श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८) (श्री भक्तमाल सक्रकोप सुठि चरित, प्रसिध पुनि पंचाध्यायी। कृष्ण रुक्मिनी केलि, रुचिर भोजन विधि गाई।। गिरिराजधरन की छाप, गिरा जलधर ज्यौं गाजै। सन्त सिखण्डी खण्ड, हृदै आनन्द के काजै।। जाड़ा हरन जग जाड़ता, कृष्णदास देही धरी। चालक की चरचरी चहुँदिसि, उदधि अन्त लौं अनुसरी ।।१२४।। श्रीसन्तदासजी विमलानन्द प्रबोध वंश, सन्तदास सींवा धरम।। गोपीनाथ पद राग, भोग छप्पन भुंजाये। पृथु पद्धति अनुसार, देव दम्पति दुलराये।। भगवत् भक्त समान, ठौर द्वै कौ बल गायौ। कवित सूर सौं मिलत, भेद कछु जात न पायौ।। जन्म कर्म लीला जुगति, रहसि भक्ति भेदी मरम। विमलानन्द प्रबोध वंश, सन्तदास सींवा धरम।। १२५।। बसत निवाई ग्राम, स्याम सौं लगाई मति, ऐसी मन आई, भोग छप्पन लगाये हैं। प्रीति की सचाई यह, जग में दिखाई सेवैं, जगन्नाथदेव आप, रुचि सौं जिंवाये हैं।। राजा कौं सुपन दियौ, नाम लै प्रगट कियौ, सन्त ही के गृह में तौं, जेवौं यों रिझाये हैं। भक्ति के अधीन सब, जानत प्रवीनजन, ऐसे हैं रंगीन लाल, ठौर-ठौर गाये हैं।। ४६७।। श्रीसूरदासजी-मदनमोहन (श्री) मदनमोहन सूरदास की, नाम श्रृंखला जूरी अटल ।। गान काव्य गुणराशि, सुहृद् सहचरि अवतारी। राधाकृष्ण उपास्य, रहसि सुख के अधिकारी।। नवरस मुख्य सिंगार, विविध भाँतिन करि गायौ। वदन उच्चरित बेर, सहस पावनि ह्वै धायौ।।