श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
श्रीकृष्णदासजी चालक) (१२७ श्रीचतुर्भुजदासजी कीर्तननिष्ठ (श्री) हरिवंश चरनबल चतुर्भुज, गौंड़ देश तीरथ कियौ ।। गायौ भक्ति प्रताप, सबहिं दासत्व दृढ़ायौ। राधावल्लभ भजन, अनन्यता वर्ग बढ़ायौ ।। मुरलीधर की छाप, कवित अति ही निर्दूषन। भक्तिनि की अँघ्रिरेनु, वहै धारी सिर भूषन ।। सत्संग महा आनन्द में , प्रेम रहत भीज्यो हियौ। (श्री) हरिवंश चरनबल चतुर्भुज , गौंड़ देश तीरथ कियौ ।।१२३ ।। गौंड़वाने देश, भक्ति लेशहूँ न दीखै कहूँ, मानुस कौं मारि, इष्टदेव कौं चढ़ायौ है। तहाँ जाय देवता कौं, मन्त्र लै सुनायौ कान, लियौ उन मानि, गाँव सुपन सुनायौ है।। स्वामी चतुर्भुज जू के, वेगि तुम दास होहु, नातौ होय नास, सब गाँव भज्यौ आयौ है। ऐसे शिष्य किये, मालाकण्ठी पाय जिये, पाँव लिये मन दिये, औ अनन्त सुख पायौ है।।४६३।। भोग लै लगावैं नाना, सन्तनि लड़वैं कथा, भागवत गावैं, भावभक्ति बिसतारियै। भज्यौ धन लैके कोऊ, धनी पाछै पर्यो सोऊ, आनिकै दबायौ बैठि, रह्यौ न निहारियै।। निकसी पुरान बात, करै नयाँ गात दिच्छा-सिच्छा सुनि शिष्य, भयौ गह्यौ यों पुकारियै। कहै या जनम मैं न, लियौं कछू दियौ फारौ, हाथ लै उबार्यौ, प्रभु रीति लगी प्यारियै।।४६४।। राजा झूठ मानि कह्यौ, करो बिन प्रान याकौं, साधु ये विराजमान, लै कलंक दियौ है। चले ठौर मारिवे कौं, धारिवे कौं सकै कैसे, नैन भरि आये नीर, बोल्यौ धन लियौ है।। कहै नृप साँचो ह्वैकै, झूठौ जिन हूजै सन्त,-महिमा अनन्त कही, स्वामी ऐसो कियौ है। भूप सुनि आयौ, उपदेस मन भायौ, शिष्य भयौ नयौ तन, पायौ भीजि गयौ हियौ है।।४६५।। पकि रह्यौ खेत, सन्त आय करि तोरी लेत, जिते रखवारे, मुख सेत शोर कियौ है। कह्यौ स्वामी नाम सुन्यौ, कही बड़ौ काम भयौ, यह तौ हमारौ सोई, आप सुनि लियौ है।। लैकै मिष्टान आय, सुमुख बखान कीनौ, लीनौ अपनाय, आज भीज्यौ मेरौ हियौ है। लै गये लिवाय नाना, भोजन कराय भक्ति, चरचा चलाय, चाय हित रस पियौ है।।४६६।। श्रीकृष्णदासजी चालक चालक की चरचरी चहुँदिसि, उदधि अन्त लौं अनुसरी।।
१२८) (श्री भक्तमाल सक्रकोप सुठि चरित, प्रसिध पुनि पंचाध्यायी। कृष्ण रुक्मिनी केलि, रुचिर भोजन विधि गाई।। गिरिराजधरन की छाप, गिरा जलधर ज्यौं गाजै। सन्त सिखण्डी खण्ड, हृदै आनन्द के काजै।। जाड़ा हरन जग जाड़ता, कृष्णदास देही धरी। चालक की चरचरी चहुँदिसि, उदधि अन्त लौं अनुसरी ।।१२४।। श्रीसन्तदासजी विमलानन्द प्रबोध वंश, सन्तदास सींवा धरम।। गोपीनाथ पद राग, भोग छप्पन भुंजाये। पृथु पद्धति अनुसार, देव दम्पति दुलराये।। भगवत् भक्त समान, ठौर द्वै कौ बल गायौ। कवित सूर सौं मिलत, भेद कछु जात न पायौ।। जन्म कर्म लीला जुगति, रहसि भक्ति भेदी मरम। विमलानन्द प्रबोध वंश, सन्तदास सींवा धरम।। १२५।। बसत निवाई ग्राम, स्याम सौं लगाई मति, ऐसी मन आई, भोग छप्पन लगाये हैं। प्रीति की सचाई यह, जग में दिखाई सेवैं, जगन्नाथदेव आप, रुचि सौं जिंवाये हैं।। राजा कौं सुपन दियौ, नाम लै प्रगट कियौ, सन्त ही के गृह में तौं, जेवौं यों रिझाये हैं। भक्ति के अधीन सब, जानत प्रवीनजन, ऐसे हैं रंगीन लाल, ठौर-ठौर गाये हैं।। ४६७।। श्रीसूरदासजी-मदनमोहन (श्री) मदनमोहन सूरदास की, नाम श्रृंखला जूरी अटल ।। गान काव्य गुणराशि, सुहृद् सहचरि अवतारी। राधाकृष्ण उपास्य, रहसि सुख के अधिकारी।। नवरस मुख्य सिंगार, विविध भाँतिन करि गायौ। वदन उच्चरित बेर, सहस पावनि ह्वै धायौ।।
श्रीकात्यायनीजी) (१२६ अंगीकार की अवधि यह, ज्यों आख्या भ्राता जमल। (श्री)मदनमोहन सूरदास की, नाम श्रृंखला जुरी अटल ॥१२६॥ सूरदास नाम, नैन कंज अभिराम फूले, झूले रंग पीके नीके, जिय के और ज्याये हैं। भये सो अमीन यों, सँडीले के नवीन रीति, प्रीति गुड़ देखि, दाम बीसगुने लाये हैं॥ कही पूवा पावैं आप, मदनगोपाल लाल, परे प्रेम ख्याल, लादि छकरा पठाये हैं। आये निसि भये, स्याम कियौ आज्ञा जोग लैके, अबही लगावौ भोग, जागे फिरि पाये हैं॥४६८॥ पद लै बनायौ, भक्तिरूप दरसायौ, दूर सन्तनि की पनहीं को, रच्छक कहाऊँ मैं। काहू सीखि लियो, साधु लियो चाहै परचै कौं, आये द्वार मन्दिर के, खोलि कही आऊँ मैं ।। रह्यौ बैठि जाय, जूति हाथ में उठाय लीनी, कीनी पूरी आस मेरी, निसिदिन गाऊँ मैं। भीतर बुलाये श्रीगुसाँई, बार दोय चार, सेवा सौंपी सार, कह्यौ जन पग ध्याऊँ मै ॥४६६॥ पृथ्वीपति सम्पति लै, साधुनि खबाइ दई, भई नहीं शंक यों, निशंक रंग पागे हैं। आये सो खजानौ लैन, मानौ यह बात अहो, पाथर लै भरे आप, आधी निसि भागे हैं।। रूक्का लिखि डारे दाम, गटके ये सन्तनि नैं, याते हम सटके हैं, चले जब जागे हैं। पहुँचे हुजूर भूप, खोलिकै सन्दूक देखें, पेखैं आँक कागद में, रीझि अनुरागे हैं।। ५००।। लैन कौं पठाये कही, निपट रिझाये हमें, मन में सं ल्याये, लिखी वन तन् डार्यौ है। टोडर दिवान कह्यौ, धन कौं विरान कियो, ल्यावौ रे पकरि मूढ़, फेरिकै सँभार्यौ है।। लै गये हुजूर, नृप बोल्यौ मोसों दूर राखौ, ऐसौ महाक्रूर सौंपि, दुष्ट कष्ट धार्यौ है। दोहा लिखि दीनौ अकबर देखि रीझि लीनौ, जावौ वाही ठौर तोपै द्रव्य सब बार्यौ है।।५०१।। आये वृन्दावन मन, माधुरी में भीजि रह्यौ, कह्यौ जोई पद, सुन्यौ रूप रसरासि है। जा दिन प्रगट भयौ, गयौ शत जोजन पै, जन पै सुनत भेद, बाढ़ी जग प्यास है।। सूरध्वज द्विज निज, महल-टहल पाय, चहल-पहल हिये, जुगल प्रकास है। मदनमोहन जू हैं, इष्ट-इष्ट महाप्रभु, अचरज कहा कृपादृष्टि अनायास है।। ५०२।। श्रीकात्यायनीजी कात्यायनी के प्रेम की, बात जात कापै कही।। मारग जात अकेल, गान रसना जु उचारैं। ताल मृदंगी वृक्ष, रीझि अम्बर तहँ डारैं॥
१३०) (श्री भक्तमाल गोप नारि अनुसारि, गिरा गद्गद आवेशी। जग प्रपंच ते दूरि, अजा परसै नहीं लेशी॥ भगवान् रीति अनुराग की, सन्त साखि मेली सही। कात्यायनी के प्रेम की, बात जात कापै कही॥ १२७॥ श्रीमुरारिदासजी कृष्ण विरह कुन्ती शरीर, त्यौं मुरारि तन त्यागियौ॥ विदित बिलौंदा गाँव, देश मुरधर सब जानै। महा महोच्छौ मध्य, सन्त परिषद् परवानै॥ पगनि घूँघुरू बाँधि, राम कौ चरित दिखायौ। देसी सारँगपाणि, हंस ता संग पठायौ॥ उपमा और न जगत् में, पृथा बिना नाहिन बियौ। कृष्ण विरह कुन्ती शरीर, त्यौं मुरारि तन त्यागियौ॥ १२८॥ श्रीमुरारिदास रहे, राजगुरु, भक्त-दास, आवत स्नान किये, कान धुनि कीजिये। जाति कौ चमार करै, सेवा सो उचारि कहै, प्रभु चरनामृत कौ, पात्र जोई लीजिये॥ गये घर मांझ वाके, देखि डर काँपि उठ्यौ, ल्यावौ देवौ हमें, अहो पान करि जीजिये। कही मैं तो न्यून तुच्छ, बोले हमहूँ तें स्वच्छ, जानै कोऊ नाहिं, तुम्हें मेरी मति भीजिये॥५०३॥ बहै दृग नीर कहै, मेरे बड़ी पीर भई, तुम मति धीर नहीं, मेरी योग्यताई है। लियौई निपट हठ, बड़े पटु साधुता में, स्यामै प्यारी भक्ति, जाति-पाँति लै बहाई है।। फैलि गई गाँव, वाकौ नांव लै चवाब करैं, भरै नृप कान सुनि, वाहू न सुहाई है। आयौ प्रभु दखिवे कौं, गयौ वह रंग उड़ि, जान्यौ सो प्रसंग सुन्यौ, वहै बात छाई है॥५०४॥ गये सब त्यागि, प्रभुसेवा ही सौं राग जिन्हें, नृप दुख पागि गयौ, सुनी यह बात है। होत हो समाज सदा, भूप के बरस माँझ, दरस न काहू होत, मान्यौ उतपात है।। चलेई लिबायवे कौं, जहाँ श्रीमुरारिदास, करी साष्टांग, रास नैन अश्रुपात है। मुखहुँ न देखें वाको, विमुख कै लेखैं अहो, पेखैं लोग कहैं, यह गुरु शिष्य ख्यात है॥५०५॥
श्रीतुलसीदासजी) (१३१ ठाढ़ौ हाथ जोरि, मति दीनता में वोरि, कीजै दण्ड मोपै कोरि, यों निहारि मुख भाखियै। घटती ने मेरी, आप कृपा ही की घटती है, बढ़ती-सी करी, तातें न्यूनताई राखियै॥ सुनिकै प्रसन्न भये, कहे लै प्रसंग नये, बालमीकि आदि दै-दै, नानाविधि साखियै। आये निज गाँव, नाम सुनि सब साधु धाये, भयोई समाज वैसो, देखि अभिलाखियै।।५०६।। आये बहु गुनीजन, नृत्य-गान छाई धुनि, ऐपै सन्तसभा मन, स्वामी गुण देखिये। जानिकै प्रवीन उठे, नूपुर नवीन बाँधि, सप्तस्वर तीन ग्राम, लीन भये पेखिये।। गायौ रघुनाथ जू कौ, वन कौ गमन समैं, ता संग गमन प्रान, चित्र सम लेखिये। भयौ दुखरासि, कहाँ पैयै श्रीमुरारिदास, गये राम पास, एतौ हिये अबरेखिये।। ५०७।। मास परायण तेईसवाँ विश्राम गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी (भक्तमाल सुमेरु) कलि कुटिल जीव निस्तार हित, बाल्मीकि तुलसी भयौ।। त्रेता काव्य निबन्ध, करी सतकोटि रमायन। इक अक्षर उद्धरैं, ब्रह्म हत्यादि परायन ।। अब भक्तनि सुखदैन, बहुरि लीला विस्तारी। रामचरन रसमत्त, रहत अहर्निसि व्रतधारी ।। संसार अपार के पार को, सुगम रूप नवका लयौ। कलि कुटिल जीव निस्तार हित, बाल्मीकि तुलसी भयौ ।। १२६ ।। तिया सौं सनेह, बिन पूछे पिता गेह गई, भूली सुधि देह, भजे वाही ठौर आये हैं। बधू अति लाज भई, रिस सौं निकसि गई, प्रीति राम नई, तन हाड़-चाम छाये हैं।। सुनी जब बात, मानौ ह्वै गयौ प्रभात, वह पाछे पछितात्त, तजि कासीपुरी धाये हैं। कियौ तहाँ वास, प्रभुसेवा लै प्रकास कीनौ, लीनौ दृढ़भाव, नैन रूप के तिसाये हैं।। ५०८।। शौच जल शेष, पाय भूतहू विशेष, कोऊ बोल्यौ सुखमानि, हनुमान जू बताये हैं। रामायन कथा सौ, रसायन है काननि कौ, आवत प्रथम पाछे, जात घृना छाये हैं।। जाय पहिचानि, संग चले उर आनि आये, वन मधि जानि, धाय पाँय लपटाये हैं। करैं तिरस्कार कही, सकौगे न टारि मैं तो, जाने रससार रूप, धर्यौ जैसे गाये हैं।। ५०६ ।। माँगि लीजै वर, कही दीजै राम भूपरूप, अति ही अनूप नित, नैन अभिलाखियै। कियौ लें संकेत, वाही दिन ही सौं लाग्यौ हेत, आई सोई समैं, चेत कब छबि चाखियै ।।
