भारतकोश
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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

४. गौड़ीय, निम्बार्क एवं अन्य सम्प्रदाय के संत (चैतन्य, रूप-सनातन)

११९६) (श्री भक्तमाल ठौर-ठौर पकवान, होत तिया गान करै, घुरत निसान कान सुनिये न बात है। चित्रमुख किये, लै विचित्र पट्टरानी आप, घोरी रंग बोरी पै, चढ़ायौ सुत रात है।। करी सो ज्यौनार, तामें मानस अपार आये, द्विजनि विचारि, पोट बाँधी पै न मात है। मणिमय ही साज-बाज, गज रथ ऊँट कोर, झमकै किशोर आज, सजी यों बरात है।।४५२।। नरसी सौं कहें गहैं हाथ, तुम साथ चलौ, अन्तरिच्छ में हूँ चलौं, इति बात मानिये। कही अजू! जानौ तुम, मैं तो हिये आनौं यहैं, लहै सुख मन मेरो, फेंट ताल आनिये।। आप ही विचारि सब, भार सौं उठाइ लियो, दिया डेरा पुरी, समधी की पहिचानिये। मानस पठायौ, दिन आयौ पै न आये, अहो!, देखें छबि छाये, नर पूछैं जू बखानिये।।४५३।। नरसी बरात मत जानौ यह नरसी की नरसी न पावै ऐसी समझ अपार है। आयकै सुनाई सुधि-बुधि बिसराई अहो करत हँसाई बात भाखौ निरधार है।। गयौ जो सगाई करि दर वर आयौ द्विज अंग में न मात कैसे रंग बिसतार है। कही एक घास धनरासि सौं न पूजै किहूँ चहुँदिसि पूरि रही देखौ भक्तिसार है।।४५४।। चले अचरज मानि, देखि अभिमान गयौ, लयौ पाछौ ब्राह्मन को, हमें राखि लीजिये। जाइ गहि पाँय, रह्यौ, भाय भरि दया करौ, गये दृग भरै पाँव, परै कृपा कीजिये।। मिले भरि अँक लै, दिखायौ सो मयंक मुख, हूजिये निशंक इन्हे, भार सुता दीजिये। ब्याह करि आये, भक्तिभाव लपटाये सब, गाये गुण जाने, जेते सुनि-सुनि जीजिये।।४५५।। मास परायण बीसवाँ विश्राम श्रीयशोधरजी दिवदास वंश, जसोधर सदन, भई भक्ति अनपायनी।। सुत कलत्र सम्मत, सबै गोविन्द परायन। सेवत हरि हरिदास, द्रवत मुख राम रसायन।। सीतापति कौ सुजस, प्रथम ही गवन बखान्यौ। द्वै सुत दीजै मोहिं, कवित सबही जग जान्यौ।। गिरा गदित लीला मधुर, सन्तनि आनन्ददायिनी। दिवदास वंश, जसोधर सदन, भई भक्ति अनपायनी।।१०६।। नवाह परायण षष्ठ विश्राम

श्रीमाधवदासजी) (११७ श्रीनन्ददासजी (श्री) नन्ददास आनन्द निधि, रसिक सु प्रभु हित रँग मगे॥ लीला पद रस रीति, ग्रन्थ रचना में नागर। सरस उक्ति जुत जुक्ति, भक्तिरस गान उजागर॥ प्रचुर पयध लौं सुजस, रामपुर ग्राम निवासी। सकल सुकुल सम्बलित, भक्तपद रेनु उपासी॥ चन्द्रहास अग्रज सुहृद्, परम प्रेम पै में पगे। (श्री) नन्ददास आनन्द निधि, रसिक सु प्रभु हित रँग मगे॥ ११०॥ श्रीजनगोपालजी संसार सकल व्यापक भई, जकरी जन गोपाल की॥ भक्ति तेज अति भाल, सन्त मण्डल कौ मण्डन। बुधि प्रवेश भागौत, ग्रन्थि संशय कौ खण्डन॥ नरहड़ ग्राम निवास, देश बागड़ निस्तार्यौ। नवधा भजन प्रबोध, अनन्य दासन व्रत धार्यौ॥ भक्त कृपा बांछी, सदा पदरज राधा लाल की। संसार सकल व्यापक भई, जकरी जन गोपाल की॥१११॥ श्रीमाधवदाजी माधव दृढ़ महि ऊपरै, प्रचुर करी लोटन भगति॥ प्रसिद्ध प्रेम की राशि, गढ़ागढ़ परचौ दीयौ। ऊँचे तें भयौ पात, स्याम साँचौ पन कीयौ॥ सुत नाती पुनि, सदृश चलत ऊही परिपाटी। भक्तनि सौं अति प्रेम, नेम नहीं किहुँ अँग घाटी॥ नृत्य करत नहिं तन सँभार, समसर जनकन की सकति। माधव दृढ़ महि ऊपरै, प्रचुर करी लोटन भगति॥ ११२॥

११८) (श्री भक्तमाल गढ़ागढ़ पुर नाम, माधौ बढ़ि प्रेम भूमि, लोटैं जब नृत्य करैं, भूलैं सुधि अंग की। भूपति विमुख झूठ, जानिकै परीक्ष्ण लई, आनि तीन छाति पर, देखी गति रंग की।। नूपुरनि बाँधि नाचि, साँच सो दिखाय दियौ, गिर्यौ हू कराह मध्य, जियौ मति पंग की। बड़ौ त्रास भयौ नृप, दास बिसवास बढ़यौ, बढ़यौ उर भाव, रति न्यारी या प्रसंग की।।४५६।। श्रीअंगदजी अभिलाष भक्त अंगद कौ, पुरुषोत्तम पूरन कर्यौ।। नग अमोल इक ताहि, सबै भूपति मिलि जाचैं। साम दाम बहु करैं, दास नाहिन मत काचैं।। एक समै संकष्ट, लेय पानी महँ डार्यौ। प्रभो तिहारी वस्तु, वदन ते वचन उचार्यौ।। पाँच दोय सत कोस ते, हरि हीरा लै उर धर्यौ। अभिलाष भक्त अंगद कौ पुरुषोत्तम पूरन कर्यौ।।११३।। रायसेन गढ़ वास, नृप सो सिलाहदी जू, ताको यह काका रहे, अंगद विमुख है। ताकी नारी प्यारी, प्रभु साधुसेवा धारी उर, आये गुरू घर कहैं, कृष्ण कथा सुख है।। बैठे भौन कौन?, देखि कैसें मौन रह्यो जात?, बोल्यो तिया जात कहा, करौ नर रुख है। सुनि उठि गये, बधू अन्न-जल त्यागि दये, लये पाँव जाय, विषै वश भयौ दुख है।।४५७।। मुख न दिखावै याहि, देख्यो ही सुहावै कही, भावै सोई करौ, नेकु वदन दिखाइयै। मैं हूँ जल त्यागि दियौ, अन्न जात कापै लियौ, जीवौं तब नीके, जब आपु कछु खाइयै।। बोली मोसौ 'बोलौ, जिन छाँड़ौ तन याही छिन, पन साँचौ होतौ, तोपै सुनत समाइयै'। 'कहौ अब कीजै जोई, मेरी मति गई खोई', भोई उर दया, बात कहि समझाइयै।।४५८।। 'वेई गुरु करौ जाय, पाँयन में परौ' गयौ, चायनि लिवाय ल्यायौ, भयौ शिष्य दीन है। धारी उर माल, भाल तिलक बनाय कियौ, लियो सीत, प्रीति कोऊ उपजी नवीन है।। चढ़ी फौज संग चढ़यौ, बैरी पुर मारि बढ़यौ, कढ़यौ टोपी लैके हीरा सत एक पीन है। डारे सब बेंच पागपेच मध्य रख्यौ मुख्य, भाष्यौ 'सो अमोल करौं जगन्नाथ लीन है'।।४५६।। कानाकानी भई नृप बात सुनि लई कही, 'हीरा वह देव तोपै और माफ किये हैं'। आय समुझावैं बहु जुगति बनावैं याके, मन में न आवैं जाय सबै कहि दिये हैं।।

