श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीपृथ्वीराज जी) (१२३ श्रीपृथ्वीराजजी पृथ्वीराज राजा चल्यौ, द्वारका श्रीस्वामी संग, अति रसरंग भर्यौ, आज्ञा प्रभु पाई है। सुनिकै दीवान, दुख मानि निसि कान लग्यौ, कही पग्यो साधुसेवा, भक्ति घर छाई है।। देखियै निहारिकै, विचार कीजै इच्छा जोई, लीजै नहीं साथ, जावो बात ले दुराई है। आयौ भोर भूप, हाथ जोरि करि ठाढ़ौ रह्यौ, कह्यौ रहौ देस सो, निदेस न सुहाई है।।४८१।। द्वारावतीनाथ देखौं, गोमती स्नान करौं, धरौं भुज छाप आप, मन अभिलाखियै। चिन्ता जिनि कीजै, तीनों बात इहाँ लीजै अजू, दीजै जोई आज्ञा सोई, सिर धरि राखियै। आये पहुँचाय दूर, नैन जल पूरि बहै, दहै उर भारी, कहाँ संग रस चाखियै। बीते दिन दोय, निसि रहे हुते सोइ, भोइ गई भक्ति गिरा, आय वानी मधु, भाखियै।।४८२।। अहो पृथ्वीराज कही, स्वामी ही सी वानी लही, आयौ उठि दौरि, वाही ठौर प्रभु देखे हैं। घूम्यौ कह्यौ कान, धरौ गोमती स्नान करौ, सुनिकै अन्हह्यौ पुनि, वे न कहूँ पेखे हैं।। शंख चक्र आदि छाप, तन सब व्यापि गई, भई यों अबार रानी, आय अबरेखे हैं। बोले रह्यौ नीर में, सरीर लै सनाथ कीजै, लीजै नाथ हियैं निज, भाग करि लेखे हैं।।४८३।। भयौ जब भोर, पुर बड़ौ भक्ति शोर पर्यौ, पर्यौ आनि दरसन, भई भीर भारी है। आये बहु सन्त औ महन्त बड़े-बड़े धाये, अति सुख पाये देह, रचना निहारी है।। नाना भेंट आवैं हित, महिमा सुनावैं राजा, सुनत लजावैं जानी, कृपा वनवारी है। मन्दिर करायौ, प्रभुरूप पधरायौ सब, जग जस गायौ कथा, मोकौं लागी प्यारी है।।४८४।। विप्र दृगहीन सो, अनाथ बैजनाथ द्वार पर्यौ, चख चाहै मास, केतिक बिहाने हैं। आज्ञा बार दोय चार, भई ये न फेरि होहिं, याको हठसार देखि, शिव पिघलाने हैं।। पृथ्वीराज अंग के, अँगोछा सौं अँगोछौ जाय, आयकै सुनाई द्विज, गौरव डेराने हैं। नयौ मँगवाय तन, छ्वाय दियौ छ्वायौ नैन, खुले चैन, भयौ जन लखि सरसाने हैं।।४८५।। भक्तनि कौ आदर अधिक, राजवंश में इन कियौ।। लघु मधुरा मेरता, भक्त अति जैमल पोषे। टोड़े भजन निधान, रामचन्द्र हरिजन तोषे।। अभैराम एक रसहिं, नेम नींवा के भारी। करमशील सुरतान भगवान्, बीरम भूपति व्रतधारी।।