श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 195 में से
संदर्भ में पढ़ें१७२) (श्री भक्तमाल आये रघुनाथ साथ, लछिमन चढ़े घोरे, पट, रंग बोरे हरे कैसे मन राखियै। पाछे हनुमान आये, बोले देखे प्रान प्यारे, नेकु न निहारे मैं तौ, भलैं फेरि भाखियै।।५१०।। हत्या करि विप्र एक, तीरथ करत आयौ, कहै मुख राम, भिच्छा डारियै हत्यारे कौ। सुनि अभिराम नाम, धाम में बुलाय लियौ, दियौ लै प्रसाद, कियौ शुद्ध गायौ प्यारे कौ।। भई द्विजसभा, कहि बोलिकै पठाये आप, कैसे गयौ पाप, संग लैके जेंये न्यारे कौ। पोथी तुम बाँचौ, हिये भाव नहीं साँचौ, अजू ताते मति काँचौ, दूर करै न अंध्यारे कौ।।५११।। देखी पोथी बाँच, नाम-महिमा हूँ कही साँच, ऐपै हत्या करै, कैसें तरै कहि दीजियै। आवै जो प्रतीति, कहौ कही याके हाथ जेंवैं, शिव जू कौ बैल, तब पंगति में लीजियै।। थार में प्रसाद दियौ, चले जहाँ पन कियौ, बोले आप नाम कै, प्रसाद मति भीजियै। जैसी तुम जानो, तैसी कैसे कै बखानौं, अहो सुनिकै प्रसन्न, पायो जै-जै धुनि रीझियै।।५१२।। आये निसि चोर, चोरी करन हरन धन, देखे स्याम घन, हाथ चाप सर लिये हैं। जब-जब आवैं, बान साँधि डरपावैं एतौ अति मँड़रावै, ऐपै बली दूरि किये हैं।। भोर आय पूछैं, अजू! साँवरो किशोर कौन, सुनि करि मौन रहे, आँसू डारि दिये हैं। दई सो लुटाय, जानी चौकी राम राय दई, लई उन्ह दिच्छ,-सिच्छ शुद्ध भये हिये हैं।।५१३।। कियौ विप्र तन त्याग, तिया चली संग लागि, दूरहीं ते देखि कियौ, चरन प्रनाम है। बोले यों सुहागवती, मर्यौ पति होऊँ सती, अबतौ निकसि गई, ज्याऊँ सेवौ राम है।। बोलिकै कुटुम्ब कही, जोपै भक्ति करौ सही, गही तब बात, जीव दियो अभिराम है। भये सब साधु, व्याधि मेटि लै विमुखता की, जाकी वास रहै तौ न, सूझै स्याम धाम है।।५१४।। दिल्लीपति पातसाह, अहदी पठाये लैन, ताकौ सो सुनायौ, सूबे विप्र ज्यायौ जानियै। देखिवे कौं चाहै, नीकै सुख सौं निवाहै आय, कही बहु विनै गही, चले मन आनियै।। पहुँचे नृपति पास, आदर प्रकास कियौ, दियौ उच्च आसन लै, बोल्यौ मृदु वानियै।। दीजै करामात, जग ख्यात सब मात किये, कही झूठ बात, एक राम पहिचानियै।। ५१५।। देखें राम कैसौ कहि कैद किये, किये हिये हूजिये कृपाल, हनुमान जू दयाल हो। ताही समैं फैलि गये, कोटि-कोटि कपि नये, लोचैं तन खोचैं, चीर भयौ यों बिहाल हो।। फोरैं कोट, मारैं चोट, किये डारैं, लोट-पोट, लीजै कौन ओट, जाय मान्योँ प्रलयकाल हो। भई तब आँखैं, दुखसागर कौं चाखैं अब, वेई हमें राखैं, भाखैं वारौं धनमाल हो।। ५१६।। आय पाँय लिये तुम, दिये हम प्रान पावैं, आप समझ़ावैं, करामात नेकु लीजियै। लाज दबि गयो नृप, तब राखि लयौ कह्यौ, भयौ घर राम जू कौ, वेगि छोड़ि दीजियै।।