भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

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१३०) (श्री भक्तमाल गोप नारि अनुसारि, गिरा गद्गद आवेशी। जग प्रपंच ते दूरि, अजा परसै नहीं लेशी॥ भगवान् रीति अनुराग की, सन्त साखि मेली सही। कात्यायनी के प्रेम की, बात जात कापै कही॥ १२७॥ श्रीमुरारिदासजी कृष्ण विरह कुन्ती शरीर, त्यौं मुरारि तन त्यागियौ॥ विदित बिलौंदा गाँव, देश मुरधर सब जानै। महा महोच्छौ मध्य, सन्त परिषद् परवानै॥ पगनि घूँघुरू बाँधि, राम कौ चरित दिखायौ। देसी सारँगपाणि, हंस ता संग पठायौ॥ उपमा और न जगत् में, पृथा बिना नाहिन बियौ। कृष्ण विरह कुन्ती शरीर, त्यौं मुरारि तन त्यागियौ॥ १२८॥ श्रीमुरारिदास रहे, राजगुरु, भक्त-दास, आवत स्नान किये, कान धुनि कीजिये। जाति कौ चमार करै, सेवा सो उचारि कहै, प्रभु चरनामृत कौ, पात्र जोई लीजिये॥ गये घर मांझ वाके, देखि डर काँपि उठ्यौ, ल्यावौ देवौ हमें, अहो पान करि जीजिये। कही मैं तो न्यून तुच्छ, बोले हमहूँ तें स्वच्छ, जानै कोऊ नाहिं, तुम्हें मेरी मति भीजिये॥५०३॥ बहै दृग नीर कहै, मेरे बड़ी पीर भई, तुम मति धीर नहीं, मेरी योग्यताई है। लियौई निपट हठ, बड़े पटु साधुता में, स्यामै प्यारी भक्ति, जाति-पाँति लै बहाई है।। फैलि गई गाँव, वाकौ नांव लै चवाब करैं, भरै नृप कान सुनि, वाहू न सुहाई है। आयौ प्रभु दखिवे कौं, गयौ वह रंग उड़ि, जान्यौ सो प्रसंग सुन्यौ, वहै बात छाई है॥५०४॥ गये सब त्यागि, प्रभुसेवा ही सौं राग जिन्हें, नृप दुख पागि गयौ, सुनी यह बात है। होत हो समाज सदा, भूप के बरस माँझ, दरस न काहू होत, मान्यौ उतपात है।। चलेई लिबायवे कौं, जहाँ श्रीमुरारिदास, करी साष्टांग, रास नैन अश्रुपात है। मुखहुँ न देखें वाको, विमुख कै लेखैं अहो, पेखैं लोग कहैं, यह गुरु शिष्य ख्यात है॥५०५॥