श्रीचतुर्भुजजी नृपति) (११६ अंगद बहिन लागै वाकी भूवा पागै वासौं, 'देवो विष मारौ फिर तूही पग छिये हैं'। करत रसोई घोरि गरल मिलायो पाक, भोग हूँ लगायो 'अजू आवो' बोलि लिये हैं॥४६०॥ वाकी एक सुता संग लैवै बैठै जेंवन कौं, आई सो छिपाय कही 'जेंवौ कहूँ गई है'। जेंवत न बोधि हारी तब सो विचारी प्रीति, भीति रोय मिली गरें रीति कहि दई है॥ प्रभु लै जिवाये राँड-भाँड कै निकासि द्वार, दै करि किवार सब पायौ ओप नई है। वह दुख हियें रह्यौ कह्यौ कैसे जात काहू? बात सुनी नृपहूँ नै जैसी भाँति भई है॥४६१॥ चले नीलाचल हीरा जाय पहिराय आवैं, आय घेरि लीने नृप नरनि खिसायकै। कही डारि देवौ कै लराई सनमुख लेवौ, बस न हमारौ भूप आज्ञा आये धायकै॥ बोले 'नेकु रहौ मैं अन्हाय पकराय देत,' हेत मन और जल डार्यौ लै दिखायकै। 'वस्तु है तिहारी प्रभु लीजिये' उचारी यह, वानी लागी प्यारी उर धारी सुख पायकै॥४६२॥ ऐतौ घर आये वे तो जल मधि कूदि छाये, अति अकुलाये नेकु खोजहूँ न पायौ है। राजा चलि आयौ सब नीर कढ़वायौ कीच, देखि मुरझायौ दुखसागर अन्हायौ है॥ जगन्नाथदेव आज्ञा दई 'वाहि सुधि देवौ', आयकै सुनाई नर-तन बिसरायौ है। गयौ जाय देख्यौ उर पर जगमग रह्यौ, लह्यौ सुख नैननि कौ कापै जात गायौ है॥४६३॥ राजा हिय ताप भयौ दयौ अन्न त्यागि कह्यौ, आवै जोपै भाग मेरे ब्राह्मन पठाये हैं। धरनौ दे रहे कहे नृप के वचन सब, तब ह्वै दयाल आप पुर ढिंग आये हैं॥ भूप सुनि आगे आय पाँय लपटाय गयौ, लयौ उर लाय दृग नीर लै भिजाये हैं। राजा सरबसु दियौ जियो हरिभक्ति कियौ, हियो सरसायौ गुन जाने जिते गाये हैं॥४६४॥ श्रीचतुर्भुजजी नृपति चतुर्भुज नृपति की भक्ति को, कौन भूप सरवर करें॥ भक्त आगमन सुनत, सनमुख जोजन इक जाई। सदन आनि सत्कार, सदृश गोविन्द बड़ाई॥ पाद प्रछालन सुहथ, राय रानी मन साँचै। धूप दीप नैवेद्य, बहुरि तिन आगें नाचै॥ यह रीति करौलीधीश की, तन मन धन आगे धरैं। चतुर्भुज नृपति की भक्ति कौ कौन भूप सरवर करें॥११४॥

१२०) (श्री भक्तमाल पुर ढिंग चारों ओर चौकी राखी जोजन पै, जो जन ही आवैं तिन्हें ल्यावत लिवायकै। मालाधारी दास मानि आवै कोऊ द्वार जोपै, करै वही रीति सो सुनाई छप्पै गायकै। सुनी एक भूप भक्त निपट अनूप कथा, सबकों भण्डार खोलि देत बोल्यौ धायकै। पात्र औ अपात्र यों विचार ही जो नाहीं तौपै, कहा ऐसी बात? दई नेकु मैं उड़ायकै।।४६५।। भागवत गावै भक्तभूप एक विप्र तहाँ, बोलिकें सुनावै 'ऐसी मन जिन ल्याइयै'। पावै आशै कौन हृदय भौन में प्रवेश करि? भरि अनुराग कही उर मधि आइयै।। करी लै परीक्षा भाट विमुख पठाय दियौ, दियौ माला तिलक सो दास यों सुनाइयै। गयौ, गयौ भूलि फूलि कुल विसतार कियौ, लियौ पहिचानि अब जान कैसे पाइयै।।४६६।। बीते दिन बीस तीस आई वह सीख सुधि, कही हरिदास कोऊ आयौ यों सुनाइयै। बोले जू निशंक जावौ गावौ गुन गोविन्द के, आये घर मध्य भूप करी जैसी भाइयै।। भक्ति के प्रसंग कौ न रंग कहूँ नेकु जान्यौ, जान्यौ उनमान सौं परीक्षा मँगवाइयै। दियौ लै भण्डार खोलि लियौ मन मान्यौ दई, सम्पुट में कौड़ी डारि जरी लपटाइयै।।४६७।। आयौ वाही राजा पास सभा में प्रकास कियौ, लियौ धन दियौ पाछे सोई लै दिखायौ है। खोलिकै लपेटा मध्य सम्पुट निहारि कौड़ी, समुझि विचारै हारै मन में न आयौ है।। बड़ौ भागवत विप्र पण्डित प्रवीन महा, निसि रसलीन जानि आयकै बतायौ है। कर्यौ उनमान भक्ति मानिवौ प्रमान जरी, मूँदिकै पठाई ताहि गुन समझायौ है।।४६८।। राजा रीझि पाँव गहे कहे जू वचन नीके, ऐपै नेकु आप जाय तत्व याकौ ल्याइयै। आये दौर पाँव लपटाय भूप भाय भरे, परे प्रेमसागर में चरचा चलाइयै।। चलिवे न देत सुख देत चले लोल मन, खोलिकै भण्डार दियौ लियौ न रिझाइयै।। उभै सुवा सारौ कही एक करधारौ मेरे, दई अकुलाय लई मानौ निधि पाइयै।।४६६।। आयौ राजसभा बहु बातनि अखारौ जहाँ, बोलि उठी सारौ कृष्ण कहौ झारि डोरे हैं। पूछैं नृप कहौ अहो! लहौ सब याही सौं जू, पच्छी वा समाज रहै हरि प्रान प्यारे हैं।। कोटि-कोटि रसना बखानौं पै न पाऊँ पार सार सुनि भक्ति आय सीस पाँव धारे हैं। राखौ यह खग पगे रह्यौ तन मन स्याम अति अभिराम रीति मिले औ पधारे हैं।।४७०।। मास परायण इक्कीसवाँ विश्राम श्रीमीराजी लोकलाज कुल श्रृंखला, तजि मीरा गिरिधर भजी।। सदृश गोपिका प्रेम, प्रगट कलिजुगहिं दिखायौ। निरंकुश, अति निडर, रसिक जस रसना गायौ।।

