श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीचतुर्भुजजी नृपति) (११६ अंगद बहिन लागै वाकी भूवा पागै वासौं, 'देवो विष मारौ फिर तूही पग छिये हैं'। करत रसोई घोरि गरल मिलायो पाक, भोग हूँ लगायो 'अजू आवो' बोलि लिये हैं॥४६०॥ वाकी एक सुता संग लैवै बैठै जेंवन कौं, आई सो छिपाय कही 'जेंवौ कहूँ गई है'। जेंवत न बोधि हारी तब सो विचारी प्रीति, भीति रोय मिली गरें रीति कहि दई है॥ प्रभु लै जिवाये राँड-भाँड कै निकासि द्वार, दै करि किवार सब पायौ ओप नई है। वह दुख हियें रह्यौ कह्यौ कैसे जात काहू? बात सुनी नृपहूँ नै जैसी भाँति भई है॥४६१॥ चले नीलाचल हीरा जाय पहिराय आवैं, आय घेरि लीने नृप नरनि खिसायकै। कही डारि देवौ कै लराई सनमुख लेवौ, बस न हमारौ भूप आज्ञा आये धायकै॥ बोले 'नेकु रहौ मैं अन्हाय पकराय देत,' हेत मन और जल डार्यौ लै दिखायकै। 'वस्तु है तिहारी प्रभु लीजिये' उचारी यह, वानी लागी प्यारी उर धारी सुख पायकै॥४६२॥ ऐतौ घर आये वे तो जल मधि कूदि छाये, अति अकुलाये नेकु खोजहूँ न पायौ है। राजा चलि आयौ सब नीर कढ़वायौ कीच, देखि मुरझायौ दुखसागर अन्हायौ है॥ जगन्नाथदेव आज्ञा दई 'वाहि सुधि देवौ', आयकै सुनाई नर-तन बिसरायौ है। गयौ जाय देख्यौ उर पर जगमग रह्यौ, लह्यौ सुख नैननि कौ कापै जात गायौ है॥४६३॥ राजा हिय ताप भयौ दयौ अन्न त्यागि कह्यौ, आवै जोपै भाग मेरे ब्राह्मन पठाये हैं। धरनौ दे रहे कहे नृप के वचन सब, तब ह्वै दयाल आप पुर ढिंग आये हैं॥ भूप सुनि आगे आय पाँय लपटाय गयौ, लयौ उर लाय दृग नीर लै भिजाये हैं। राजा सरबसु दियौ जियो हरिभक्ति कियौ, हियो सरसायौ गुन जाने जिते गाये हैं॥४६४॥ श्रीचतुर्भुजजी नृपति चतुर्भुज नृपति की भक्ति को, कौन भूप सरवर करें॥ भक्त आगमन सुनत, सनमुख जोजन इक जाई। सदन आनि सत्कार, सदृश गोविन्द बड़ाई॥ पाद प्रछालन सुहथ, राय रानी मन साँचै। धूप दीप नैवेद्य, बहुरि तिन आगें नाचै॥ यह रीति करौलीधीश की, तन मन धन आगे धरैं। चतुर्भुज नृपति की भक्ति कौ कौन भूप सरवर करें॥११४॥