श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२०) (श्री भक्तमाल पुर ढिंग चारों ओर चौकी राखी जोजन पै, जो जन ही आवैं तिन्हें ल्यावत लिवायकै। मालाधारी दास मानि आवै कोऊ द्वार जोपै, करै वही रीति सो सुनाई छप्पै गायकै। सुनी एक भूप भक्त निपट अनूप कथा, सबकों भण्डार खोलि देत बोल्यौ धायकै। पात्र औ अपात्र यों विचार ही जो नाहीं तौपै, कहा ऐसी बात? दई नेकु मैं उड़ायकै।।४६५।। भागवत गावै भक्तभूप एक विप्र तहाँ, बोलिकें सुनावै 'ऐसी मन जिन ल्याइयै'। पावै आशै कौन हृदय भौन में प्रवेश करि? भरि अनुराग कही उर मधि आइयै।। करी लै परीक्षा भाट विमुख पठाय दियौ, दियौ माला तिलक सो दास यों सुनाइयै। गयौ, गयौ भूलि फूलि कुल विसतार कियौ, लियौ पहिचानि अब जान कैसे पाइयै।।४६६।। बीते दिन बीस तीस आई वह सीख सुधि, कही हरिदास कोऊ आयौ यों सुनाइयै। बोले जू निशंक जावौ गावौ गुन गोविन्द के, आये घर मध्य भूप करी जैसी भाइयै।। भक्ति के प्रसंग कौ न रंग कहूँ नेकु जान्यौ, जान्यौ उनमान सौं परीक्षा मँगवाइयै। दियौ लै भण्डार खोलि लियौ मन मान्यौ दई, सम्पुट में कौड़ी डारि जरी लपटाइयै।।४६७।। आयौ वाही राजा पास सभा में प्रकास कियौ, लियौ धन दियौ पाछे सोई लै दिखायौ है। खोलिकै लपेटा मध्य सम्पुट निहारि कौड़ी, समुझि विचारै हारै मन में न आयौ है।। बड़ौ भागवत विप्र पण्डित प्रवीन महा, निसि रसलीन जानि आयकै बतायौ है। कर्यौ उनमान भक्ति मानिवौ प्रमान जरी, मूँदिकै पठाई ताहि गुन समझायौ है।।४६८।। राजा रीझि पाँव गहे कहे जू वचन नीके, ऐपै नेकु आप जाय तत्व याकौ ल्याइयै। आये दौर पाँव लपटाय भूप भाय भरे, परे प्रेमसागर में चरचा चलाइयै।। चलिवे न देत सुख देत चले लोल मन, खोलिकै भण्डार दियौ लियौ न रिझाइयै।। उभै सुवा सारौ कही एक करधारौ मेरे, दई अकुलाय लई मानौ निधि पाइयै।।४६६।। आयौ राजसभा बहु बातनि अखारौ जहाँ, बोलि उठी सारौ कृष्ण कहौ झारि डोरे हैं। पूछैं नृप कहौ अहो! लहौ सब याही सौं जू, पच्छी वा समाज रहै हरि प्रान प्यारे हैं।। कोटि-कोटि रसना बखानौं पै न पाऊँ पार सार सुनि भक्ति आय सीस पाँव धारे हैं। राखौ यह खग पगे रह्यौ तन मन स्याम अति अभिराम रीति मिले औ पधारे हैं।।४७०।। मास परायण इक्कीसवाँ विश्राम श्रीमीराजी लोकलाज कुल श्रृंखला, तजि मीरा गिरिधर भजी।। सदृश गोपिका प्रेम, प्रगट कलिजुगहिं दिखायौ। निरंकुश, अति निडर, रसिक जस रसना गायौ।।