श्रीमीराजी) (१२१ दुष्टनि दोष विचारि, मृत्यु को, उद्यम कीयौ। बार न बाँकौ भयौ, गरल अमृत ज्यौं पीयौ॥ भक्ति निसान बजायकै, काहू ते नाहिन लजी। लोकलाज कुल शृंखला, तजि मीरा गिरिधर भजी।।११५।।

मेरतौ जनम भूमि, झूमि हित नैन लगे, पगे गिरिधारीलाल, पिता ही के धाम में। राना कै सगाई भई, करी ब्याह सामा नई, गई मति बूडि वा रँगीले घनस्याम में।। भाँवरैं परत मन, साँवरे सरूप माँझ, ताँवरैं-सी आवैं, चलिवे कौ पति ग्राम में। पूछैं पिता-माता पट, आभरन लीजियै जू, लोचन भरत नीर कहा काम दाम में ।।४७१।।

देवौ गिरिधारीलाल, जौ निहाल कियौ चाहौ, और धनमाल सब रखियै उठायकै। बेटी अति प्यारी, प्रीति रंग चढ़यौ भारी, रोय मिली महतारी, कही लीजियै लड़ायकै।। डोला पधराय, दृग-दृग सौं लगाय, चलीं सुख न समाय, चाय प्रानपति पायकै। पहुँचीं भवन सासु, देवी पै गवन कियौ, तिया अरू वर, गाँठजोरौ कर्यो भायकै।।४७२।।

देवी के पुजायवे कौं, कियौ ले उपाय सासु, वर पै पुजाइ, पुनि बधू पूजि भाखियै। बोली जू बिकायो माथौ, लाल गिरिधारी हाथ, और कौ न नवै एक, वही अभिलाखियै।। बढ़त सुहाग याके, पूजे ताते पूजा करो, करौ जिनि हठ, सीस पाँयनि पै राखियै। कही बार-बार, तुम यही निरधार जानौ, वही सुकुमार जापै, वारि फेरि नाखियै।।४७३।।

तबतौ खिसानी भई, अति जरि बरि गई, गई पति पास, यह बधू नहीं काम की। अबहीं जवाब दियौ, कियौ अपमान मेरो, आगे क्यौं प्रमान करै? भरै स्वांस चाम की।। राना सुनि कोप कर्यौ, धर्यौ हिये मारिवोई, दई ठौर न्यारी देखि, रीझी मति बाम की। लालनि लड़ावै, गुन गायकै मल्हावै, साधुसंग ही सुहावै, जिन्हें लागी चाह स्याम की।।४७४।।

आयकै ननन्द कहै, गहे किन चेत भाभी!, साधुनि सौं हेत में, कलंक लागै भारियै। राना देशपति लाजै, बाप कुल रीति जात, मानि लीजै बात, वेगि संग निरवारियै।। लागे प्रान साथ, सन्त पावत अनन्त सुख, जाको दुख होय ताको, नीके करि टारियै। सुनिकै कटोरा भरि, गरल पठाय दियौ, लियौ करि पान, रंग चढ़यौ यों निहारियै।।४७५।।

गरल पठायौ सो तौ, सीस लै चढ़ायौ संग, त्याग विष भारी, ताकी झार न सँभारी है। राना नै लगायौ चर, बैठे साधु ढिंग ढर, तबही खबर कर, मारौ यहै धारी है।।

१२२) (श्री भक्तमाल राजैं गिरिधारीलाल, तिनहीं सौं रंग जाल, बोलत हँसत ख्याल कान परी प्यारी है। जायकै सुनाई, भई अति चपलाई, आयौ लिये तरवार दै, किवार खोलि न्यारी है।।४७६।। जाके संग रंग भींजि, करत प्रसंग नाना, कहाँ वह नर गयौ, वेगि दै बताइयै। आगे ही विराजै कछू तोसों नहीं लाजै अभूँ, देखि सुख साजै, आँखें खोलि दरसाइयै।। भयौई खिसानौ, राना लिख्यौ चित्र भीत मानौ, उलटि पयानौ कियौ नेकु मन आइये। देख्यौ हूँ प्रभाव ऐपै, भाव में न भिद्यौ जाइ, बिना हरिकृपा कहो, कैसे करि पाइयै।।४७७।। विषई कुटिल एक, भेष धरि साधु लियौ, कियौ यों प्रसंग, मोसों अंग-संग कीजियै। आज्ञा मोकौं दई आप, लाल गिरिधारी अहो, सीस धरि लई करि, भोजन हूँ लीजिये।। सन्तनि समाज में, बिछाय सेज बोलि लियौ, शंक अब कौन की, निशंक रस भीजियै। सेत मुख भयौ, विषैभाव सब गयौ, नयौ पाँयन पै आय, मोकौं भक्तिदान दीजियै।।४७८।। रूप की निकाई भूप, अकबर भाई हिये, लिये, संग तानसेन देखिवे कौं आयो है। निरखि निहाल भयौ, छबि गिरिधारीलाल, पद सुखजाल एक, तबही चढ़ायो है।। वृन्दावन आई, जीव गुसाँई सौं मिलि झिली, तिया मुख देखिवे को, पन लै छुटायो है। देखि कुँज-कुँज, लाल प्यारी सुखपुंज भरी, धरी उर माँझ आय, देश वन गायो है।।४७६।। राना की मलीन मति, देखि बसी द्वारावति, रति गिरिधारीलाल, नित ही लड़ाइयै। लागी चटपटी भूप, भक्ति कौ सरूप जानि, अति दुख मानि, विप्र श्रेणी लै पठाइयै।। वेगि लैकेँ आवौ मोकौं, प्रान दै जिवावौ अहो, गये द्वार धरनौ दै, विनती सुनाइयै। सुनि विदा होन गई, राय रनछोर जू पै, छाँड़ौं राखौ हीन, लीन भई नहीं पाइयै।।४८०।। श्रीपृथ्वीराजजी आमेर नरेश आमेर अछत कूरम कौ, द्वारकानाथ दरसन दियौ।। श्रीकृष्णदास उपदेश, परमतत्त्व परचौ पायौ। निरगुन सगुन निरूप, तिमिर अज्ञान नसायौ।। काछ वाच निकलंक, मनौ गांगेय युधिष्ठिर। हरि पूजा प्रह्लाद, धर्मध्वज धारी जग पर।। पृथ्वीराज परचौ प्रगट, तन शंख चक्र मण्डित कियौ। आमेर अछत कूरम कौ, द्वारकानाथ दरसन दियौ।।११६।।

