भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

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श्रीगोकुलनाथ गोसाँई जी) (१३३ सुनि तजि दयो और, कर्यौ लैकै कोट नयौ, अबहूँ न रहे कोऊ, वामै तन छीजिये। काशी जाय वृन्दावन, आय मिले नाभा जू सौं, सुन्यौ हो कवित्त निज, रीझि मति भीजिये।।५१७।। मदनगोपाल जू कौ, दरसन करि कही, सही राम इष्ट मेरे, दृष्टिभाव पागी है। वैसे ही सरूप कियौ, दियौ ले दिखाय रूप, मन अनुरूप छबि, देखि नीकी लागी है।। काहू कही कृष्ण, अवतारी जू प्रशंस महा, राम अंश सुनि, बोले मति अनुरागी है। दसरथ सुत जानौं, सुन्दर अनूप मानौं, ईशता बताई रति, कोटिगुनी जागी है।।५१८।। श्रीमानदासजी गोप्य केलि रघुनाथ की, (श्री) मानदास परगट करी।। करुना वीर सिंगार, आदि उज्ज्वल रस गायौ। पर उपकारक धीर, कवित कविजन मन भायौ।। कोशलेश पदकमल, अननि दासत व्रत लीनौ। जानकी जीवन सुजस, रहत निसिदिन रँग भौनौ।। रामायन नाटक रहसि, युक्ति उक्ति भाषा धरी। गोप्य केलि रघुनाथ की, (श्री) मानदास परगट करी।।१३०।। श्रीगिरिधरजी (श्री) वल्लभ जू के वंश में, सुरतरु गिरिधर भ्राजमान।। अर्थ धर्म काम मोक्ष, भक्ति अनपायनि दाता। हस्तामल श्रुति ज्ञान, सबहि शास्त्रन के ज्ञाता।। परिचर्या ब्रजराज, कुँवर कें मन कौं कर्षै। दरसन परम पुनीत, सभा तन अमृत वर्षै।। विट्ठलेश नन्दन सुभाव, जग कोऊ नहिं ता समान। (श्री) वल्लभ जू के वंश में सुरतरु, गिरिधर भ्राजमान।।१३१।। श्रीगोकुलनाथ गोसाँईजी (श्री) वल्लभ जू के वंश में, गुननिधि गोकुलनाथ अति।।