श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८) (श्री भक्तमाल सुन्दर स्वरूप स्याम ल्याये पधरायवे कौं, साधु निज धाम आय, कूब्रा जू के बसे हैं। रूप कौं निहारि, मन में विचार कियौ आप, करै कृपा मोकौं प्रभु, अचल ह्वै लसे हैं।। करत उपाय सन्त, टरत न नेक किहूँ, कही जू अनन्त हरि, रीझे स्वामी हँसे हैं। धर्यौ जानराय नाम, जानि लई जिय की बात, अंग में न मात, सदा सेवासुख रसे हैं।।५७०।। चले द्वारावति छाप, ल्यावैं यह मति भई, आज्ञा प्रभु दई, फिरी घर ही को आये हैं। करौ साधुसेवा, धरौ भाव दृढ़ हिये माँझ, टरौ जिनि कहूँ कीजै, जे-जे मन भाये हैं।। गेह ही में शंख चक्र, आदि निज देह भये, नये-नये कौतुक, प्रगट जग गाये हैं। गोमती कौ सागर सौं सगंम हो रह्यौ सुन्यौ, सुमिरनी पठायकै यों, दोऊ लै मिलाये हैं।।५७१।। भये शिष्य शाखा, अभिलाषा साधुसेवा ही की, महिमा अगाध जग, प्रगट दिखाई है। आये घर सन्त, तिया करति रसोई कोई, आयौ वाको भाई, ताकौं खीर लै बनाई है।। कूब़ाजी निहारि जानी, याकौ हित सोदर सौं, कीजियै विचार एक, सुमति उपाई है। कही भरि ल्यावो जल, गई डरि कलपै न, लई तसमई सब, भक्तनि जिंवाई है।।५७२।। वेगि जल ल्याई, देखि आगि-सी बराई हियें, झाँके मुँह भाई, दुखसागर बुड़ाई है। विमुख विचारि, तिया कूब़ा जू निकारि दई, गई पति कियो और, ऐसी मन आई है।। पर्य्यौई अकाल, बेटा-बेटी सो न पालि सकैं, तकै कोऊ ठौर मति, अति अकुलाई है। लिये संग कर्यौ जोई पुत्र सुता भूख भोई आय परी झींथड़ा में स्वामी को सुनाई है।।५७३।। नानाविधि पाक होत, सन्त आवैं जेसें सीत, सुख अधिकाई, रीति कैसे जात गाई है। सुनत वचन वाके, दीन दुखलीन महा, निपट प्रवीन मन, माँझ दया आई है।। देखि पति मेरौ, और तेरौ पति देखि याहि, कैसे कै निबाहि, सके परी कठिनाई है। रहौ द्वार झाऱ्यौ करौ पहुँचै अहार तुम्हें महिमा निहारि दृगधार लै बहाई है।।५७४।। कियौ प्रतिपाल तिया, पूरी कौ अकाल मास, भयौ जब समैं, विदा कीनी उठि गई है। अति पछितायत वह, बात अब पावै कहाँ ? जहाँ साधु संग, रंग सभा रसमई है।। करैं जाकौं शिष्य, सन्तसेवा ही बतावैं करौ, जो अनन्त रूप, गुन चाह मन भई है। नाभा जू बखान कियौ, मोकौं इन मोल लियौ, दियौ दरसाय सब, लीला नित नई है।।५७५।। सप्ताह परायण छठवाँ विश्राम