श्रीपृथ्वीराज जी) (१२३ श्रीपृथ्वीराजजी पृथ्वीराज राजा चल्यौ, द्वारका श्रीस्वामी संग, अति रसरंग भर्यौ, आज्ञा प्रभु पाई है। सुनिकै दीवान, दुख मानि निसि कान लग्यौ, कही पग्यो साधुसेवा, भक्ति घर छाई है।। देखियै निहारिकै, विचार कीजै इच्छा जोई, लीजै नहीं साथ, जावो बात ले दुराई है। आयौ भोर भूप, हाथ जोरि करि ठाढ़ौ रह्यौ, कह्यौ रहौ देस सो, निदेस न सुहाई है।।४८१।। द्वारावतीनाथ देखौं, गोमती स्नान करौं, धरौं भुज छाप आप, मन अभिलाखियै। चिन्ता जिनि कीजै, तीनों बात इहाँ लीजै अजू, दीजै जोई आज्ञा सोई, सिर धरि राखियै। आये पहुँचाय दूर, नैन जल पूरि बहै, दहै उर भारी, कहाँ संग रस चाखियै। बीते दिन दोय, निसि रहे हुते सोइ, भोइ गई भक्ति गिरा, आय वानी मधु, भाखियै।।४८२।। अहो पृथ्वीराज कही, स्वामी ही सी वानी लही, आयौ उठि दौरि, वाही ठौर प्रभु देखे हैं। घूम्यौ कह्यौ कान, धरौ गोमती स्नान करौ, सुनिकै अन्हह्यौ पुनि, वे न कहूँ पेखे हैं।। शंख चक्र आदि छाप, तन सब व्यापि गई, भई यों अबार रानी, आय अबरेखे हैं। बोले रह्यौ नीर में, सरीर लै सनाथ कीजै, लीजै नाथ हियैं निज, भाग करि लेखे हैं।।४८३।। भयौ जब भोर, पुर बड़ौ भक्ति शोर पर्यौ, पर्यौ आनि दरसन, भई भीर भारी है। आये बहु सन्त औ महन्त बड़े-बड़े धाये, अति सुख पाये देह, रचना निहारी है।। नाना भेंट आवैं हित, महिमा सुनावैं राजा, सुनत लजावैं जानी, कृपा वनवारी है। मन्दिर करायौ, प्रभुरूप पधरायौ सब, जग जस गायौ कथा, मोकौं लागी प्यारी है।।४८४।। विप्र दृगहीन सो, अनाथ बैजनाथ द्वार पर्यौ, चख चाहै मास, केतिक बिहाने हैं। आज्ञा बार दोय चार, भई ये न फेरि होहिं, याको हठसार देखि, शिव पिघलाने हैं।। पृथ्वीराज अंग के, अँगोछा सौं अँगोछौ जाय, आयकै सुनाई द्विज, गौरव डेराने हैं। नयौ मँगवाय तन, छ्वाय दियौ छ्वायौ नैन, खुले चैन, भयौ जन लखि सरसाने हैं।।४८५।। भक्तनि कौ आदर अधिक, राजवंश में इन कियौ।। लघु मधुरा मेरता, भक्त अति जैमल पोषे। टोड़े भजन निधान, रामचन्द्र हरिजन तोषे।। अभैराम एक रसहिं, नेम नींवा के भारी। करमशील सुरतान भगवान्, बीरम भूपति व्रतधारी।।

१२४) (श्री भक्तमाल ईश्वर अखैराज रायमल, कन्हर मधुकर नृप सरबसु दियौ। भक्तनि कौ आदर अधिक, राजवंश में इन कियौ।।११७।। श्रीजयमलजी मेरतें बसत भूप भक्ति को सरूप जानै, जैमल अनूप जाकी कथा कहि आये हैं। करी साधुसेवा, रीति प्रीति की प्रतीति भई, नई एक सुनौ हरि कैसे कै लड़ाये हैं।। नीचे मान मन्दिर सो सुन्दर विचारी बात, छत पर बँगल़ा के, चित्र लै बनाये हैं। विविध बिछौना सेज, राजत उड़ौना पानदान धरि सोंना, जरी परदा सिंवाये हैं।।४८६।। ताकी दारु सीढ़ी करि, रचना उतारि धरें, भरें दूरि चौकी आप, भाव स्वच्छताई है। मानसी विचारें, लाल सेज पग धारें, पान खात लै उगार डारैं, पौढ़े सुखदाई है।। तिया हू न भेद जानै सो निसेनी धरी वानै, देखिकै किसोर सोयौ, फिरी भोर आई है। पति को सुनाई भई, अति मनभाई वाकौ, खीझि डरपाई जानी, भाग अधिकाई है।।४८७।। श्रीमद्युकरशाहजी मधुकरशाह नाम, कियौ लै सफल जातें, भेष गुनसार ग्रहै, तजत असार है। ओड़छे कौ भूप, भक्तभूप सुखरूप भयौ, लयौ पन भारी जाके और न विचार है।। कण्ठी धरि आवै कोय, धोय पग पीवै सदा, भाई दूखि खर गर, डार्यौ माल भार है। पाँव परछाल कही, आज जू निहाल किये, हिये द्रब्ये दुष्ट, पाँव गहे दृग धार है।।४८८।। सप्ताह परायण पांचवा विश्राम श्रीखेमालरत्नजी खेमालरतन राठौर के, अटल भक्ति आई सदन।। रैना पर गुण राम, भजन भागौत उजागर। प्रेमी परम किशोर, उदर राजत रतनाकर।। हरिदासन के दास, दसा ऊँची ध्वज धारी। निर्भय अननि उदार, रसिक जस रसना भारी।। दशधा सम्पति सन्त बल, सदा रहत प्रफुलित वदन। खेमालरतन राठौर के, अटल भक्ति आई सदन।।११८।।

श्रीरामरयन जी की धर्मपत्नी) (१२५ श्रीरामरयनजी कलिजुग भक्ति करी कमान, रामरैन कैं रिजु करी। अजर धर्म आचर्यौ, लोक हित, मनौ नीलकंठ। निन्दकजन अनिराय, कहा महिमा जानैगो भूसठ॥ विदित गान्धर्वी ब्याह, कियौ दुसकन्त प्रमानै। भरत पुत्र भागौत, सुमुख शुकदेव बखानै॥ और भूप कोउ छ्वै सकै, दृष्टि जाय नाहिन धरी। कलियुग भक्ति करी कमान, रामरैन कैं रिजु करी।।११६।। पूनौँ में प्रकास भयौ, शरद् समाज रास, विविध विलास, नृत्य रागरंग भारी है। बैठे रस भीजे दोऊ, बोल्यो राम राजा रीझि, भेंट कहा कीजै, विप्र कही जोई प्यारी है।। प्यार को विचारै न, निहारै कहूँ नैकु छटा, सुता रुपघटा, अनुरूप सेवा ज्यारी है। रही सभा सोचि, आप जायके लिवाय ल्याये, भेष सौं दिवाये फेरे, सम्पति लै बारी है।।४८६।। श्रीरामरयनजी की धर्मपत्नी हरि गुरु हरिदासनि सौं, रामघरनि साँची रही।। आरज कौ उपदेश, सुनौ उर नीके धार्यौ। नवधा दशधा प्रीति, आन सबै धर्म बिसार्यौ।। अच्युतकुल अनुराग, प्रगट पुरूषारथ जान्यौ। सारासार विवेक, बात तीनौं मन मान्यौ।। दासत्व अनन्य उदारता, सन्तनि मुख राजा कही। हरि गुरु हरिदासनि सौं, रामघरनि साँची रही।।१२०।। आये मधुपुरी राजा, राम अभिराम दोऊ, दाम पै न राख्यो, साधु विप्र भुगताये हैं। ऐसे ये उदार राह, खरच सँभार नाहिं, चलिवो विचार भयौ, चूरा दीठि आये हैं।। मुद्रा सत पाँच मोल, खोलि तिया आगे, धरे दीजै बेंचि गये, नाभा कर पहिराये हैं। पति को बुलाइ कही, नीके देखि रीझे भीजे, काढ़िकै करज पुर, आये दै पठाये हैं।।४६०।। मास परायण बाईसवाँ विश्राम