१७२) (श्री भक्तमाल आये रघुनाथ साथ, लछिमन चढ़े घोरे, पट, रंग बोरे हरे कैसे मन राखियै। पाछे हनुमान आये, बोले देखे प्रान प्यारे, नेकु न निहारे मैं तौ, भलैं फेरि भाखियै।।५१०।। हत्या करि विप्र एक, तीरथ करत आयौ, कहै मुख राम, भिच्छा डारियै हत्यारे कौ। सुनि अभिराम नाम, धाम में बुलाय लियौ, दियौ लै प्रसाद, कियौ शुद्ध गायौ प्यारे कौ।। भई द्विजसभा, कहि बोलिकै पठाये आप, कैसे गयौ पाप, संग लैके जेंये न्यारे कौ। पोथी तुम बाँचौ, हिये भाव नहीं साँचौ, अजू ताते मति काँचौ, दूर करै न अंध्यारे कौ।।५११।। देखी पोथी बाँच, नाम-महिमा हूँ कही साँच, ऐपै हत्या करै, कैसें तरै कहि दीजियै। आवै जो प्रतीति, कहौ कही याके हाथ जेंवैं, शिव जू कौ बैल, तब पंगति में लीजियै।। थार में प्रसाद दियौ, चले जहाँ पन कियौ, बोले आप नाम कै, प्रसाद मति भीजियै। जैसी तुम जानो, तैसी कैसे कै बखानौं, अहो सुनिकै प्रसन्न, पायो जै-जै धुनि रीझियै।।५१२।। आये निसि चोर, चोरी करन हरन धन, देखे स्याम घन, हाथ चाप सर लिये हैं। जब-जब आवैं, बान साँधि डरपावैं एतौ अति मँड़रावै, ऐपै बली दूरि किये हैं।। भोर आय पूछैं, अजू! साँवरो किशोर कौन, सुनि करि मौन रहे, आँसू डारि दिये हैं। दई सो लुटाय, जानी चौकी राम राय दई, लई उन्ह दिच्छ,-सिच्छ शुद्ध भये हिये हैं।।५१३।। कियौ विप्र तन त्याग, तिया चली संग लागि, दूरहीं ते देखि कियौ, चरन प्रनाम है। बोले यों सुहागवती, मर्यौ पति होऊँ सती, अबतौ निकसि गई, ज्याऊँ सेवौ राम है।। बोलिकै कुटुम्ब कही, जोपै भक्ति करौ सही, गही तब बात, जीव दियो अभिराम है। भये सब साधु, व्याधि मेटि लै विमुखता की, जाकी वास रहै तौ न, सूझै स्याम धाम है।।५१४।। दिल्लीपति पातसाह, अहदी पठाये लैन, ताकौ सो सुनायौ, सूबे विप्र ज्यायौ जानियै। देखिवे कौं चाहै, नीकै सुख सौं निवाहै आय, कही बहु विनै गही, चले मन आनियै।। पहुँचे नृपति पास, आदर प्रकास कियौ, दियौ उच्च आसन लै, बोल्यौ मृदु वानियै।। दीजै करामात, जग ख्यात सब मात किये, कही झूठ बात, एक राम पहिचानियै।। ५१५।। देखें राम कैसौ कहि कैद किये, किये हिये हूजिये कृपाल, हनुमान जू दयाल हो। ताही समैं फैलि गये, कोटि-कोटि कपि नये, लोचैं तन खोचैं, चीर भयौ यों बिहाल हो।। फोरैं कोट, मारैं चोट, किये डारैं, लोट-पोट, लीजै कौन ओट, जाय मान्योँ प्रलयकाल हो। भई तब आँखैं, दुखसागर कौं चाखैं अब, वेई हमें राखैं, भाखैं वारौं धनमाल हो।। ५१६।। आय पाँय लिये तुम, दिये हम प्रान पावैं, आप समझ़ावैं, करामात नेकु लीजियै। लाज दबि गयो नृप, तब राखि लयौ कह्यौ, भयौ घर राम जू कौ, वेगि छोड़ि दीजियै।।
श्रीगोकुलनाथ गोसाँई जी) (१३३ सुनि तजि दयो और, कर्यौ लैकै कोट नयौ, अबहूँ न रहे कोऊ, वामै तन छीजिये। काशी जाय वृन्दावन, आय मिले नाभा जू सौं, सुन्यौ हो कवित्त निज, रीझि मति भीजिये।।५१७।। मदनगोपाल जू कौ, दरसन करि कही, सही राम इष्ट मेरे, दृष्टिभाव पागी है। वैसे ही सरूप कियौ, दियौ ले दिखाय रूप, मन अनुरूप छबि, देखि नीकी लागी है।। काहू कही कृष्ण, अवतारी जू प्रशंस महा, राम अंश सुनि, बोले मति अनुरागी है। दसरथ सुत जानौं, सुन्दर अनूप मानौं, ईशता बताई रति, कोटिगुनी जागी है।।५१८।। श्रीमानदासजी गोप्य केलि रघुनाथ की, (श्री) मानदास परगट करी।। करुना वीर सिंगार, आदि उज्ज्वल रस गायौ। पर उपकारक धीर, कवित कविजन मन भायौ।। कोशलेश पदकमल, अननि दासत व्रत लीनौ। जानकी जीवन सुजस, रहत निसिदिन रँग भौनौ।। रामायन नाटक रहसि, युक्ति उक्ति भाषा धरी। गोप्य केलि रघुनाथ की, (श्री) मानदास परगट करी।।१३०।। श्रीगिरिधरजी (श्री) वल्लभ जू के वंश में, सुरतरु गिरिधर भ्राजमान।। अर्थ धर्म काम मोक्ष, भक्ति अनपायनि दाता। हस्तामल श्रुति ज्ञान, सबहि शास्त्रन के ज्ञाता।। परिचर्या ब्रजराज, कुँवर कें मन कौं कर्षै। दरसन परम पुनीत, सभा तन अमृत वर्षै।। विट्ठलेश नन्दन सुभाव, जग कोऊ नहिं ता समान। (श्री) वल्लभ जू के वंश में सुरतरु, गिरिधर भ्राजमान।।१३१।। श्रीगोकुलनाथ गोसाँईजी (श्री) वल्लभ जू के वंश में, गुननिधि गोकुलनाथ अति।।
