऐसे में अकाल पर्यौ, आवैं धरि माल-जाल, कैसे प्रतिपाल करैं, ताकी और ठौर है। प्रभु जू स्वपन दियौ, कियौं में जतन एक, गाड़ी भरि गेहूँ भैंसि, आवै करौ गौर है॥४२२॥ गेहूँ कोठी डारि मुँह, मूँदि नीचे देवो खोलि, निकसै अतोल, पीसि रोटी लै बनाइयै। दूध जितौ होय, सो जमायके विलोय लीजै, दीजै यों चुपिरि संग, छाछ दै जिंवाइयै॥ खुलि गई आँखें, भाखैं तिया सौं जु आज्ञा दई, भई मनभाई, अजू हरिगुन गाइयै। भोर भयैं गाड़ी भैंसि, आई वही रीति करी, करी साधुसेवा नाना भाँतिन रिझाइयै॥४२३॥ आई कौन रीति, वाकी प्रीतिहूँ बखान कीजै, लीजै उरधारि, सार भक्ति निरधार है। रहै ढिंग गाँव, तहाँ सभा एक ठाव भई, टूटि गयौ भाई, सो उगाही कौ विचार है॥ बोलि उठ्यौ कोऊ, यों व्यौहार को तौ भार चुक्यौ, लीजियै सँभारि लाखा सन्त भवपार है।। लाज दबि तिन दिये, गेहूँ लै पचास मन, दई निज भैंसि सग सब सरदार है॥४२४॥ मारबाड़ देस तैं, चल्यौई साष्टांग किये, हिये जगन्नाथदेव, याही पन जाइयै। नेह भरि भारी, देह वारि फेरि डारी, कैसें करै तनधारी, नेकु श्रम मुरझाइयै॥ पहुँचौ निकट जाय, पालकी पठाइ दई, कहैं लाखा भक्त कौन? वेगि दै बताइयै। काहू कहि दियौ, जाय कर गहि लियौ, अजू! चलौ प्रभु पास इहि छिनहिं बुलाइयै॥४२५॥ कैसे चढौं पालकी में?, पन प्रतिपाल कीजै, दीजै मोकौं दान, यही भाँति जा निहारियै। बोले प्रभु कही यों, सुमिरनी बनाय ल्याये, अब पहिराय मोहिं सुनि उर धारियै॥
११२) (श्री भक्तमाल) चले चढ़ि-बढ़ि, कियौ चाहैं यह जानी मैं तौ, पढ़ि-पढ़ि पोथी प्रेम मोपै बिसतारियै। जायकै निहारे, तन मन प्रान वारे, जगन्नाथ जू के प्यारे, नेकु ढिंग तें न टारियै।।४२६।। बेटी एक क्याँरी, ब्याहि देत न विचारी, मन, धन हरि साधुनि कौ, कैसे कै लगाइयै। कीजै वाकौ काज कही, जगन्नाथदेव जू ने, लीजै मोपै द्रव्य, उर नेकहूँ न आइयै।। विदा पै न भये, चले, दृग भरि लये गये, आगे नृप भक्त, मग चौकी अटकाइयै। दियौ है सुपन प्रभु, जिनि हठ करौ आजू, हुण्डी लिखि दई लई, बिनै कै जताइयै।।४२७।। हुण्डी सो हजार की यों, लैकै गृहद्वार आये, तामें ते लगायौ सौक, बेटी ब्याह कियौ है। और सब सन्तनि, बुलायकैँ खवाय दिये, लिये पग दास, सुखरासि पन लियौ है।। ऐसें ही बहुत दाम, वाही के निमित्त लै-लै, सन्त भुगताये अति हरषित हियौ है। चरित अपार, कछु मति अनुसार कह्यौ, लह्यौ जिन स्वाद, सो तौ पाय निधि जियौ है।।४२८।। मास परायण उन्नीसवाँ विश्राम श्रीनरसीजी जगत् विदित नरसी भगत, (जिन) गुज्जर धर पावन करी। महास्मारत लोग, भक्ति लौलेश न जानैं। माला मुद्रा देखि, तासु की निन्दा ठानैं।। ऐसे कुल उत्पन्न, भयौ भागौत सिरोमनि। ऊसर तें सर कियौ, खण्डदोषहिं खोयो जिनि।। बहुत ठौर परचै दियौ, रसरीति भक्ति हिरदै धरी। जगत् विदित नरसी भगत, (जिन) गुज्जर धर पावन करी।।१०८।। जूनागढ़ वास, पिता-माता तन नास भयौ, रहै एक भाई, औ भौजाई रिस भरी है। डोलत-फिरत आय, बोलत पियावौ नीर, भाभी पै न जानी पीर, बोली जरीबरी है।। आवत कमाये जल, प्याये बिन सरै कैसे?, पियौ यों जवाब दियौ, देह थरथरी है। निकसे विचारि कहूँ, दीजै तन डारि मानौ, शिव पै पुकार करी, रहे चित धरी है।।४२६।। बीते दिन सात, शिव धाम तें न जात, बार, परै काहू तुच्छ द्वार, सोऊ सुधि लेत है। इतनी विचारि, भूख-प्यास दई टारि, लियौ प्रगट सरूप धारि, भयौ हिये हेत है।। बोले वर माँग आजू, माँगिवौ न जानत हौं, तुम्हें जोई प्यारौ, सोई देवो चितचेत है। पर्यो सोच भारी, मेरी प्रान-प्यारी नारी, तासौं कहत डरत वेद, कहै नेति-नेति है।।४३०।।