१२६) (श्री भक्तमाल श्रीकिशोरसिंहजी अभिलाष उभै खैमाल का, ते किशोर पूरा किया ।। पाँयनि नूपुर बाँधि, नृत्य नगधर हित नाच्यौ। राम कलस मन रली, सीस तातें नहीं बाच्यौ ।। वानी विमल उदार, भक्ति महिमा विस्तारी। प्रेमपुंज सुठि सील, विनय सन्तनि रुचिकारी ।। सृष्टि सराह्रै राम सुव, लघु वयस लछन आरज लिया। अभिलाष उभै खैमाल का, ते किशोर पूरा किया ।।१२१।। खेमालरतन तन, त्याग समैं अश्रुपात, बात सुत पूछैं, अजू नीकें खोलि दीजिये। कीजै पुण्य दान बहुँ, सम्पति अमान भरी, धरी हिये दोई सोई, कही सुनि लीजिये ।। विविध बड़ाई में, समाई मति भई पै नं, नित ही विचार अब, मन पर खीजिये। नीर भरि घट सीस, धरिकै न ल्यायो और, नूपुरन बाँधि नृत्य, कियौ नाँहि छीजिये ।।४६१।। रहे चुपचाप सबै, जानी, काम आप ही कौ, बोल्यौ, यों किसोर नाती, आज्ञा मोकौं दीजियै। यही नित करौं, नहीं टरौं जौलौं जीवै तन, मन में हुलास उठि, छाती लाय जीजियै ।। बहु सुख पाये, पाये वैसे ही निवाहे, पन, गाये गुन लाल प्यारी, अति मति भीजियै। भक्ति विस्तार कियौ, वयस लघु भीज्यौ हियौ, दियौ सनमान सन्तसभा सब रीझियै ।।४६२।। श्रीहरीदासजी खेमालरतन राठौर की, सुफल बेलि मिठी फली ।। हरीदास हरिभक्त, भक्ति मन्दिर कौ कलसौ। भजन भाव परिपक्व, हृदै भागीरथि जल सौ ।। त्रिधा भाँति अति अनन्य, राम की रीति निबाही। हरि गुरु हरिबल भाँति, तिनहिं सेवा दृढ़ साही ।। पूरन इन्दु प्रमुदित उदधि, त्यों दास देखि बाढ़े रली। खेमालरतन राठौर की, सुफल बेलि मीठी फली ।। १२२ ।।

श्रीकृष्णदासजी चालक) (१२७ श्रीचतुर्भुजदासजी कीर्तननिष्ठ (श्री) हरिवंश चरनबल चतुर्भुज, गौंड़ देश तीरथ कियौ ।। गायौ भक्ति प्रताप, सबहिं दासत्व दृढ़ायौ। राधावल्लभ भजन, अनन्यता वर्ग बढ़ायौ ।। मुरलीधर की छाप, कवित अति ही निर्दूषन। भक्तिनि की अँघ्रिरेनु, वहै धारी सिर भूषन ।। सत्संग महा आनन्द में , प्रेम रहत भीज्यो हियौ। (श्री) हरिवंश चरनबल चतुर्भुज , गौंड़ देश तीरथ कियौ ।।१२३ ।। गौंड़वाने देश, भक्ति लेशहूँ न दीखै कहूँ, मानुस कौं मारि, इष्टदेव कौं चढ़ायौ है। तहाँ जाय देवता कौं, मन्त्र लै सुनायौ कान, लियौ उन मानि, गाँव सुपन सुनायौ है।। स्वामी चतुर्भुज जू के, वेगि तुम दास होहु, नातौ होय नास, सब गाँव भज्यौ आयौ है। ऐसे शिष्य किये, मालाकण्ठी पाय जिये, पाँव लिये मन दिये, औ अनन्त सुख पायौ है।।४६३।। भोग लै लगावैं नाना, सन्तनि लड़वैं कथा, भागवत गावैं, भावभक्ति बिसतारियै। भज्यौ धन लैके कोऊ, धनी पाछै पर्यो सोऊ, आनिकै दबायौ बैठि, रह्यौ न निहारियै।। निकसी पुरान बात, करै नयाँ गात दिच्छा-सिच्छा सुनि शिष्य, भयौ गह्यौ यों पुकारियै। कहै या जनम मैं न, लियौं कछू दियौ फारौ, हाथ लै उबार्यौ, प्रभु रीति लगी प्यारियै।।४६४।। राजा झूठ मानि कह्यौ, करो बिन प्रान याकौं, साधु ये विराजमान, लै कलंक दियौ है। चले ठौर मारिवे कौं, धारिवे कौं सकै कैसे, नैन भरि आये नीर, बोल्यौ धन लियौ है।। कहै नृप साँचो ह्वैकै, झूठौ जिन हूजै सन्त,-महिमा अनन्त कही, स्वामी ऐसो कियौ है। भूप सुनि आयौ, उपदेस मन भायौ, शिष्य भयौ नयौ तन, पायौ भीजि गयौ हियौ है।।४६५।। पकि रह्यौ खेत, सन्त आय करि तोरी लेत, जिते रखवारे, मुख सेत शोर कियौ है। कह्यौ स्वामी नाम सुन्यौ, कही बड़ौ काम भयौ, यह तौ हमारौ सोई, आप सुनि लियौ है।। लैकै मिष्टान आय, सुमुख बखान कीनौ, लीनौ अपनाय, आज भीज्यौ मेरौ हियौ है। लै गये लिवाय नाना, भोजन कराय भक्ति, चरचा चलाय, चाय हित रस पियौ है।।४६६।। श्रीकृष्णदासजी चालक चालक की चरचरी चहुँदिसि, उदधि अन्त लौं अनुसरी।।