१७४) (श्री भक्तमाल उदधि सदा अक्षोभ, सहज सुन्दर मित भाषी। गुरुवत्तन गिरिराज, भलप्पन सब जग साषी॥ विट्ठलेश की भक्ति, भयौ बेला दृढ़ ताकै। भगवत् तेज प्रताप, नमित नरवर पद जाकैँ॥ निर्विलीक आसय उदार, भजनपुंज गिरिधरन रति। (श्री) वल्लभ जू के वंश में, गुननिधि गोकुलनाथ अति।।१३२।। आयौ कोऊ शिष्य होन, ल्यायो भेंट लाखन की, भाखन की चातुरी पै, मेरी मति रीझियै। कहूँ है सनेह तेरो, जाके मिले बिना देह, व्याकुलता होय, जोपै तोपै दीच्छा दीजियै।। बोल्यौ अजूनै मेरो काहू, वस्तु सौं न हेतु नेकु, नेति-नेति कही, हम गुरु ढूँढ़ि लिजियै। प्रेम ही की बात इहाँ, कर ही पलटि जात, गयौ दुख गात, कहो कैसैं रँग भीजियै।। ५१६ ।। कान्हा हो हलालखोर, घोरि दियौ मन लैकै, स्याम रससागर में, नागर रसाल है। निसि को सुपन माँझ, निपुन श्रीनाथ जू नै, आज्ञा दई, भीत नई, भई ओट साल है।। गोकुल के नाथ जू सौं, वेगि दै जताइ दीजै, कीजै याहि दूर, छबि पूर देखौ ख्याल है। भोर जौ विचारै, नहिं धीरज कौ धारै, उहाँ जाऊँ कोऊ मारै, पैड़ें पर्यो यह लाल है।। ५२०।। ऐसे दिन तीन, आज्ञा देते वे प्रवीन, नाथ हाथ कहा मेरे, बिन गये नही सरैगौ। गये द्वार द्वारपाल, बोले जू विचार एक, दीजै सुधि कान, सुनि खीझै बात करैगौ ।। काहू ने सुनाय दई, लीजिये बुलाय अहो, कहौ और दूर करौ, करे दूरि ढरैगौ। जाय वही कही, लही अपनी पिछानि मिले, सुन्यौ मेरौ नाम श्याम कह्यौ नहीं टरैगौ।। ५२१।। श्रीवनवारीदासजी रसिक रँगीलौ भजनपुंज, सुठि वनवारी स्याम कौ।। बात कवित बड़ चतुर, चोख चौकस अति जानै। सारा सार विवेक, परमहंसनि परवानै ।। सदाचार सन्तोष, भूत सबको हितकारी। आरज गुन तन अमित, भक्ति दशधा व्रतधारी।। दरसन पुनीत, आसय उदार आलाप रुचिर सुख धाम कौ।
श्रीबावनजी) (१३५
रसिक रँगीलौ भजनपुंज, सुठि वनवारी स्याम कौ ।। १३३ ।।
श्रीनारायण मिश्रजी भागौत भलीविधि कथन कौ, धनि जननी एकै जन्यौ ।। नाम नरायन मिश्र, वंश नवला जू उजागर। भक्तन की अति भीर, भक्ति दशधा कौ आगर ।। आगम निगम पुरान, सार शास्त्रनि सब देखे। सुरगुरु शुक सनकादि, व्यास नारद जु बिसेखे ।। सुधा बोध मुख सुरधुनी, जस वितान जग में तन्यौ। भागौत भलीविधि कथन कौ, धनि जननी एकै जन्यौ ।। १३४ ।।
श्रीराधवदासजी कलिकाल कठिन जग जीतियो, राधौ की पूरी परी ।। काम क्रोध मद मोह, लोभ की लहर न लागी। सूरज ज्यों जल संग्रहै, बहुरि ताही ज्यों त्यागी ।। सुन्दर शील सुभाव, सदा सन्तैन सेवा व्रत। गुरु धर्म निकष निर्वह्यौ, विश्व में विदित बड़ौ भृत ।। अल्हराम रावल कृपा, आदि अन्त धुकती धरी। कलिकाल कठिन जग जीतियो, राधौ की पूरी परी ।। १३४ ।।
श्रीबावनजी हरिदास भलप्पन भजनबल, बावन ज्यौं बढ़यौ बावनौ ।। अच्युतकुल सौं दोष, सुपनेहूँ उर नहिं आनै। तिलक दाम अनुराग, सबनि गुरुजन करि मानै ।। सदन माँहि वैराग्य, विदेहिन की सी भाँती। रामचरण मकरन्द, रहति मनसा मदमाती ।।
१३६) (श्री भक्तमाल जोगानन्द उजागर वंश, करि निसिदिन हरिगुन गावनौ। हरिदास भलप्पन भजनबल, बावन ज्यों बढ़यौ बावनौ ॥१३६॥ श्रीपरशुरामजी जंगली देश के लोग सब, श्रीपरशुराम किय पारषद॥ ज्यों चन्दन कौ पवन, नीम्ब पुनि चन्दन करई। बहुत काल तम निबिड़, उदै दीपक ज्यों हरई॥ श्रीभट पुनि हरिव्यास, सन्त मारग अनुसरई। कथा कीरतन नेम, रसन हरिगुन उच्चरई॥ गोविन्द भक्ति गद रोग गति, तिलक दाम सद्वैद हद। जंगली देश के लोग सब, श्रीपरशुराम किय पारषद ॥१३७॥ राजसी महन्त देखि, गयौ कोऊ अन्त लैन, बोल्यौ जू अनन्त, हरि सगे माया टारियै। चले संग वाके, त्यागि पहिरि कुपीन अंग, बैठे गिरि कन्दरा में, लागी ठौर प्यारियै॥ तहाँ बनिजारौ आय, सम्पति चढ़ाय दई, दई और पालकी हूँ, महिमा निहारियै। जाय लपटायौ पाँय, भाव मैं न जान्यौ कछू, आन्यौ उर माँझ, आवै प्रान वारि डारियै॥५२२॥ मास परायण चौबीसवाँ विश्राम नवाह परायण सप्तम विश्राम श्रीगदाधरभट्टजी गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद॥ सज्जन सुहृद् सुशील, वचन आरज प्रतिपालय। निर्मत्सर निहकाम, कृपा करुणा कौ आलय॥ अनन्य भजन दृढ़ करनि, धर्यौ वपु भक्तनि काजै। परम धरम कौ सेतु, विदित वृन्दावन गाजै॥ भागौत सुधा बरषै वदन, काहू कौं नाहिन दुखद। गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद ॥१३८॥
श्रीगदाधरभट्टजी) (१३७ स्याम रंग रंगी पद, सुनिकै गुसाँई जीव, पत्र दै पठाये, उभै साधु वेगि धाये हैं। रैनी बिन रंग कैसे, चढ़यौ, अति सोच बढ़यौ, कागद में प्रेम मढ़यौ, तहाँ लैके आये है।। पुर ढिंग कूप, तहाँ बैठे रसरूप लगे, पूछिवे कौ तिनहीं सौं, नाम लै बताये हैं। रहौ कौन ठौर, सिरमौर वृन्दावन धाम, नाम सुनि मुरछा ह्वै, गिरे प्रान पाये हैं।। ५२३।। काहू कही भट्ट, श्रीगदाधर जू एई जानौ मानौ, उही पाती चाह, फेरिकै जिवाये हैं। दियौ पत्र हाथ, लियो सीस सौं लगाय चाय, बाँचत ही चले वेगि, वन्दावन आये हैं।। मिले श्रीगुसाँई जू सौं, आँखें भरि आई नीर, सुधि न सरीर, धरि धीर वही गाये हैं। पढ़े सब ग्रन्थ, संग नाना कृष्णकथा रंगरस की उमंग, अंग-अंग भाव छाये हैं।। ५२४।। नाम हो कल्यानसिंह, जात राजपूत पूत, बैठ्यो आय कथा, सो अभूत रंग लाग्यौ है। निपट निकट वास, धौरहा प्रकास गाँव, हास परिहास तज्यो, तिया दुख पाग्यो है।। जानी भट्ट संग सौं, अनंग वास दूर भई, करौ लैके नई आनि, हिये काम जाग्यो है। माँगत फिरत हुती, जुवती औ गर्भवती, कही लै रुपैया बीस, नेकु कहो राग्यो है।। ५२५।। गदाधर भट्ट जू की, कथा में प्रकास कहो, अहौ कृपा करी, अब मेरी सुधि लीजिये। दई लौंडी संग, लोभ रंग चित भंग किये, दिये लै बताय, बोली मेरौ काम कीजिये।। बोले आप, बैठिये जू, जाप नित करौं हिये, पाप नहीं मेरौ, गई दरसन दीजिये। श्रोता दुख पाय भाखैं, झूठी याहि मारि नाखैं, साँची कहि राखैं सुनि, तन-मन छीजिये।। ५२६।। फाटि जाय भूमि, तौ समाय जायँ श्रोता कहैं, बहे दृग नीर, ह्वै अधीर सुधि गई है। राधिकावल्लभदास, प्रगट प्रकास भास, भयौ दुखरासी सुनि, सौ बुलाय लई है।। साँच कहि दीजै नहीं, अभी जीव लीजै डारि, सबै कहि दीयौ, सुख लियौ संज्ञा भई है। काढ़ि तरवार तिया, मारिवे कल्यान गयौ, दयौ परबोध, हमें करी दया नई है।। ५२७।। रहैं काहू देस में, महन्त आये कथा माँझ, आगें लै बैठाये, देखें सबै साधु भीजे हैं। मेरे अश्रुपात क्यों न, होत सोच सोत परे, करे लै उपाय, दै लगाय मिर्च खीजे हैं।। सन्त एक जानिकै, जताय दई भट्ट जू कौ, गये उठि सब, जब मिलि अति रीझे हैं। ऐसी चाह होय, मेरे रोय कै पुकारि कही चली, जलधार नैन प्रेम आय धीजे हैं।।। ५२८।। आयौ एक चोर, घर सम्पति बटोरि, गाँठि बाँधी लै मरोरि, किहूँ उठै नाहिं भारी है। आयकै उठाय दई, देखी इन रीति नई, पूछ्यौ नाम प्रीति भई, भूलो मैं विचारी है।। बोले आप लै पधारौ, होत ही सवारौ आवै, और दसगुनी मेरे, तेरी यह ज्यारी है। प्राननि कौं आगें धरौ, आनिकै उपाय करौ, रहे समझाय भयौ, शिष्य चोरी टारी है।। ५२६।।
१३८) (श्री भक्तमाल प्रभु की टहल निज, करनि करत आप, भक्ति कौ प्रताप जानें, भागवत गाई है। देत हुते चौका कोऊ, शिष्य बहु भेंट ल्यायौ, दूर ही ते देखि, दास आयौ सो जनाई है। धोवौ हाथ, बैठौ आप, सुनिकै रिसाय उठे, सेवा ही में चाय, वाकौं खीझि समझाई है। हिये हितरासि जग, आस कौं विनास कियौ, पियौ प्रेमरस, ताकी बात लै दिखाई है।।५३०।। चारण भक्तजी चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुआ।। चौमुख चौरा चण्ड, जगत् ईश्वर गुण जाने। करमानन्द अरु कोल्ह, अल्ह अक्षर परवाने।। माधौ मथुरा मध्य, साधु जीवानन्द सीवाँ। दूदा नारायणदास, नाम मांडन नत ग्रीवाँ।। चौरासी रूपक चतुर, बरनत वानी ज्यों जुवा। चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुआ।। १३६।। श्रीकरमानन्दजी करमानन्द चारण की, वानी की उचारन में, दारुन जो हियौ होय सोऊ पिघलायकै। दियौ गृह त्यागि, हरिसेवा अनुराग भरे, बटुवा सुग्रीव हाथ, छरी पधराइकै।। काहू ठौर जाय, गाड़ि वहीं पधराये वापै, ल्याये उर प्रभु भूलि आये कहाँ पाइयै। फेरि चाह भई, दई स्याम को जताय बात, लई मँगवाय देखि, मति लै भिजाइयै।।५३१।। श्रीकोल्हजी, श्रीअल्हजी कोल्ह अल्ह भाई दोऊ, कथा सुखदाई सुनौ, पहिलौ विरक्त, मद मांस नही खात है। हरि ही के रूप, गुन वानी में उचार करै, धरै भक्तिभाव हिये, ताकी यह बात है।। दूसरौ अनुज जानौ, खाय सब उन मानौ, नृप ही कौं गावै, प्रभु कभूँ गाय जात है। बड़े के अधीन रहै, सोई करै जोई कहै, ईश करि चहै, आप दीनता में मात है।।५३२।। बड़े आय कही, चलौ द्वारका निहारैं सही, मिथ्या जगभोग, यामें आयु ही बिहात है। आज्ञा के अधीन चल्यौ, आये पुर लीन भये, नये चोज मन्दिर में, सुनौ कान बात है।। कोल्ह ने सुनाये सब जे-जे नाना छन्द गाये, पाछे अल्ह दोय चार कहे सकुचात है। भर्यो ही हुंकारौ प्रभु, कही माला गरें डारौ, ल्याये पहिरावैं, कह्यौ मेरौ बड़ौ भ्रात है।।५३३।।
श्रीपृथ्वीराजजी) (१३६ दयौ पै न याहि दयौ, बड़ौ अपमान भयो, गयौ बूड़ौ सागर में, दुख कौ न पार है। बूड़त ही आगे, भूमि पाई चल्यो झूमि प्रीति, सो अनीति भूलै नाहिं मानो तरवार है।। सौंही आये लैन, हरिजन मन चैन झिल्यो, मिल्यौ कृष्ण जाय, जायौ अति सुखसार है। बैठे जब भोजन कौं, दई उभै पातर लै, दूसरी जू कैसी, कही वही भाई प्यार है।। ५३४ ।। सबौ विष भयौ, दुख गयौ सोई हुयौ नयौ, दयौ परबोध, वाकी बात सुनि लीजियै। तेरो छोटो भाई, मेरो भक्त सुखदाई, ताकी कथा लै जताई, जामें आप ही सौं धीजियै।। प्रथम जनम माँझ बड़ौ, राजपुत्र भयौ गयौ, गृह त्यागि सदा मोसों मति भीजियै। आयौ वन कोऊ भूप, संग रागरंग रूप, देखि चाह भई देह, दई भोग दीजियै ।। ५३५ ।। तेरई वियोग, अन्न-जल सब त्यागि दियौ, जियौ नही जात, वापै वेगि सुधि लीजियै। हाथ पै प्रसाद दीनों, आय घर चीन्ह लीनों, सुपनौ सौ गयौ, बीति प्रीति वासौं कीजियै। द्वारका को संग सुनि, आवत ही आगै चल्यौ, मिल्यौ भूमि पर दृग, भरि वहै दिजियै। कही सब बात, स्याम धाम तज्यौ ताही छिन, कर्यौ वनवास दोऊ, अति मति भीजियै।। ५३६ ।। श्रीनारायणदासजी अल्ह ही के वंश में, प्रशंस