भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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११८) (श्री भक्तमाल गढ़ागढ़ पुर नाम, माधौ बढ़ि प्रेम भूमि, लोटैं जब नृत्य करैं, भूलैं सुधि अंग की। भूपति विमुख झूठ, जानिकै परीक्ष्ण लई, आनि तीन छाति पर, देखी गति रंग की।। नूपुरनि बाँधि नाचि, साँच सो दिखाय दियौ, गिर्यौ हू कराह मध्य, जियौ मति पंग की। बड़ौ त्रास भयौ नृप, दास बिसवास बढ़यौ, बढ़यौ उर भाव, रति न्यारी या प्रसंग की।।४५६।। श्रीअंगदजी अभिलाष भक्त अंगद कौ, पुरुषोत्तम पूरन कर्यौ।। नग अमोल इक ताहि, सबै भूपति मिलि जाचैं। साम दाम बहु करैं, दास नाहिन मत काचैं।। एक समै संकष्ट, लेय पानी महँ डार्यौ। प्रभो तिहारी वस्तु, वदन ते वचन उचार्यौ।। पाँच दोय सत कोस ते, हरि हीरा लै उर धर्यौ। अभिलाष भक्त अंगद कौ पुरुषोत्तम पूरन कर्यौ।।११३।। रायसेन गढ़ वास, नृप सो सिलाहदी जू, ताको यह काका रहे, अंगद विमुख है। ताकी नारी प्यारी, प्रभु साधुसेवा धारी उर, आये गुरू घर कहैं, कृष्ण कथा सुख है।। बैठे भौन कौन?, देखि कैसें मौन रह्यो जात?, बोल्यो तिया जात कहा, करौ नर रुख है। सुनि उठि गये, बधू अन्न-जल त्यागि दये, लये पाँव जाय, विषै वश भयौ दुख है।।४५७।। मुख न दिखावै याहि, देख्यो ही सुहावै कही, भावै सोई करौ, नेकु वदन दिखाइयै। मैं हूँ जल त्यागि दियौ, अन्न जात कापै लियौ, जीवौं तब नीके, जब आपु कछु खाइयै।। बोली मोसौ 'बोलौ, जिन छाँड़ौ तन याही छिन, पन साँचौ होतौ, तोपै सुनत समाइयै'। 'कहौ अब कीजै जोई, मेरी मति गई खोई', भोई उर दया, बात कहि समझाइयै।।४५८।। 'वेई गुरु करौ जाय, पाँयन में परौ' गयौ, चायनि लिवाय ल्यायौ, भयौ शिष्य दीन है। धारी उर माल, भाल तिलक बनाय कियौ, लियो सीत, प्रीति कोऊ उपजी नवीन है।। चढ़ी फौज संग चढ़यौ, बैरी पुर मारि बढ़यौ, कढ़यौ टोपी लैके हीरा सत एक पीन है। डारे सब बेंच पागपेच मध्य रख्यौ मुख्य, भाष्यौ 'सो अमोल करौं जगन्नाथ लीन है'।।४५६।। कानाकानी भई नृप बात सुनि लई कही, 'हीरा वह देव तोपै और माफ किये हैं'। आय समुझावैं बहु जुगति बनावैं याके, मन में न आवैं जाय सबै कहि दिये हैं।।