भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीजगन्नाथ पारीषजी) (१४३ पूछे भूप लोग कह्यौ, मिटे सब सोग भये, मोड़ी के जू जोग, स्वांग कियौ बनि गई है। भूपति सुनत बात, अति दुखगात भयौ, लयौ बैरभाव, चढ़यौ त्यारी इत भई है॥५५३॥ नृप समझाय राख्यो, देश में चवाब ह्वैहै, बुधिवन्तजन आय, सुत सौं जताई है। बोल्यो, विषै लागि कोटि-कोटि तन खोये एक, भक्ति पर आवै काम, यह मन आई है॥ पाँय परि माँगि लई, दई जो प्रसन्न तुम, राजा निसि चल्यो जाय, करौ जिय भाई है। आयौ निज पुर, ढिंग ढुरि नर मिले आनि, कह्यौ सो बखानि सब, चिन्ता उपजाई है॥५५४॥ भवन प्रवेस कियौ, मन्त्री जो बुलाय लियौ, दियौ कहि कटी नाक, लोहू निरवारियै। मारिवौ कलंक हू न आवै यों सुनावै भूप, काहू बुधिवन्त नै, विचारि लै उचारियै॥ नाहर जु पींजरा में, दीजै छाँड़ि लीजै मारि, पाछे ते पकरि वह, बात दाबि डारियै। सबनि सुहाई जाय, करी मनभाई आयौ, देख्यौ वा खवासी कही, सिंह जू निहारियै॥५५५॥ करै हरिसेवा, भरि रंग अनुराग दृग, सुनी यह बात नेकु, नैन उन टारे हैं। भाव ही सौं जाने उठि, अति सनमाने अहो!, आज मेरे भाग, श्रीनृसिंह जू पधारे हैं॥ भावना सचाई वही, सोभा लै दिखाई, फूलमाल पहिराई, रुचि टीकौ लागे प्यारे हैं। भौन ते निकसि धाये, मानौ खम्भ फारि आये, विमुख समूह, ततकाल मारि डारे हैं॥५५६॥ भूप कौं खबरि भई, रानी जू की सुधि लई, सुनी नीकी भाँति, आप नम्र ह्वैकै आये हैं। भूमि पर साष्टांग, करी, हरि मति भई, दया, आप आय वाके, वचन सुनाये हैं॥ करत प्रणाम राजा, बोली अजू लाल जू कौं, नेकु फिरि देखौ, एक ओर ये लगाये हैं। बोल्यौ नृपराज, धन सबही तिहारो धारौ, पति पै न लोभ, कही करौ सुखभाये हैं॥५५७॥ राजा मानसिंह, माधौसिंह उभै भाई चढ़े, नाव पर कहूँ तहाँ बूड़िवे कौं भई है। बोल्यौ बड़ौ भ्राता, अब कीजिये जतन कौन? भौन तिया भक्त, कहि छोटे सुधि दई है॥ नेकु ध्यान कियौ, तब आनिकै किनारौ लियौ, हियौ हुलसायौ जेठ, चाह नई लई है। कर्यौ आय दरसन, बिनै करि गयौ भूप, अति ही अनूप कथा, हिये व्यापि गई है॥५५८॥ श्रीजगन्नाथजी पारीष पारीष प्रसिद्ध कुल काँथड्या, जगन्नाथ सीवाँ धरम॥ (श्री) रामानुज की रीति, प्रीति पन हिरदैं धार्यौ।