याहि जानि लेव, बड़ौ और भाई छोटौ, श्रीनरायन दास है। दीर्घ कमाऊ, लघु उपज्यौ उड़ाऊं, भाभी दियो सीरौ भोजन, लै भयौ दुखरासि है।। देवौ मोकौं तातौ करि, बोली वह क्रोध भरि, यहूँ जा हुंकारौ भरवावै कियो हास है। गयौ गृह त्यागि, हरि पाणि कर्यो वैसे ही जू, भक्तिवश स्याम, कह्यौ प्रगट प्रकास है।। ५३७ ।। श्रीपृथ्वीराजजी नरदेव उभै भाषा निपुन, पृथीराज कविराज हुव।। सवैया गीत श्लोक, बेलि दोहा गुन नवरस। पिंगल काव्य प्रमान, विविध विधि गायौ हरि जस।। पर दुख विदुख श्लाघ्य, वचन रचना जु विचारै। अर्थ विचित्र निमोल, सबै सांरग उर धारै।। रुक्मिनी लता बरनन अनूप, बागीश वदन कल्यान सुव। नरदेव उभै भाषा निपुन, पृथीराज कविराज हुव।। १४० ।।
१४०) (श्री भक्तमाल मारवार देश बीकानेर कौ नरेस बड़ौ, पृथीराज नाम भक्तराज कविराज है। सेवा अनुराग, और विषय वैराग ऐसौ, रानी पहिचानी नाहिं, मानौं देखी आज है॥ गयौ हो विदेश तहाँ, मानसी प्रवेस कियौ, हियौ नहीं छुवै, कैसे सरै मन काज है। बीते दिन तीन, प्रभु मन्दिर न दीठि परै, पाछै हरि देखि भयौ, सुख कौ समाज है॥५३८॥ लिखिकै पठायौ देश, सुन्दर सन्देस यह, मन्दिर न देखे, हरि बीते दिन तीन हैं। लिख्यौ आयौ साँच, बाँचि अति ही प्रसन्न भये, लगे राज बैठे प्रभु, बाहर प्रवीन हैं॥ सुनौ एक और, यों प्रतिज्ञा करी हिये धरी मथुरा सरीर त्याग करें रसलीन हैं। पृथीपति आनिकै मुहीम, दई काबुल की, बल अधिकाई, नहीं काल के अधीन हैं॥५३६॥ जीवन अवधि रहै, निपट अलप दिन, कलप समान बीतै, पल न बिहात है। आगम जनाय दियौ, चाहै इन्हें साँचौ कियौ लियौ, भक्तिभाव जाके, छायौ गात-गात है॥ चल्यौ चढ़ि साँड़िनी पै, लई मधुपुरी आनि, करिकै अस्नान प्रान, तजे सुनि बात है। जै-जै धुनि भई व्यापि, गई चहुँओर अहो, भूपति चकोर जस, चन्द दिन-रात है॥५४०॥ श्रीसीवाजी द्वारका देखि पालण्टी, अचढ़ सीवैं कीधी अटल॥ असुर अजीज अनीति, अगिनि में हरिपुर कीधौ। सांगन सुत ने साद, राय रनछोरै दीधौ॥ धरा धाम धन काज, मरन बीजा हूँ माँडै। कमधुज कुटकै हुवौ, चौक चतुरभुजनी छाँडै॥ बाढ़ेल बाढ़ कीवी कटक, चाँद नाम चाँड़े सबल। द्वारका देखि पालण्टी, अचढ़ सीवैं कीधी अटल॥१४१॥ कावापति सींवा सुत, साँगन कौ प्यारौ हरि, द्वारावति ईश यों, पुकारै रक्षा कीजिये। सदा भगवान् आप, भक्त प्रतिपाल करें, करौ प्रतिपाल मेरौ, सुनि मति भीजिये॥ तुरक अजीज नाम, धाम कौ लगाई आगि, लई बाग धोरन की, आये टूक कीजिये। दुष्ट सब मारे, प्रभु कष्ट ते उवारे, निज प्रान वारि डारे, यह नयौ रस पीजिये॥५४१॥ मास परायण पच्चीसवाँ विश्राम
श्रीमती रत्नावतीजी) (१४१
श्रीमती रत्नावतीजी
पृथीराज नृप कुलबधू, भक्तभूप रतनावती।। कथा कीरतन प्रीति, भीर भक्तनि की भावै। महा महाच्छौ मुदित, नित्य नँदलाल लड़ावै।। मुकुन्द चरण चिन्तवन, भक्ति महिमा ध्वजधारी। पति पर लोभ न कियौ, टेक अपनी नहीं टारि।। भलपन सबै विशेष ही, आमेर सदन सुन खाजिती। पृथीराज नृप कुलबधू, भक्तभूप रतनावती।। १४२।। मानसिंह राजा ताकौ, छोटौ भाई माधौसिंह, ताकी जानौ तिया, जाकी बात लै बखानियै। ढिंग जो खवासिनि सौं, स्वांसनि भरत नाम, रटति जटिल प्रेम, रानी उर आनियै।। नवलकिशोर कभूँ, नन्द के किशोर कभूँ, वृन्दावनचन्द कहि, आँखैं भरि पानियै। सुनत विकल भई, सुनिवे की चाह भई, रीति यह नई कछु, प्रीति पहिचानियै।। ५४२।। बार-बार कहै, कहा कहै, उर गहै मेरौ, बहै दृग नीर, हो सरीर सुधि गई है। पूछौ मत बात, सुख करौ दिन-रात, यह सहै निज गात, रागी साधु कृपा भई है।। अति उतकण्ठा देखि, कह्यौ सो विशेष सब, रसिक नरेसनि, की वानी कहि दई है। टहल छुटाई औ, सिरहाने लै बैठाई वाहि, गुरू बुद्धि आई, यह जानौ रीति नई है।। ५४३।। निसिदिन सुन्यौ करै, देखिवे को अरबरै, देखे कैसैं जात, जल जात दृग भरे हैं। कछुक उपाय कीजै, मोहन दिखाय दीजै, तबही तौ जीजै, वेतौ आनि उर अरे हैं।। दरसन दूर, राज छोड़ै लौटैं धूर, पै न पावैं छबि पूर, एक प्रेमवश करे हैं। करौ हरिसेवा, भरि भाव धरि मेवा, पकवान रस खान दै, बखान मन धरे हैं।। ५४४।। इन्द्रनीलमनी रूप, प्रगट सरूप कियौ, लियौ वहै भाव, यों सुभाव मिलि चली है। नानाविधि रागभोग, लाड़कौ प्रयोग जामें, जामिनी सुपन जोग, भई रँगरली है।। करत सिंगार छबि, सागर न पारावार, रहत निहारि वाही, माधुरी सौं पली है। कोटिक उपाय करैं, जोग जज्ञ पार परै, ऐपै नही पावै यह, दूर प्रेम गली है।। ५४५।। देख्योई चहति तऊ, कहति उपाय कहा? अहो चाह बात कहौ, कौन को सुनाइयै। कही जू बनावौ ढिंग, महल कै ठौर एक, चौकी लै बैठावौ, चहुँओर समुझाइयै।।
