श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमाधवदासजी) (११७ श्रीनन्ददासजी (श्री) नन्ददास आनन्द निधि, रसिक सु प्रभु हित रँग मगे॥ लीला पद रस रीति, ग्रन्थ रचना में नागर। सरस उक्ति जुत जुक्ति, भक्तिरस गान उजागर॥ प्रचुर पयध लौं सुजस, रामपुर ग्राम निवासी। सकल सुकुल सम्बलित, भक्तपद रेनु उपासी॥ चन्द्रहास अग्रज सुहृद्, परम प्रेम पै में पगे। (श्री) नन्ददास आनन्द निधि, रसिक सु प्रभु हित रँग मगे॥ ११०॥ श्रीजनगोपालजी संसार सकल व्यापक भई, जकरी जन गोपाल की॥ भक्ति तेज अति भाल, सन्त मण्डल कौ मण्डन। बुधि प्रवेश भागौत, ग्रन्थि संशय कौ खण्डन॥ नरहड़ ग्राम निवास, देश बागड़ निस्तार्यौ। नवधा भजन प्रबोध, अनन्य दासन व्रत धार्यौ॥ भक्त कृपा बांछी, सदा पदरज राधा लाल की। संसार सकल व्यापक भई, जकरी जन गोपाल की॥१११॥ श्रीमाधवदाजी माधव दृढ़ महि ऊपरै, प्रचुर करी लोटन भगति॥ प्रसिद्ध प्रेम की राशि, गढ़ागढ़ परचौ दीयौ। ऊँचे तें भयौ पात, स्याम साँचौ पन कीयौ॥ सुत नाती पुनि, सदृश चलत ऊही परिपाटी। भक्तनि सौं अति प्रेम, नेम नहीं किहुँ अँग घाटी॥ नृत्य करत नहिं तन सँभार, समसर जनकन की सकति। माधव दृढ़ महि ऊपरै, प्रचुर करी लोटन भगति॥ ११२॥