भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीकृष्णदासजी चालक) (१२७ श्रीचतुर्भुजदासजी कीर्तननिष्ठ (श्री) हरिवंश चरनबल चतुर्भुज, गौंड़ देश तीरथ कियौ ।। गायौ भक्ति प्रताप, सबहिं दासत्व दृढ़ायौ। राधावल्लभ भजन, अनन्यता वर्ग बढ़ायौ ।। मुरलीधर की छाप, कवित अति ही निर्दूषन। भक्तिनि की अँघ्रिरेनु, वहै धारी सिर भूषन ।। सत्संग महा आनन्द में , प्रेम रहत भीज्यो हियौ। (श्री) हरिवंश चरनबल चतुर्भुज , गौंड़ देश तीरथ कियौ ।।१२३ ।। गौंड़वाने देश, भक्ति लेशहूँ न दीखै कहूँ, मानुस कौं मारि, इष्टदेव कौं चढ़ायौ है। तहाँ जाय देवता कौं, मन्त्र लै सुनायौ कान, लियौ उन मानि, गाँव सुपन सुनायौ है।। स्वामी चतुर्भुज जू के, वेगि तुम दास होहु, नातौ होय नास, सब गाँव भज्यौ आयौ है। ऐसे शिष्य किये, मालाकण्ठी पाय जिये, पाँव लिये मन दिये, औ अनन्त सुख पायौ है।।४६३।। भोग लै लगावैं नाना, सन्तनि लड़वैं कथा, भागवत गावैं, भावभक्ति बिसतारियै। भज्यौ धन लैके कोऊ, धनी पाछै पर्यो सोऊ, आनिकै दबायौ बैठि, रह्यौ न निहारियै।। निकसी पुरान बात, करै नयाँ गात दिच्छा-सिच्छा सुनि शिष्य, भयौ गह्यौ यों पुकारियै। कहै या जनम मैं न, लियौं कछू दियौ फारौ, हाथ लै उबार्यौ, प्रभु रीति लगी प्यारियै।।४६४।। राजा झूठ मानि कह्यौ, करो बिन प्रान याकौं, साधु ये विराजमान, लै कलंक दियौ है। चले ठौर मारिवे कौं, धारिवे कौं सकै कैसे, नैन भरि आये नीर, बोल्यौ धन लियौ है।। कहै नृप साँचो ह्वैकै, झूठौ जिन हूजै सन्त,-महिमा अनन्त कही, स्वामी ऐसो कियौ है। भूप सुनि आयौ, उपदेस मन भायौ, शिष्य भयौ नयौ तन, पायौ भीजि गयौ हियौ है।।४६५।। पकि रह्यौ खेत, सन्त आय करि तोरी लेत, जिते रखवारे, मुख सेत शोर कियौ है। कह्यौ स्वामी नाम सुन्यौ, कही बड़ौ काम भयौ, यह तौ हमारौ सोई, आप सुनि लियौ है।। लैकै मिष्टान आय, सुमुख बखान कीनौ, लीनौ अपनाय, आज भीज्यौ मेरौ हियौ है। लै गये लिवाय नाना, भोजन कराय भक्ति, चरचा चलाय, चाय हित रस पियौ है।।४६६।। श्रीकृष्णदासजी चालक चालक की चरचरी चहुँदिसि, उदधि अन्त लौं अनुसरी।।