श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४०) (श्री भक्तमाल मारवार देश बीकानेर कौ नरेस बड़ौ, पृथीराज नाम भक्तराज कविराज है। सेवा अनुराग, और विषय वैराग ऐसौ, रानी पहिचानी नाहिं, मानौं देखी आज है॥ गयौ हो विदेश तहाँ, मानसी प्रवेस कियौ, हियौ नहीं छुवै, कैसे सरै मन काज है। बीते दिन तीन, प्रभु मन्दिर न दीठि परै, पाछै हरि देखि भयौ, सुख कौ समाज है॥५३८॥ लिखिकै पठायौ देश, सुन्दर सन्देस यह, मन्दिर न देखे, हरि बीते दिन तीन हैं। लिख्यौ आयौ साँच, बाँचि अति ही प्रसन्न भये, लगे राज बैठे प्रभु, बाहर प्रवीन हैं॥ सुनौ एक और, यों प्रतिज्ञा करी हिये धरी मथुरा सरीर त्याग करें रसलीन हैं। पृथीपति आनिकै मुहीम, दई काबुल की, बल अधिकाई, नहीं काल के अधीन हैं॥५३६॥ जीवन अवधि रहै, निपट अलप दिन, कलप समान बीतै, पल न बिहात है। आगम जनाय दियौ, चाहै इन्हें साँचौ कियौ लियौ, भक्तिभाव जाके, छायौ गात-गात है॥ चल्यौ चढ़ि साँड़िनी पै, लई मधुपुरी आनि, करिकै अस्नान प्रान, तजे सुनि बात है। जै-जै धुनि भई व्यापि, गई चहुँओर अहो, भूपति चकोर जस, चन्द दिन-रात है॥५४०॥ श्रीसीवाजी द्वारका देखि पालण्टी, अचढ़ सीवैं कीधी अटल॥ असुर अजीज अनीति, अगिनि में हरिपुर कीधौ। सांगन सुत ने साद, राय रनछोरै दीधौ॥ धरा धाम धन काज, मरन बीजा हूँ माँडै। कमधुज कुटकै हुवौ, चौक चतुरभुजनी छाँडै॥ बाढ़ेल बाढ़ कीवी कटक, चाँद नाम चाँड़े सबल। द्वारका देखि पालण्टी, अचढ़ सीवैं कीधी अटल॥१४१॥ कावापति सींवा सुत, साँगन कौ प्यारौ हरि, द्वारावति ईश यों, पुकारै रक्षा कीजिये। सदा भगवान् आप, भक्त प्रतिपाल करें, करौ प्रतिपाल मेरौ, सुनि मति भीजिये॥ तुरक अजीज नाम, धाम कौ लगाई आगि, लई बाग धोरन की, आये टूक कीजिये। दुष्ट सब मारे, प्रभु कष्ट ते उवारे, निज प्रान वारि डारे, यह नयौ रस पीजिये॥५४१॥ मास परायण पच्चीसवाँ विश्राम