१४२) (श्री भक्तमाल आवैं हरिप्यारे तिन्हें, ल्यावैं वे लिवाय इहाँ, रहें ते धुवाय पाँय, रुचि उपजाइयै। नानाविधि पाक सामा, आगै आनि धरें आप, डारि चिक देखौ, स्याम दृगनि लखाइयै॥५४६॥ आवैं हरिप्यारे, साधुसेवा करि टारे दिन, किहूँ पाँव धारे जिन्हें, ब्रजभूमि प्यारियै। जुगलकिशोर गावैं, नैननि बहावैं नीर, ह्वै गई अधीर, रूप दृगनि निहारियै॥ पूछी वा खवासिन सौं, जू रानी कौन अंग? जाके इतनी अटक, संग भंग सुख भारियै। चली उठि हाथ गह्यौ, रह्यौ नहीं जात अहो, सह्यो दुख लाज बड़ी, तनक विचारियै॥५४७॥ देख्यौ मैं विचारि, हरिरूप रससार ताकौ, कीजिये अहार, लाज कानि नीकें टारियै। रोकत उतरि आई, जहाँ साधु सुखदाई, आनि लपटाई पाँय, विनती लै धारियै॥ सन्तनि जिंवायवे की, निज कर अभिलाष, लाख-लाख भाँतिन सौं, कैसे कै उच्चारियै। आज्ञा जोई दीजै, सोई कीजै सुख वाही में जु, प्रीति अवगाही कही, करौ लागी प्यारियै॥५४८॥ प्रेम में न नेम, हेम थार लै उमगि चली, चली दृगधार सो, परोसिकै जिंवाये हैं। भीजि गये साधु, नेह सागर अगाध देखि, नैननि निमेख तजी, भये मनभाये हैं॥ चन्दन लगाय, आनि बीरीऊ खवाय, स्याम चरचा चलाय, चख रूप सरसाये हैं। धूम परी गाँव, झूम आये सब देखिवे कौं, देखि नृप पास, लिखि मानस पठाये हैं॥५४६॥ ह्वै करि निशंक रानी, बंकगति लई नई, दई तजि लाज, बैठी मोड़नि की भीर में। लिख्यौ लै दिवान, नर आये सो बखान कियो बाँचि सुनि आँच लागी नृप के सरीर में॥ प्रेमसिंह सुत ताही काल सो रसाल आयौ, भाल पै तिलक माल कण्ठी कण्ठ तीर में। भूप को सलाम कियौ नरनि जताय दियौ बोल्यौ आव मोड़ी के रे पर्यौ मन पीर में॥५५०॥ कोप भरि राजा गयौ भीतर सो सोच नयौ पाछे पूछि लयौ कह्यौ नरनि बखानिकै। तबतौ विचारी अहो मोड़ा ही हमारी जाति भयौ दुख गात भक्तिभाव उर आनिकै॥ लिख्यौ पत्र माजी कौं जु प्रीति हिये साजी जोपै सीस पर बाजी आय राखौ तजि प्रानिकै। सभा मधि भूप कही मोड़ी को विरूप भयौ रहैं अब मोड़ी के ही भूलौ मति जानिकै॥५५१॥ लिख्यौ दे पठाये वेगि मानस लै आये जहाँ रानी भक्ति सानी हाथ दई पाती बाँचिये। आयो चढ़ि रंग बाँचि सुत कौ प्रसंग बार भीजे जे फुलेल दूर किये प्रेम साँचिये॥ आगे सेवा पास निसि महल बसत जाय ल्याय याही ठौर प्रभु नीके गाय नाचिये। नृप अन्न त्यागि दियौ, दियौ लिखि पत्र पुत्र भई मोड़ी आज तुम हित करि जाँचिये॥५५२॥ गये नर पत्र दियौ सीस सौं लगाय लियौ बाँचिकै मगन हियौ रीझि बहु दई है। नौबत बजाई द्वार बाँटत बधाई काहू नृपति सुनाई कही कहा रीति नई है॥
श्रीजगन्नाथ पारीषजी) (१४३ पूछे भूप लोग कह्यौ, मिटे सब सोग भये, मोड़ी के जू जोग, स्वांग कियौ बनि गई है। भूपति सुनत बात, अति दुखगात भयौ, लयौ बैरभाव, चढ़यौ त्यारी इत भई है॥५५३॥ नृप समझाय राख्यो, देश में चवाब ह्वैहै, बुधिवन्तजन आय, सुत सौं जताई है। बोल्यो, विषै लागि कोटि-कोटि तन खोये एक, भक्ति पर आवै काम, यह मन आई है॥ पाँय परि माँगि लई, दई जो प्रसन्न तुम, राजा निसि चल्यो जाय, करौ जिय भाई है। आयौ निज पुर, ढिंग ढुरि नर मिले आनि, कह्यौ सो बखानि सब, चिन्ता उपजाई है॥५५४॥ भवन प्रवेस कियौ, मन्त्री जो बुलाय लियौ, दियौ कहि कटी नाक, लोहू निरवारियै। मारिवौ कलंक हू न आवै यों सुनावै भूप, काहू बुधिवन्त नै, विचारि लै उचारियै॥ नाहर जु पींजरा में, दीजै छाँड़ि लीजै मारि, पाछे ते पकरि वह, बात दाबि डारियै। सबनि सुहाई जाय, करी मनभाई आयौ, देख्यौ वा खवासी कही, सिंह जू निहारियै॥५५५॥ करै हरिसेवा, भरि रंग अनुराग दृग, सुनी यह बात नेकु, नैन उन टारे हैं। भाव ही सौं जाने उठि, अति सनमाने अहो!, आज मेरे भाग, श्रीनृसिंह जू पधारे हैं॥ भावना सचाई वही, सोभा लै दिखाई, फूलमाल पहिराई, रुचि टीकौ लागे प्यारे हैं। भौन ते निकसि धाये, मानौ खम्भ फारि आये, विमुख समूह, ततकाल मारि डारे हैं॥५५६॥ भूप कौं खबरि भई, रानी जू की सुधि लई, सुनी नीकी भाँति, आप नम्र ह्वैकै आये हैं। भूमि पर साष्टांग, करी, हरि मति भई, दया, आप आय वाके, वचन सुनाये हैं॥ करत प्रणाम राजा, बोली अजू लाल जू कौं, नेकु फिरि देखौ, एक ओर ये लगाये हैं। बोल्यौ नृपराज, धन सबही तिहारो धारौ, पति पै न लोभ, कही करौ सुखभाये हैं॥५५७॥ राजा मानसिंह, माधौसिंह उभै भाई चढ़े, नाव पर कहूँ तहाँ बूड़िवे कौं भई है। बोल्यौ बड़ौ भ्राता, अब कीजिये जतन कौन? भौन तिया भक्त, कहि छोटे सुधि दई है॥ नेकु ध्यान कियौ, तब आनिकै किनारौ लियौ, हियौ हुलसायौ जेठ, चाह नई लई है। कर्यौ आय दरसन, बिनै करि गयौ भूप, अति ही अनूप कथा, हिये व्यापि गई है॥५५८॥ श्रीजगन्नाथजी पारीष पारीष प्रसिद्ध कुल काँथड्या, जगन्नाथ सीवाँ धरम॥ (श्री) रामानुज की रीति, प्रीति पन हिरदैं धार्यौ।
