श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११९६) (श्री भक्तमाल ठौर-ठौर पकवान, होत तिया गान करै, घुरत निसान कान सुनिये न बात है। चित्रमुख किये, लै विचित्र पट्टरानी आप, घोरी रंग बोरी पै, चढ़ायौ सुत रात है।। करी सो ज्यौनार, तामें मानस अपार आये, द्विजनि विचारि, पोट बाँधी पै न मात है। मणिमय ही साज-बाज, गज रथ ऊँट कोर, झमकै किशोर आज, सजी यों बरात है।।४५२।। नरसी सौं कहें गहैं हाथ, तुम साथ चलौ, अन्तरिच्छ में हूँ चलौं, इति बात मानिये। कही अजू! जानौ तुम, मैं तो हिये आनौं यहैं, लहै सुख मन मेरो, फेंट ताल आनिये।। आप ही विचारि सब, भार सौं उठाइ लियो, दिया डेरा पुरी, समधी की पहिचानिये। मानस पठायौ, दिन आयौ पै न आये, अहो!, देखें छबि छाये, नर पूछैं जू बखानिये।।४५३।। नरसी बरात मत जानौ यह नरसी की नरसी न पावै ऐसी समझ अपार है। आयकै सुनाई सुधि-बुधि बिसराई अहो करत हँसाई बात भाखौ निरधार है।। गयौ जो सगाई करि दर वर आयौ द्विज अंग में न मात कैसे रंग बिसतार है। कही एक घास धनरासि सौं न पूजै किहूँ चहुँदिसि पूरि रही देखौ भक्तिसार है।।४५४।। चले अचरज मानि, देखि अभिमान गयौ, लयौ पाछौ ब्राह्मन को, हमें राखि लीजिये। जाइ गहि पाँय, रह्यौ, भाय भरि दया करौ, गये दृग भरै पाँव, परै कृपा कीजिये।। मिले भरि अँक लै, दिखायौ सो मयंक मुख, हूजिये निशंक इन्हे, भार सुता दीजिये। ब्याह करि आये, भक्तिभाव लपटाये सब, गाये गुण जाने, जेते सुनि-सुनि जीजिये।।४५५।। मास परायण बीसवाँ विश्राम श्रीयशोधरजी दिवदास वंश, जसोधर सदन, भई भक्ति अनपायनी।। सुत कलत्र सम्मत, सबै गोविन्द परायन। सेवत हरि हरिदास, द्रवत मुख राम रसायन।। सीतापति कौ सुजस, प्रथम ही गवन बखान्यौ। द्वै सुत दीजै मोहिं, कवित सबही जग जान्यौ।। गिरा गदित लीला मधुर, सन्तनि आनन्ददायिनी। दिवदास वंश, जसोधर सदन, भई भक्ति अनपायनी।।१०६।। नवाह परायण षष्ठ विश्राम