१२८) (श्री भक्तमाल सक्रकोप सुठि चरित, प्रसिध पुनि पंचाध्यायी। कृष्ण रुक्मिनी केलि, रुचिर भोजन विधि गाई।। गिरिराजधरन की छाप, गिरा जलधर ज्यौं गाजै। सन्त सिखण्डी खण्ड, हृदै आनन्द के काजै।। जाड़ा हरन जग जाड़ता, कृष्णदास देही धरी। चालक की चरचरी चहुँदिसि, उदधि अन्त लौं अनुसरी ।।१२४।। श्रीसन्तदासजी विमलानन्द प्रबोध वंश, सन्तदास सींवा धरम।। गोपीनाथ पद राग, भोग छप्पन भुंजाये। पृथु पद्धति अनुसार, देव दम्पति दुलराये।। भगवत् भक्त समान, ठौर द्वै कौ बल गायौ। कवित सूर सौं मिलत, भेद कछु जात न पायौ।। जन्म कर्म लीला जुगति, रहसि भक्ति भेदी मरम। विमलानन्द प्रबोध वंश, सन्तदास सींवा धरम।। १२५।। बसत निवाई ग्राम, स्याम सौं लगाई मति, ऐसी मन आई, भोग छप्पन लगाये हैं। प्रीति की सचाई यह, जग में दिखाई सेवैं, जगन्नाथदेव आप, रुचि सौं जिंवाये हैं।। राजा कौं सुपन दियौ, नाम लै प्रगट कियौ, सन्त ही के गृह में तौं, जेवौं यों रिझाये हैं। भक्ति के अधीन सब, जानत प्रवीनजन, ऐसे हैं रंगीन लाल, ठौर-ठौर गाये हैं।। ४६७।। श्रीसूरदासजी-मदनमोहन (श्री) मदनमोहन सूरदास की, नाम श्रृंखला जूरी अटल ।। गान काव्य गुणराशि, सुहृद् सहचरि अवतारी। राधाकृष्ण उपास्य, रहसि सुख के अधिकारी।। नवरस मुख्य सिंगार, विविध भाँतिन करि गायौ। वदन उच्चरित बेर, सहस पावनि ह्वै धायौ।।

श्रीकात्यायनीजी) (१२६ अंगीकार की अवधि यह, ज्यों आख्या भ्राता जमल। (श्री)मदनमोहन सूरदास की, नाम श्रृंखला जुरी अटल ॥१२६॥ सूरदास नाम, नैन कंज अभिराम फूले, झूले रंग पीके नीके, जिय के और ज्याये हैं। भये सो अमीन यों, सँडीले के नवीन रीति, प्रीति गुड़ देखि, दाम बीसगुने लाये हैं॥ कही पूवा पावैं आप, मदनगोपाल लाल, परे प्रेम ख्याल, लादि छकरा पठाये हैं। आये निसि भये, स्याम कियौ आज्ञा जोग लैके, अबही लगावौ भोग, जागे फिरि पाये हैं॥४६८॥ पद लै बनायौ, भक्तिरूप दरसायौ, दूर सन्तनि की पनहीं को, रच्छक कहाऊँ मैं। काहू सीखि लियो, साधु लियो चाहै परचै कौं, आये द्वार मन्दिर के, खोलि कही आऊँ मैं ।। रह्यौ बैठि जाय, जूति हाथ में उठाय लीनी, कीनी पूरी आस मेरी, निसिदिन गाऊँ मैं। भीतर बुलाये श्रीगुसाँई, बार दोय चार, सेवा सौंपी सार, कह्यौ जन पग ध्याऊँ मै ॥४६६॥ पृथ्‍वीपति सम्पति लै, साधुनि खबाइ दई, भई नहीं शंक यों, निशंक रंग पागे हैं। आये सो खजानौ लैन, मानौ यह बात अहो, पाथर लै भरे आप, आधी निसि भागे हैं।। रूक्‍का लिखि डारे दाम, गटके ये सन्तनि नैं, याते हम सटके हैं, चले जब जागे हैं। पहुँचे हुजूर भूप, खोलिकै सन्दूक देखें, पेखैं आँक कागद में, रीझि अनुरागे हैं।। ५००।। लैन कौं पठाये कही, निपट रिझाये हमें, मन में सं ल्याये, लिखी वन तन् डार्यौ है। टोडर दिवान कह्यौ, धन कौं विरान कियो, ल्यावौ रे पकरि मूढ़, फेरिकै सँभार्यौ है।। लै गये हुजूर, नृप बोल्यौ मोसों दूर राखौ, ऐसौ महाक्रूर सौंपि, दुष्ट कष्ट धार्यौ है। दोहा लिखि दीनौ अकबर देखि रीझि लीनौ, जावौ वाही ठौर तोपै द्रव्य सब बार्यौ है।।५०१।। आये वृन्दावन मन, माधुरी में भीजि रह्यौ, कह्यौ जोई पद, सुन्यौ रूप रसरासि है। जा दिन प्रगट भयौ, गयौ शत जोजन पै, जन पै सुनत भेद, बाढ़ी जग प्यास है।। सूरध्वज द्विज निज, महल-टहल पाय, चहल-पहल हिये, जुगल प्रकास है। मदनमोहन जू हैं, इष्ट-इष्ट महाप्रभु, अचरज कहा कृपादृष्टि अनायास है।। ५०२।। श्रीकात्यायनीजी कात्यायनी के प्रेम की, बात जात कापै कही।। मारग जात अकेल, गान रसना जु उचारैं। ताल मृदंगी वृक्ष, रीझि अम्बर तहँ डारैं॥

१३०) (श्री भक्तमाल गोप नारि अनुसारि, गिरा गद्गद आवेशी। जग प्रपंच ते दूरि, अजा परसै नहीं लेशी॥ भगवान् रीति अनुराग की, सन्त साखि मेली सही। कात्यायनी के प्रेम की, बात जात कापै कही॥ १२७॥ श्रीमुरारिदासजी कृष्ण विरह कुन्ती शरीर, त्यौं मुरारि तन त्यागियौ॥ विदित बिलौंदा गाँव, देश मुरधर सब जानै। महा महोच्छौ मध्य, सन्त परिषद् परवानै॥ पगनि घूँघुरू बाँधि, राम कौ चरित दिखायौ। देसी सारँगपाणि, हंस ता संग पठायौ॥ उपमा और न जगत् में, पृथा बिना नाहिन बियौ। कृष्ण विरह कुन्ती शरीर, त्यौं मुरारि तन त्यागियौ॥ १२८॥ श्रीमुरारिदास रहे, राजगुरु, भक्त-दास, आवत स्नान किये, कान धुनि कीजिये। जाति कौ चमार करै, सेवा सो उचारि कहै, प्रभु चरनामृत कौ, पात्र जोई लीजिये॥ गये घर मांझ वाके, देखि डर काँपि उठ्यौ, ल्यावौ देवौ हमें, अहो पान करि जीजिये। कही मैं तो न्यून तुच्छ, बोले हमहूँ तें स्वच्छ, जानै कोऊ नाहिं, तुम्हें मेरी मति भीजिये॥५०३॥ बहै दृग नीर कहै, मेरे बड़ी पीर भई, तुम मति धीर नहीं, मेरी योग्यताई है। लियौई निपट हठ, बड़े पटु साधुता में, स्यामै प्यारी भक्ति, जाति-पाँति लै बहाई है।। फैलि गई गाँव, वाकौ नांव लै चवाब करैं, भरै नृप कान सुनि, वाहू न सुहाई है। आयौ प्रभु दखिवे कौं, गयौ वह रंग उड़ि, जान्यौ सो प्रसंग सुन्यौ, वहै बात छाई है॥५०४॥ गये सब त्यागि, प्रभुसेवा ही सौं राग जिन्हें, नृप दुख पागि गयौ, सुनी यह बात है। होत हो समाज सदा, भूप के बरस माँझ, दरस न काहू होत, मान्यौ उतपात है।। चलेई लिबायवे कौं, जहाँ श्रीमुरारिदास, करी साष्टांग, रास नैन अश्रुपात है। मुखहुँ न देखें वाको, विमुख कै लेखैं अहो, पेखैं लोग कहैं, यह गुरु शिष्य ख्यात है॥५०५॥

