श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४) (श्री भक्तमाल ईश्वर अखैराज रायमल, कन्हर मधुकर नृप सरबसु दियौ। भक्तनि कौ आदर अधिक, राजवंश में इन कियौ।।११७।। श्रीजयमलजी मेरतें बसत भूप भक्ति को सरूप जानै, जैमल अनूप जाकी कथा कहि आये हैं। करी साधुसेवा, रीति प्रीति की प्रतीति भई, नई एक सुनौ हरि कैसे कै लड़ाये हैं।। नीचे मान मन्दिर सो सुन्दर विचारी बात, छत पर बँगल़ा के, चित्र लै बनाये हैं। विविध बिछौना सेज, राजत उड़ौना पानदान धरि सोंना, जरी परदा सिंवाये हैं।।४८६।। ताकी दारु सीढ़ी करि, रचना उतारि धरें, भरें दूरि चौकी आप, भाव स्वच्छताई है। मानसी विचारें, लाल सेज पग धारें, पान खात लै उगार डारैं, पौढ़े सुखदाई है।। तिया हू न भेद जानै सो निसेनी धरी वानै, देखिकै किसोर सोयौ, फिरी भोर आई है। पति को सुनाई भई, अति मनभाई वाकौ, खीझि डरपाई जानी, भाग अधिकाई है।।४८७।। श्रीमद्युकरशाहजी मधुकरशाह नाम, कियौ लै सफल जातें, भेष गुनसार ग्रहै, तजत असार है। ओड़छे कौ भूप, भक्तभूप सुखरूप भयौ, लयौ पन भारी जाके और न विचार है।। कण्ठी धरि आवै कोय, धोय पग पीवै सदा, भाई दूखि खर गर, डार्यौ माल भार है। पाँव परछाल कही, आज जू निहाल किये, हिये द्रब्ये दुष्ट, पाँव गहे दृग धार है।।४८८।। सप्ताह परायण पांचवा विश्राम श्रीखेमालरत्नजी खेमालरतन राठौर के, अटल भक्ति आई सदन।। रैना पर गुण राम, भजन भागौत उजागर। प्रेमी परम किशोर, उदर राजत रतनाकर।। हरिदासन के दास, दसा ऊँची ध्वज धारी। निर्भय अननि उदार, रसिक जस रसना भारी।। दशधा सम्पति सन्त बल, सदा रहत प्रफुलित वदन। खेमालरतन राठौर के, अटल भक्ति आई सदन।।११८।।