भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीरामरयन जी की धर्मपत्नी) (१२५ श्रीरामरयनजी कलिजुग भक्ति करी कमान, रामरैन कैं रिजु करी। अजर धर्म आचर्यौ, लोक हित, मनौ नीलकंठ। निन्दकजन अनिराय, कहा महिमा जानैगो भूसठ॥ विदित गान्धर्वी ब्याह, कियौ दुसकन्त प्रमानै। भरत पुत्र भागौत, सुमुख शुकदेव बखानै॥ और भूप कोउ छ्वै सकै, दृष्टि जाय नाहिन धरी। कलियुग भक्ति करी कमान, रामरैन कैं रिजु करी।।११६।। पूनौँ में प्रकास भयौ, शरद् समाज रास, विविध विलास, नृत्य रागरंग भारी है। बैठे रस भीजे दोऊ, बोल्यो राम राजा रीझि, भेंट कहा कीजै, विप्र कही जोई प्यारी है।। प्यार को विचारै न, निहारै कहूँ नैकु छटा, सुता रुपघटा, अनुरूप सेवा ज्यारी है। रही सभा सोचि, आप जायके लिवाय ल्याये, भेष सौं दिवाये फेरे, सम्पति लै बारी है।।४८६।। श्रीरामरयनजी की धर्मपत्नी हरि गुरु हरिदासनि सौं, रामघरनि साँची रही।। आरज कौ उपदेश, सुनौ उर नीके धार्यौ। नवधा दशधा प्रीति, आन सबै धर्म बिसार्यौ।। अच्युतकुल अनुराग, प्रगट पुरूषारथ जान्यौ। सारासार विवेक, बात तीनौं मन मान्यौ।। दासत्व अनन्य उदारता, सन्तनि मुख राजा कही। हरि गुरु हरिदासनि सौं, रामघरनि साँची रही।।१२०।। आये मधुपुरी राजा, राम अभिराम दोऊ, दाम पै न राख्यो, साधु विप्र भुगताये हैं। ऐसे ये उदार राह, खरच सँभार नाहिं, चलिवो विचार भयौ, चूरा दीठि आये हैं।। मुद्रा सत पाँच मोल, खोलि तिया आगे, धरे दीजै बेंचि गये, नाभा कर पहिराये हैं। पति को बुलाइ कही, नीके देखि रीझे भीजे, काढ़िकै करज पुर, आये दै पठाये हैं।।४६०।। मास परायण बाईसवाँ विश्राम