भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

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१४२) (श्री भक्तमाल आवैं हरिप्यारे तिन्हें, ल्यावैं वे लिवाय इहाँ, रहें ते धुवाय पाँय, रुचि उपजाइयै। नानाविधि पाक सामा, आगै आनि धरें आप, डारि चिक देखौ, स्याम दृगनि लखाइयै॥५४६॥ आवैं हरिप्यारे, साधुसेवा करि टारे दिन, किहूँ पाँव धारे जिन्हें, ब्रजभूमि प्यारियै। जुगलकिशोर गावैं, नैननि बहावैं नीर, ह्वै गई अधीर, रूप दृगनि निहारियै॥ पूछी वा खवासिन सौं, जू रानी कौन अंग? जाके इतनी अटक, संग भंग सुख भारियै। चली उठि हाथ गह्यौ, रह्यौ नहीं जात अहो, सह्यो दुख लाज बड़ी, तनक विचारियै॥५४७॥ देख्यौ मैं विचारि, हरिरूप रससार ताकौ, कीजिये अहार, लाज कानि नीकें टारियै। रोकत उतरि आई, जहाँ साधु सुखदाई, आनि लपटाई पाँय, विनती लै धारियै॥ सन्तनि जिंवायवे की, निज कर अभिलाष, लाख-लाख भाँतिन सौं, कैसे कै उच्चारियै। आज्ञा जोई दीजै, सोई कीजै सुख वाही में जु, प्रीति अवगाही कही, करौ लागी प्यारियै॥५४८॥ प्रेम में न नेम, हेम थार लै उमगि चली, चली दृगधार सो, परोसिकै जिंवाये हैं। भीजि गये साधु, नेह सागर अगाध देखि, नैननि निमेख तजी, भये मनभाये हैं॥ चन्दन लगाय, आनि बीरीऊ खवाय, स्याम चरचा चलाय, चख रूप सरसाये हैं। धूम परी गाँव, झूम आये सब देखिवे कौं, देखि नृप पास, लिखि मानस पठाये हैं॥५४६॥ ह्वै करि निशंक रानी, बंकगति लई नई, दई तजि लाज, बैठी मोड़नि की भीर में। लिख्यौ लै दिवान, नर आये सो बखान कियो बाँचि सुनि आँच लागी नृप के सरीर में॥ प्रेमसिंह सुत ताही काल सो रसाल आयौ, भाल पै तिलक माल कण्ठी कण्ठ तीर में। भूप को सलाम कियौ नरनि जताय दियौ बोल्यौ आव मोड़ी के रे पर्यौ मन पीर में॥५५०॥ कोप भरि राजा गयौ भीतर सो सोच नयौ पाछे पूछि लयौ कह्यौ नरनि बखानिकै। तबतौ विचारी अहो मोड़ा ही हमारी जाति भयौ दुख गात भक्तिभाव उर आनिकै॥ लिख्यौ पत्र माजी कौं जु प्रीति हिये साजी जोपै सीस पर बाजी आय राखौ तजि प्रानिकै। सभा मधि भूप कही मोड़ी को विरूप भयौ रहैं अब मोड़ी के ही भूलौ मति जानिकै॥५५१॥ लिख्यौ दे पठाये वेगि मानस लै आये जहाँ रानी भक्ति सानी हाथ दई पाती बाँचिये। आयो चढ़ि रंग बाँचि सुत कौ प्रसंग बार भीजे जे फुलेल दूर किये प्रेम साँचिये॥ आगे सेवा पास निसि महल बसत जाय ल्याय याही ठौर प्रभु नीके गाय नाचिये। नृप अन्न त्यागि दियौ, दियौ लिखि पत्र पुत्र भई मोड़ी आज तुम हित करि जाँचिये॥५५२॥ गये नर पत्र दियौ सीस सौं लगाय लियौ बाँचिकै मगन हियौ रीझि बहु दई है। नौबत बजाई द्वार बाँटत बधाई काहू नृपति सुनाई कही कहा रीति नई है॥