१४४) (श्री भक्तमाल संस्कार सम तत्व, हंस ज्यौं बुद्धि विचार्यौ।। सदाचार मुनिवृत्ति, इन्दिरा पधति उजागर। रामदास सुत सन्त, अनन्य दशधा कौ आगर।। पुरूषोत्तम परसाद तें, उभै अंग पहिर्यौ वरम। पारीष प्रसिद्ध कुल काँथड्या, जगन्नाथ सीवाँ धरम ।।१४३।। श्रीमधुरादासजी कीरतन करत कर सुपनेहूँ, मथुरादास न माँड़ियौ।। सदाचार सन्तोष, सुहृद् सुठि शील सुभासै। हस्तक दीपक उदय, मेटि तम वस्तु प्रकासै।। हरि कौ हिय विस्वास, नन्द-नन्दन बल भारी। कृष्ण कलस सौं नेम, जगत जानै सिर धारी।। (श्री) वर्द्धमान गुरु वचन रति, सो संग्रह नहिं छाँड़ियौ। कीरतन करत कर सुपनेहूँ, मथुरादास न माँड़ियौ ।।१४४।। वास कै तिजारे माँझ, भक्ति रसरासि करी, करी एक बात, ताकौ प्रगट सुनाइये। आयौ भेषधारी कोऊ, करै सालग्राम सेवा, डोलत सिंहासन पै, आनि भीर छाइयै।। स्वामी के जु शिष्य भयौ, तिनहूँ कै भाव देखि, वाही कौ प्रभाव आय, कह्यौ हिय भाइयै। नेकु आप चलौ, उह रीति कौ विलोकियै जु, बड़े सरवज्ञ कही, दूखै नहीं जाइयै।।५५६।। पाँय परि गये लैकै, जाय ढिंग ठाढ़े भये, चाहत फिरायौ, पे न फिरैं सोच पर्यौ है। जानि गयौ आप, कछु याही कौ प्रताप ऐपे, मारौं करि जाप, यों विचार मन धर्यौ है।। मूठ लै चलाई, भक्ति तेज आगे आई, नाहिं वाही लपटाई, भयौ ऐसौ मानौ मर्यौ है। ह्वै करि दयाल, जा जिवायौ समझायौ प्रीति, पन्थ दरसायौ हिय भायौ, शिष्य कर्यौ है ।।५६०।। श्रीनारायणदासजी नृतक नृतक नारायणदास कौ, प्रेमपुंज आगे बढ़्यौ।। पद लीनौ परसिद्ध, प्रीति जामें दृढ़ नातो। अक्षर तनमय भयौ, मदनमोहन रँगरातौ।।
संसार से निवृत्त भक्तजन जी) (१४५ नाचत सब कोउ आहि, काहि पै यह बनि आवै। चित्र लिखित सौ रह्यौ, त्रिभंग देसी जु दिखावै॥ हँड़िया सराय देखत दुनी, हरिपुर पदवीं कौं चढ़यौ। नृतक नारायणदास कौ, प्रेमपुंज आगे बढ़यौ॥१४५॥ हरि ही कें आगे नृत्य करें, हिये धरैं यही, ढरै देश देशनि में, जहाँ भक्त भीर है। हँड़िया सराय मध्य, जाइकै निवास लियौ, लियौ सुनि नाम सो, मलेच्छ जाति मीर है॥ बोलिकै पठाये महाजन, हरिजन सबै, आयौ है सदन गुनी, ल्यावौ चाह पीर है। आनिकै सुनाई भई, बड़ी कठिनाई अब, कीजै जोई भाई वह, निपट अधीर है॥५६१॥ बिना प्रभु आगें नृत्य, करियै न नेम यहै, सेवा वाके आगें कहौ, कैसें बिसतारियै। कियो यों विचार, ऊँचे सिंहासन माला धारि, तुलसी निहारि, हरिगान कर्यो भारियै॥ एक ओर बैठ्यौ मीर, निरखैं न कोर दृग, मगन किशोर रूप, सुनिलै बिसारियै। चाहै कछु वारौं, परे औचक ही प्रान हाथ, रीझि सनमान कीनौ, मीच लागी प्यारियै॥५६२॥ मास परायण छब्बीसवाँ विश्राम भूरिदा भक्तजनजी गुनगन विशद् गोपाल के, एते जन भये भूरिदा।। वोहिथ रामगुपाल कुँवँरवर, गोविन्द मांडिल। छीति स्वामि जसवन्त, गदाधर अनन्तानन्द भल।। हरिनाभ मिश्र दीनदास, बछपाल कन्हर जस गायन। गोसू रामदास नारद, स्याम पुनि हरिनारायन।। कृष्णजीवन भगवान जन, स्यामदासविहारी अमृतदा। गुनगन विशद् गोपाल के, एते जन भये भूरिदा।। १४६।। संसार से निवृत्त भक्तजनजी निरवर्त्त भये संसार ते, ते मेरे जजमान सब।। उद्धव रामरेनु परसराम, गंगा धूषेत निवासी। अच्युतकुल ब्रह्मदास विश्राम, सेषसाई के वासी।।
१४६) (श्री भक्तमाल किंकर कुण्डा कृष्णदास, खेम सोठा गोपानन्द। जैदेव राघौ विदुर, दयाल दामोदर मोहन परमानन्द ।। उद्धव रघुनाथी चतुरोनगन, कुँज ओक जे बसत अब। निरवर्त्त भये संसार ते, ते मेरे जजमान सब ।।१४७ ।। श्री जयतारन विदुरजी झीथड़ै ढिंग ही में जैतारन विदुर भयौ, भयौ हरि भक्त साधुसेवा मति पागी है। बरषा न भई, सब खेती सूखि गई, चिन्ता नई प्रभु आज्ञा दई, बड़ौ बड़भागी है।। खेत कौ कटावौ, औ गहावो, लै उड़ावौ, पावौ, दो हजार मन, अन्न, सुनी प्रीति जागी है। करी वही रीति, लोग देखैं न प्रतीति होत, गाये हरि मीत, रासि लागी अनुरागी है।।५६३ ।। स्वामी श्रीचतुरोनगनजी श्री स्वामी चतुरोनगन मगन, रैन दिन, भजन हित ।। सदा युक्त अनुरक्त, भक्त मण्डल को पोषत। पुर मथुरा ब्रजभूमि, रमत सबहिं को तोषत ।। परम धरम दृढ़ करन, देव श्रीगुरू आराध्यौ। मधुर वैन सुठि ठौर-ठौर, हरिजन सुख साध्यौ ।। सन्त महन्त अनन्त जन, जस विस्तारन जासु नित । श्रीस्वामी चतुरोनगन, मगन रैन दिन, भजन हित ।। १४८ ।। आयौ गुरु गेह यों सनेह सौं ले सेवा करैं, धरैं साँचौ भाव हियें, अति मति भीजियै। टहल लगाय दई, नई रुपवती तिया, दियौ वासौं कहि, स्वामी कहैं सोई कीजियै।। सेवा कै रिझाये याते, प्रेम उर नित नयो, दयौ घर धन, बधू कृपा करि लीजियै। धाम पधराय सुख, पायकै प्रनाम करी, धरी ब्रजभूमि उर, बसे रस पिजियै ।।५६४।। श्रीगोविन्दचन्द जू कौ, भोर ही दरस करि केशव सिंगार, राजभोग नन्दग्राम में। गोवर्धन राधाकुण्ड, ह्वैकै आवैं वृन्दावन, मन में हुलास नित, करैं चारि जाम में ।। रहे पुनि पावन पै, भूखे दिन तीन बीते, आये दूध ले प्रवीन, एऊ रँगे स्याम में। माँग्यौ नेकु पानी, ल्यावौ फेरि वह प्रानी कहाँ? दुख मतिसानी निसि कही, कियौ काम में ।।५६५।।