भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

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श्रीमीराजी) (१२१ दुष्टनि दोष विचारि, मृत्यु को, उद्यम कीयौ। बार न बाँकौ भयौ, गरल अमृत ज्यौं पीयौ॥ भक्ति निसान बजायकै, काहू ते नाहिन लजी। लोकलाज कुल शृंखला, तजि मीरा गिरिधर भजी।।११५।।

मेरतौ जनम भूमि, झूमि हित नैन लगे, पगे गिरिधारीलाल, पिता ही के धाम में। राना कै सगाई भई, करी ब्याह सामा नई, गई मति बूडि वा रँगीले घनस्याम में।। भाँवरैं परत मन, साँवरे सरूप माँझ, ताँवरैं-सी आवैं, चलिवे कौ पति ग्राम में। पूछैं पिता-माता पट, आभरन लीजियै जू, लोचन भरत नीर कहा काम दाम में ।।४७१।।

देवौ गिरिधारीलाल, जौ निहाल कियौ चाहौ, और धनमाल सब रखियै उठायकै। बेटी अति प्यारी, प्रीति रंग चढ़यौ भारी, रोय मिली महतारी, कही लीजियै लड़ायकै।। डोला पधराय, दृग-दृग सौं लगाय, चलीं सुख न समाय, चाय प्रानपति पायकै। पहुँचीं भवन सासु, देवी पै गवन कियौ, तिया अरू वर, गाँठजोरौ कर्यो भायकै।।४७२।।

देवी के पुजायवे कौं, कियौ ले उपाय सासु, वर पै पुजाइ, पुनि बधू पूजि भाखियै। बोली जू बिकायो माथौ, लाल गिरिधारी हाथ, और कौ न नवै एक, वही अभिलाखियै।। बढ़त सुहाग याके, पूजे ताते पूजा करो, करौ जिनि हठ, सीस पाँयनि पै राखियै। कही बार-बार, तुम यही निरधार जानौ, वही सुकुमार जापै, वारि फेरि नाखियै।।४७३।।

तबतौ खिसानी भई, अति जरि बरि गई, गई पति पास, यह बधू नहीं काम की। अबहीं जवाब दियौ, कियौ अपमान मेरो, आगे क्यौं प्रमान करै? भरै स्वांस चाम की।। राना सुनि कोप कर्यौ, धर्यौ हिये मारिवोई, दई ठौर न्यारी देखि, रीझी मति बाम की। लालनि लड़ावै, गुन गायकै मल्हावै, साधुसंग ही सुहावै, जिन्हें लागी चाह स्याम की।।४७४।।

आयकै ननन्द कहै, गहे किन चेत भाभी!, साधुनि सौं हेत में, कलंक लागै भारियै। राना देशपति लाजै, बाप कुल रीति जात, मानि लीजै बात, वेगि संग निरवारियै।। लागे प्रान साथ, सन्त पावत अनन्त सुख, जाको दुख होय ताको, नीके करि टारियै। सुनिकै कटोरा भरि, गरल पठाय दियौ, लियौ करि पान, रंग चढ़यौ यों निहारियै।।४७५।।

गरल पठायौ सो तौ, सीस लै चढ़ायौ संग, त्याग विष भारी, ताकी झार न सँभारी है। राना नै लगायौ चर, बैठे साधु ढिंग ढर, तबही खबर कर, मारौ यहै धारी है।।