श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमती रत्नावतीजी) (१४१
श्रीमती रत्नावतीजी
पृथीराज नृप कुलबधू, भक्तभूप रतनावती।। कथा कीरतन प्रीति, भीर भक्तनि की भावै। महा महाच्छौ मुदित, नित्य नँदलाल लड़ावै।। मुकुन्द चरण चिन्तवन, भक्ति महिमा ध्वजधारी। पति पर लोभ न कियौ, टेक अपनी नहीं टारि।। भलपन सबै विशेष ही, आमेर सदन सुन खाजिती। पृथीराज नृप कुलबधू, भक्तभूप रतनावती।। १४२।। मानसिंह राजा ताकौ, छोटौ भाई माधौसिंह, ताकी जानौ तिया, जाकी बात लै बखानियै। ढिंग जो खवासिनि सौं, स्वांसनि भरत नाम, रटति जटिल प्रेम, रानी उर आनियै।। नवलकिशोर कभूँ, नन्द के किशोर कभूँ, वृन्दावनचन्द कहि, आँखैं भरि पानियै। सुनत विकल भई, सुनिवे की चाह भई, रीति यह नई कछु, प्रीति पहिचानियै।। ५४२।। बार-बार कहै, कहा कहै, उर गहै मेरौ, बहै दृग नीर, हो सरीर सुधि गई है। पूछौ मत बात, सुख करौ दिन-रात, यह सहै निज गात, रागी साधु कृपा भई है।। अति उतकण्ठा देखि, कह्यौ सो विशेष सब, रसिक नरेसनि, की वानी कहि दई है। टहल छुटाई औ, सिरहाने लै बैठाई वाहि, गुरू बुद्धि आई, यह जानौ रीति नई है।। ५४३।। निसिदिन सुन्यौ करै, देखिवे को अरबरै, देखे कैसैं जात, जल जात दृग भरे हैं। कछुक उपाय कीजै, मोहन दिखाय दीजै, तबही तौ जीजै, वेतौ आनि उर अरे हैं।। दरसन दूर, राज छोड़ै लौटैं धूर, पै न पावैं छबि पूर, एक प्रेमवश करे हैं। करौ हरिसेवा, भरि भाव धरि मेवा, पकवान रस खान दै, बखान मन धरे हैं।। ५४४।। इन्द्रनीलमनी रूप, प्रगट सरूप कियौ, लियौ वहै भाव, यों सुभाव मिलि चली है। नानाविधि रागभोग, लाड़कौ प्रयोग जामें, जामिनी सुपन जोग, भई रँगरली है।। करत सिंगार छबि, सागर न पारावार, रहत निहारि वाही, माधुरी सौं पली है। कोटिक उपाय करैं, जोग जज्ञ पार परै, ऐपै नही पावै यह, दूर प्रेम गली है।। ५४५।। देख्योई चहति तऊ, कहति उपाय कहा? अहो चाह बात कहौ, कौन को सुनाइयै। कही जू बनावौ ढिंग, महल कै ठौर एक, चौकी लै बैठावौ, चहुँओर समुझाइयै।।