श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६) (श्री भक्तमाल किंकर कुण्डा कृष्णदास, खेम सोठा गोपानन्द। जैदेव राघौ विदुर, दयाल दामोदर मोहन परमानन्द ।। उद्धव रघुनाथी चतुरोनगन, कुँज ओक जे बसत अब। निरवर्त्त भये संसार ते, ते मेरे जजमान सब ।।१४७ ।। श्री जयतारन विदुरजी झीथड़ै ढिंग ही में जैतारन विदुर भयौ, भयौ हरि भक्त साधुसेवा मति पागी है। बरषा न भई, सब खेती सूखि गई, चिन्ता नई प्रभु आज्ञा दई, बड़ौ बड़भागी है।। खेत कौ कटावौ, औ गहावो, लै उड़ावौ, पावौ, दो हजार मन, अन्न, सुनी प्रीति जागी है। करी वही रीति, लोग देखैं न प्रतीति होत, गाये हरि मीत, रासि लागी अनुरागी है।।५६३ ।। स्वामी श्रीचतुरोनगनजी श्री स्वामी चतुरोनगन मगन, रैन दिन, भजन हित ।। सदा युक्त अनुरक्त, भक्त मण्डल को पोषत। पुर मथुरा ब्रजभूमि, रमत सबहिं को तोषत ।। परम धरम दृढ़ करन, देव श्रीगुरू आराध्यौ। मधुर वैन सुठि ठौर-ठौर, हरिजन सुख साध्यौ ।। सन्त महन्त अनन्त जन, जस विस्तारन जासु नित । श्रीस्वामी चतुरोनगन, मगन रैन दिन, भजन हित ।। १४८ ।। आयौ गुरु गेह यों सनेह सौं ले सेवा करैं, धरैं साँचौ भाव हियें, अति मति भीजियै। टहल लगाय दई, नई रुपवती तिया, दियौ वासौं कहि, स्वामी कहैं सोई कीजियै।। सेवा कै रिझाये याते, प्रेम उर नित नयो, दयौ घर धन, बधू कृपा करि लीजियै। धाम पधराय सुख, पायकै प्रनाम करी, धरी ब्रजभूमि उर, बसे रस पिजियै ।।५६४।। श्रीगोविन्दचन्द जू कौ, भोर ही दरस करि केशव सिंगार, राजभोग नन्दग्राम में। गोवर्धन राधाकुण्ड, ह्वैकै आवैं वृन्दावन, मन में हुलास नित, करैं चारि जाम में ।। रहे पुनि पावन पै, भूखे दिन तीन बीते, आये दूध ले प्रवीन, एऊ रँगे स्याम में। माँग्यौ नेकु पानी, ल्यावौ फेरि वह प्रानी कहाँ? दुख मतिसानी निसि कही, कियौ काम में ।।५६५।।