श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकात्यायनीजी) (१२६ अंगीकार की अवधि यह, ज्यों आख्या भ्राता जमल। (श्री)मदनमोहन सूरदास की, नाम श्रृंखला जुरी अटल ॥१२६॥ सूरदास नाम, नैन कंज अभिराम फूले, झूले रंग पीके नीके, जिय के और ज्याये हैं। भये सो अमीन यों, सँडीले के नवीन रीति, प्रीति गुड़ देखि, दाम बीसगुने लाये हैं॥ कही पूवा पावैं आप, मदनगोपाल लाल, परे प्रेम ख्याल, लादि छकरा पठाये हैं। आये निसि भये, स्याम कियौ आज्ञा जोग लैके, अबही लगावौ भोग, जागे फिरि पाये हैं॥४६८॥ पद लै बनायौ, भक्तिरूप दरसायौ, दूर सन्तनि की पनहीं को, रच्छक कहाऊँ मैं। काहू सीखि लियो, साधु लियो चाहै परचै कौं, आये द्वार मन्दिर के, खोलि कही आऊँ मैं ।। रह्यौ बैठि जाय, जूति हाथ में उठाय लीनी, कीनी पूरी आस मेरी, निसिदिन गाऊँ मैं। भीतर बुलाये श्रीगुसाँई, बार दोय चार, सेवा सौंपी सार, कह्यौ जन पग ध्याऊँ मै ॥४६६॥ पृथ्वीपति सम्पति लै, साधुनि खबाइ दई, भई नहीं शंक यों, निशंक रंग पागे हैं। आये सो खजानौ लैन, मानौ यह बात अहो, पाथर लै भरे आप, आधी निसि भागे हैं।। रूक्का लिखि डारे दाम, गटके ये सन्तनि नैं, याते हम सटके हैं, चले जब जागे हैं। पहुँचे हुजूर भूप, खोलिकै सन्दूक देखें, पेखैं आँक कागद में, रीझि अनुरागे हैं।। ५००।। लैन कौं पठाये कही, निपट रिझाये हमें, मन में सं ल्याये, लिखी वन तन् डार्यौ है। टोडर दिवान कह्यौ, धन कौं विरान कियो, ल्यावौ रे पकरि मूढ़, फेरिकै सँभार्यौ है।। लै गये हुजूर, नृप बोल्यौ मोसों दूर राखौ, ऐसौ महाक्रूर सौंपि, दुष्ट कष्ट धार्यौ है। दोहा लिखि दीनौ अकबर देखि रीझि लीनौ, जावौ वाही ठौर तोपै द्रव्य सब बार्यौ है।।५०१।। आये वृन्दावन मन, माधुरी में भीजि रह्यौ, कह्यौ जोई पद, सुन्यौ रूप रसरासि है। जा दिन प्रगट भयौ, गयौ शत जोजन पै, जन पै सुनत भेद, बाढ़ी जग प्यास है।। सूरध्वज द्विज निज, महल-टहल पाय, चहल-पहल हिये, जुगल प्रकास है। मदनमोहन जू हैं, इष्ट-इष्ट महाप्रभु, अचरज कहा कृपादृष्टि अनायास है।। ५०२।। श्रीकात्यायनीजी कात्यायनी के प्रेम की, बात जात कापै कही।। मारग जात अकेल, गान रसना जु उचारैं। ताल मृदंगी वृक्ष, रीझि अम्बर तहँ डारैं॥