भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीनरसीजी) (११५)

बोलि उठ्यौ विप्र एक, छूतक प्रसंग देख्यौ कह्यौ, रसरंग भर्यौ, डर्यौ नृप पाँय में। कही जू विराजौ गाजौ, नित सुख साजौ जाय, किये हरि राय वश, भीजे रहौ भाय में।। धारौ उर और, सिरमौर प्रभु मन्दिर में, सुन्दर केदारौ राग, गावै भरे चाय में। स्याम कण्ठमाल टूटि, आवत रसाल हियें, देखि दुख पावैं परे, विमुख सुभाय में।।४४५।। नृपति सिखायौ जाय, वृथा जस छायौ काचे, सूत में पुहायौ हार, टूटै ख्यात करी है। माता हरिभक्त, भूप कही जिनि करौ कान, तऊ बानि राजस की, माया मति हरी है।। गयौ ढिंग मन्दिर के, सुन्दर मँगाय पाट, तागौ बटवाय करि, माला गुहि धरी है। प्रभु पहिराय कह्यौ, गाय अब जानि परै, भरै सुर राग और गायौ पै न परी है।।४४६।। विमुख प्रसन्न भये, तबतौ उराहने दये, नये-नये चोज हरि, सनमुख भाखिये। जाने ग्वालबाल एक, माल गहि रहे हिये, जिये लाग्यौ यही रूप, कहौ लाख लाखिये।। नारायन बड़े महा, अहो मेरे भाग लिख्यो, करै कौन दूरि, छबि पूरी अभिलाखिये। म्हारो कहा जाय, आय परसे कलंक तुम्हे, राखिये निशंक हार, भक्ति मारि नाखिये।।४४७।। रहै तहाँ शाह, किये उभै लै विवाह जाने, तिया एक भक्त कहै, हरि कौं दिखाइयै। नरसी कही ही भलै, सोई प्रभु वानी लई, साँच करि दई, गये राग छुटवाइयै।। बोले पट खोलि, दिये, किये दरसन ताने, ताने पट सोवै वह, कही देवौ भाइयै। लिये दाम, काम कियौ, कागद गहाय दियो, दियौ कछु खाइवे कौं पायौ लै भिंजाइयै।।४४८।। गहने धर्यौ हो राग, केदारौ सो शाह घर, धरि रूप नरसी कौ, जायकै छुटायौ है। कागद लै डार्यौ गोद, मोद भरि गाय उठे, आय झन्न-झन्न श्याम, हार पहिरायौ है।। भयौ जै-जैकार, नृप पाँय लपटाय गयौ, रहस्यौ हिये भाव, सो प्रभाव दरसायौ है। विमुख खिसाने भये, गये उठि नये नाहिं, बिन हरिकृपा भक्तिपन्थ जात पायौ है।।४४६।। करन सगाई आयो, पायो वर भायो नाहिं, घर-घर फिर्यो द्विज नरसी बतायौ है। आय सुख पाय, पूछ्यौ सुत सो दिखाय दियौ, कियौ लै तिलक मन, देखत चुरायौ है।। अजून हम लायक न, तुम सब लायक हौ, सायक सो छूट्यौ, जाय नाम लै सुनायौ है। सुनत ही माथौ फोरि, कहें तालकूटा वह, बाल, बोरि आये, जावो फेरि दुख छायौ है।।४५०।। काटिकै अँगूठा डारौ, तब सो उचारौ बात, मन में विचारौ, कियौ तिलक बनायकै। जाने सुता भाग ऐसे, रहे सोच पागि सब, आवै जब ब्याहिवे कौं, धन दै अघायकै।। लगन हूँ लिखि दियौ, दियौ द्विज आनि लियौ, डारि राख्यो कहूँ, गावैं ताल ए बजायकै। रहे दिन चार, पै विचार नहीं नेकु मन, आये श्री कृष्ण-रूक्मिनी जू, झूमि मिले धायकै।।४५१।।