श्रीतुलसीदासजी) (१३१ ठाढ़ौ हाथ जोरि, मति दीनता में वोरि, कीजै दण्ड मोपै कोरि, यों निहारि मुख भाखियै। घटती ने मेरी, आप कृपा ही की घटती है, बढ़ती-सी करी, तातें न्यूनताई राखियै॥ सुनिकै प्रसन्न भये, कहे लै प्रसंग नये, बालमीकि आदि दै-दै, नानाविधि साखियै। आये निज गाँव, नाम सुनि सब साधु धाये, भयोई समाज वैसो, देखि अभिलाखियै।।५०६।। आये बहु गुनीजन, नृत्य-गान छाई धुनि, ऐपै सन्तसभा मन, स्वामी गुण देखिये। जानिकै प्रवीन उठे, नूपुर नवीन बाँधि, सप्तस्वर तीन ग्राम, लीन भये पेखिये।। गायौ रघुनाथ जू कौ, वन कौ गमन समैं, ता संग गमन प्रान, चित्र सम लेखिये। भयौ दुखरासि, कहाँ पैयै श्रीमुरारिदास, गये राम पास, एतौ हिये अबरेखिये।। ५०७।। मास परायण तेईसवाँ विश्राम गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी (भक्तमाल सुमेरु) कलि कुटिल जीव निस्तार हित, बाल्मीकि तुलसी भयौ।। त्रेता काव्य निबन्ध, करी सतकोटि रमायन। इक अक्षर उद्धरैं, ब्रह्म हत्यादि परायन ।। अब भक्तनि सुखदैन, बहुरि लीला विस्तारी। रामचरन रसमत्त, रहत अहर्निसि व्रतधारी ।। संसार अपार के पार को, सुगम रूप नवका लयौ। कलि कुटिल जीव निस्तार हित, बाल्मीकि तुलसी भयौ ।। १२६ ।। तिया सौं सनेह, बिन पूछे पिता गेह गई, भूली सुधि देह, भजे वाही ठौर आये हैं। बधू अति लाज भई, रिस सौं निकसि गई, प्रीति राम नई, तन हाड़-चाम छाये हैं।। सुनी जब बात, मानौ ह्वै गयौ प्रभात, वह पाछे पछितात्त, तजि कासीपुरी धाये हैं। कियौ तहाँ वास, प्रभुसेवा लै प्रकास कीनौ, लीनौ दृढ़भाव, नैन रूप के तिसाये हैं।। ५०८।। शौच जल शेष, पाय भूतहू विशेष, कोऊ बोल्यौ सुखमानि, हनुमान जू बताये हैं। रामायन कथा सौ, रसायन है काननि कौ, आवत प्रथम पाछे, जात घृना छाये हैं।। जाय पहिचानि, संग चले उर आनि आये, वन मधि जानि, धाय पाँय लपटाये हैं। करैं तिरस्कार कही, सकौगे न टारि मैं तो, जाने रससार रूप, धर्यौ जैसे गाये हैं।। ५०६ ।। माँगि लीजै वर, कही दीजै राम भूपरूप, अति ही अनूप नित, नैन अभिलाखियै। कियौ लें संकेत, वाही दिन ही सौं लाग्यौ हेत, आई सोई समैं, चेत कब छबि चाखियै ।।

१७२) (श्री भक्तमाल आये रघुनाथ साथ, लछिमन चढ़े घोरे, पट, रंग बोरे हरे कैसे मन राखियै। पाछे हनुमान आये, बोले देखे प्रान प्यारे, नेकु न निहारे मैं तौ, भलैं फेरि भाखियै।।५१०।। हत्या करि विप्र एक, तीरथ करत आयौ, कहै मुख राम, भिच्छा डारियै हत्यारे कौ। सुनि अभिराम नाम, धाम में बुलाय लियौ, दियौ लै प्रसाद, कियौ शुद्ध गायौ प्यारे कौ।। भई द्विजसभा, कहि बोलिकै पठाये आप, कैसे गयौ पाप, संग लैके जेंये न्यारे कौ। पोथी तुम बाँचौ, हिये भाव नहीं साँचौ, अजू ताते मति काँचौ, दूर करै न अंध्यारे कौ।।५११।। देखी पोथी बाँच, नाम-महिमा हूँ कही साँच, ऐपै हत्या करै, कैसें तरै कहि दीजियै। आवै जो प्रतीति, कहौ कही याके हाथ जेंवैं, शिव जू कौ बैल, तब पंगति में लीजियै।। थार में प्रसाद दियौ, चले जहाँ पन कियौ, बोले आप नाम कै, प्रसाद मति भीजियै। जैसी तुम जानो, तैसी कैसे कै बखानौं, अहो सुनिकै प्रसन्न, पायो जै-जै धुनि रीझियै।।५१२।। आये निसि चोर, चोरी करन हरन धन, देखे स्याम घन, हाथ चाप सर लिये हैं। जब-जब आवैं, बान साँधि डरपावैं एतौ अति मँड़रावै, ऐपै बली दूरि किये हैं।। भोर आय पूछैं, अजू! साँवरो किशोर कौन, सुनि करि मौन रहे, आँसू डारि दिये हैं। दई सो लुटाय, जानी चौकी राम राय दई, लई उन्ह दिच्छ,-सिच्छ शुद्ध भये हिये हैं।।५१३।। कियौ विप्र तन त्याग, तिया चली संग लागि, दूरहीं ते देखि कियौ, चरन प्रनाम है। बोले यों सुहागवती, मर्यौ पति होऊँ सती, अबतौ निकसि गई, ज्याऊँ सेवौ राम है।। बोलिकै कुटुम्ब कही, जोपै भक्ति करौ सही, गही तब बात, जीव दियो अभिराम है। भये सब साधु, व्याधि मेटि लै विमुखता की, जाकी वास रहै तौ न, सूझै स्याम धाम है।।५१४।। दिल्लीपति पातसाह, अहदी पठाये लैन, ताकौ सो सुनायौ, सूबे विप्र ज्यायौ जानियै। देखिवे कौं चाहै, नीकै सुख सौं निवाहै आय, कही बहु विनै गही, चले मन आनियै।। पहुँचे नृपति पास, आदर प्रकास कियौ, दियौ उच्च आसन लै, बोल्यौ मृदु वानियै।। दीजै करामात, जग ख्यात सब मात किये, कही झूठ बात, एक राम पहिचानियै।। ५१५।। देखें राम कैसौ कहि कैद किये, किये हिये हूजिये कृपाल, हनुमान जू दयाल हो। ताही समैं फैलि गये, कोटि-कोटि कपि नये, लोचैं तन खोचैं, चीर भयौ यों बिहाल हो।। फोरैं कोट, मारैं चोट, किये डारैं, लोट-पोट, लीजै कौन ओट, जाय मान्योँ प्रलयकाल हो। भई तब आँखैं, दुखसागर कौं चाखैं अब, वेई हमें राखैं, भाखैं वारौं धनमाल हो।। ५१६।। आय पाँय लिये तुम, दिये हम प्रान पावैं, आप समझ़ावैं, करामात नेकु लीजियै। लाज दबि गयो नृप, तब राखि लयौ कह्यौ, भयौ घर राम जू कौ, वेगि छोड़ि दीजियै।।

