भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 159

१४४) (श्री भक्तमाल संस्कार सम तत्व, हंस ज्यौं बुद्धि विचार्यौ।। सदाचार मुनिवृत्ति, इन्दिरा पधति उजागर। रामदास सुत सन्त, अनन्य दशधा कौ आगर।। पुरूषोत्तम परसाद तें, उभै अंग पहिर्यौ वरम। पारीष प्रसिद्ध कुल काँथड्या, जगन्नाथ सीवाँ धरम ।।१४३।। श्रीमधुरादासजी कीरतन करत कर सुपनेहूँ, मथुरादास न माँड़ियौ।। सदाचार सन्तोष, सुहृद् सुठि शील सुभासै। हस्तक दीपक उदय, मेटि तम वस्तु प्रकासै।। हरि कौ हिय विस्वास, नन्द-नन्दन बल भारी। कृष्ण कलस सौं नेम, जगत जानै सिर धारी।। (श्री) वर्द्धमान गुरु वचन रति, सो संग्रह नहिं छाँड़ियौ। कीरतन करत कर सुपनेहूँ, मथुरादास न माँड़ियौ ।।१४४।। वास कै तिजारे माँझ, भक्ति रसरासि करी, करी एक बात, ताकौ प्रगट सुनाइये। आयौ भेषधारी कोऊ, करै सालग्राम सेवा, डोलत सिंहासन पै, आनि भीर छाइयै।। स्वामी के जु शिष्य भयौ, तिनहूँ कै भाव देखि, वाही कौ प्रभाव आय, कह्यौ हिय भाइयै। नेकु आप चलौ, उह रीति कौ विलोकियै जु, बड़े सरवज्ञ कही, दूखै नहीं जाइयै।।५५६।। पाँय परि गये लैकै, जाय ढिंग ठाढ़े भये, चाहत फिरायौ, पे न फिरैं सोच पर्यौ है। जानि गयौ आप, कछु याही कौ प्रताप ऐपे, मारौं करि जाप, यों विचार मन धर्यौ है।। मूठ लै चलाई, भक्ति तेज आगे आई, नाहिं वाही लपटाई, भयौ ऐसौ मानौ मर्यौ है। ह्वै करि दयाल, जा जिवायौ समझायौ प्रीति, पन्थ दरसायौ हिय भायौ, शिष्य कर्यौ है ।।५६०।। श्रीनारायणदासजी नृतक नृतक नारायणदास कौ, प्रेमपुंज आगे बढ़्यौ।। पद लीनौ परसिद्ध, प्रीति जामें दृढ़ नातो। अक्षर तनमय भयौ, मदनमोहन रँगरातौ।।