श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकूब़ाजी केवलदास) (१४७ पानी सौं न काज, ब्रजभूमि में विराज दूध, पीवै घर-घर यह, आज्ञा प्रभु दई है। एतौ ब्रजवासी, सब क्षीर के उपासी, कैसें मोको लेन दैहैं कही दैहैं, सुनी नई है।। डोलैं धाम-धाम, स्याम कह्यौ जोई मानि लियौ, दियौ परचे हूँ, परतीति तब भई है। जहाँ जा छिपावैं पात्र, वेगि आप ढूँढ़ि ल्यावैं, अति सुख पावैं, कीनी लीला रसमई है।।५६६।। भक्तसेवी मधुकरिया भक्तजी मधुकरी माँगि सेवैं, भगत, तिन पर हौं, बलिहार कियौ।। गोमा परमानन्द प्रधान, द्वारका मथुरा खोरा। कालुख सांगानेर भलौ, भगवान् को जोरा।। बीठल टोंड़े खेम, पण्डा गूनौरै गाजै। स्यामसेन के वंश, चीधर पीपोर विराजै।। जैतारन गोपाल के, केवल कूबै मोल लियौ। मधुकरी माँगि सेवैं भगत, तिन पर हौं बलिहार कियौ।।५४६।। श्रीकूबा (केवलदासजी) कहत कुम्हार जग, कुल निसतार कियौ, केवल सुनाम, साधुसेवा अभिराम है। आये बहु सन्त, प्रीति करी लै अनन्त जाकौ, अन्त कौन पावै, ऐपै सीधौ नहीं धाम है।। बड़ी ए गरज चले, करज निकासिवे कौं, बनिया न देत, कुँवा खोदौ कीजै काम है। कही बोल कियौ, तोल लियौ नीके रोल करि, हित सौं जिमाये, जिन्हें प्यारो एक स्याम है।।५६७।। गये कुँवा खोदिवे कौं, सुवा ज्यौं उचारै नाम, हुआ काम जान्यौ, वानै भयौ सुख भारी है। आई रेत भूमि, झूमि माटी गिरि दबे वामें, केतिक हजार मन, होत कैसे न्यारी है।। शोक करि आये धाम राम-नाम धुनि काहूँ, कान परी बीत्यो, मास, कही बात प्यारी है। चले वाही ठौर, स्वर सुनि प्रीति भौर परे, रीति कछु और, यह, सुनि बुधि टारी है।।५६८।। माटी दूर करी सब, पहुँचे निकट जब, बोलिकै सुनायौ, हरे वानी लागी प्यारियै। दरसन भयौ जाय, पाँय लपटाय गये, रही मिहराबसी ह्वै, कूबहूँ निहारियै।। धर्यौ जलपात्र एक, देखि बड़े पात्र जाने, आने निज गेह, पूजा लागी अति भारियै। भई द्वार भीर, नर उमड़ि अपार आये, महिमा विचारि बहु, सम्पति लै वारियै।।५६६।।