श्रीगोकुलनाथ गोसाँई जी) (१३३ सुनि तजि दयो और, कर्यौ लैकै कोट नयौ, अबहूँ न रहे कोऊ, वामै तन छीजिये। काशी जाय वृन्दावन, आय मिले नाभा जू सौं, सुन्यौ हो कवित्त निज, रीझि मति भीजिये।।५१७।। मदनगोपाल जू कौ, दरसन करि कही, सही राम इष्ट मेरे, दृष्टिभाव पागी है। वैसे ही सरूप कियौ, दियौ ले दिखाय रूप, मन अनुरूप छबि, देखि नीकी लागी है।। काहू कही कृष्ण, अवतारी जू प्रशंस महा, राम अंश सुनि, बोले मति अनुरागी है। दसरथ सुत जानौं, सुन्दर अनूप मानौं, ईशता बताई रति, कोटिगुनी जागी है।।५१८।। श्रीमानदासजी गोप्य केलि रघुनाथ की, (श्री) मानदास परगट करी।। करुना वीर सिंगार, आदि उज्ज्वल रस गायौ। पर उपकारक धीर, कवित कविजन मन भायौ।। कोशलेश पदकमल, अननि दासत व्रत लीनौ। जानकी जीवन सुजस, रहत निसिदिन रँग भौनौ।। रामायन नाटक रहसि, युक्ति उक्ति भाषा धरी। गोप्य केलि रघुनाथ की, (श्री) मानदास परगट करी।।१३०।। श्रीगिरिधरजी (श्री) वल्लभ जू के वंश में, सुरतरु गिरिधर भ्राजमान।। अर्थ धर्म काम मोक्ष, भक्ति अनपायनि दाता। हस्तामल श्रुति ज्ञान, सबहि शास्त्रन के ज्ञाता।। परिचर्या ब्रजराज, कुँवर कें मन कौं कर्षै। दरसन परम पुनीत, सभा तन अमृत वर्षै।। विट्ठलेश नन्दन सुभाव, जग कोऊ नहिं ता समान। (श्री) वल्लभ जू के वंश में सुरतरु, गिरिधर भ्राजमान।।१३१।। श्रीगोकुलनाथ गोसाँईजी (श्री) वल्लभ जू के वंश में, गुननिधि गोकुलनाथ अति।।

१७४) (श्री भक्तमाल उदधि सदा अक्षोभ, सहज सुन्दर मित भाषी। गुरुवत्तन गिरिराज, भलप्पन सब जग साषी॥ विट्ठलेश की भक्ति, भयौ बेला दृढ़ ताकै। भगवत् तेज प्रताप, नमित नरवर पद जाकैँ॥ निर्विलीक आसय उदार, भजनपुंज गिरिधरन रति। (श्री) वल्लभ जू के वंश में, गुननिधि गोकुलनाथ अति।।१३२।। आयौ कोऊ शिष्य होन, ल्यायो भेंट लाखन की, भाखन की चातुरी पै, मेरी मति रीझियै। कहूँ है सनेह तेरो, जाके मिले बिना देह, व्याकुलता होय, जोपै तोपै दीच्छा दीजियै।। बोल्यौ अजूनै मेरो काहू, वस्तु सौं न हेतु नेकु, नेति-नेति कही, हम गुरु ढूँढ़ि लिजियै। प्रेम ही की बात इहाँ, कर ही पलटि जात, गयौ दुख गात, कहो कैसैं रँग भीजियै।। ५१६ ।। कान्हा हो हलालखोर, घोरि दियौ मन लैकै, स्याम रससागर में, नागर रसाल है। निसि को सुपन माँझ, निपुन श्रीनाथ जू नै, आज्ञा दई, भीत नई, भई ओट साल है।। गोकुल के नाथ जू सौं, वेगि दै जताइ दीजै, कीजै याहि दूर, छबि पूर देखौ ख्याल है। भोर जौ विचारै, नहिं धीरज कौ धारै, उहाँ जाऊँ कोऊ मारै, पैड़ें पर्यो यह लाल है।। ५२०।। ऐसे दिन तीन, आज्ञा देते वे प्रवीन, नाथ हाथ कहा मेरे, बिन गये नही सरैगौ। गये द्वार द्वारपाल, बोले जू विचार एक, दीजै सुधि कान, सुनि खीझै बात करैगौ ।। काहू ने सुनाय दई, लीजिये बुलाय अहो, कहौ और दूर करौ, करे दूरि ढरैगौ। जाय वही कही, लही अपनी पिछानि मिले, सुन्यौ मेरौ नाम श्याम कह्यौ नहीं टरैगौ।। ५२१।। श्रीवनवारीदासजी रसिक रँगीलौ भजनपुंज, सुठि वनवारी स्याम कौ।। बात कवित बड़ चतुर, चोख चौकस अति जानै। सारा सार विवेक, परमहंसनि परवानै ।। सदाचार सन्तोष, भूत सबको हितकारी। आरज गुन तन अमित, भक्ति दशधा व्रतधारी।। दरसन पुनीत, आसय उदार आलाप रुचिर सुख धाम कौ।

श्रीबावनजी) (१३५

रसिक रँगीलौ भजनपुंज, सुठि वनवारी स्याम कौ ।। १३३ ।।

श्रीनारायण मिश्रजी भागौत भलीविधि कथन कौ, धनि जननी एकै जन्यौ ।। नाम नरायन मिश्र, वंश नवला जू उजागर। भक्तन की अति भीर, भक्ति दशधा कौ आगर ।। आगम निगम पुरान, सार शास्त्रनि सब देखे। सुरगुरु शुक सनकादि, व्यास नारद जु बिसेखे ।। सुधा बोध मुख सुरधुनी, जस वितान जग में तन्यौ। भागौत भलीविधि कथन कौ, धनि जननी एकै जन्यौ ।। १३४ ।।

श्रीराधवदासजी कलिकाल कठिन जग जीतियो, राधौ की पूरी परी ।। काम क्रोध मद मोह, लोभ की लहर न लागी। सूरज ज्यों जल संग्रहै, बहुरि ताही ज्यों त्यागी ।। सुन्दर शील सुभाव, सदा सन्तैन सेवा व्रत। गुरु धर्म निकष निर्वह्यौ, विश्व में विदित बड़ौ भृत ।। अल्हराम रावल कृपा, आदि अन्त धुकती धरी। कलिकाल कठिन जग जीतियो, राधौ की पूरी परी ।। १३४ ।।

श्रीबावनजी हरिदास भलप्पन भजनबल, बावन ज्यौं बढ़यौ बावनौ ।। अच्युतकुल सौं दोष, सुपनेहूँ उर नहिं आनै। तिलक दाम अनुराग, सबनि गुरुजन करि मानै ।। सदन माँहि वैराग्य, विदेहिन की सी भाँती। रामचरण मकरन्द, रहति मनसा मदमाती ।।