श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकान्हरजी) (१४६ श्रीअग्रदेवजी के शिष्य श्रीअग्र अनुग्रह तें भये, शिष्य सबै धर्म की धुजा।। जंगी प्रसिद्ध प्रयाग, विनोदी पूरन वनवारी। नरसिंह भल भगवान, दिवाकर दृढ़व्रत धारी।। कोमल हृदै किशोर, जगत् जगन्नाथ सलूधौ। औरौ अनुग उदार, खेम खीची धरमधीर लघु ऊधौ।। त्रिविध ताप मोचन सबै, सौरभ प्रभु निज सिर भुजा। श्रीअग्र अनुग्रह तें भये, शिष्य सबै धर्म की धुजा।। १५० ।। श्रीटीलाजी का वंश भरतखण्ड भूधर सुमेर, टीला लाहा की पद्धति प्रगट।। अंगद परमानन्द, दास जोगी जग जागै। खरतर खेम उदार, ध्यान केसौ हरिजन अनुरागै।। सस्फुट त्योला शब्द, लोहकर वंश उजागर। हरिदास कपि प्रेम, सबै नवधा के आगर।। अच्युतकुल सेवैं सदा, दासन तन दसधा अघट। भरतखण्ड भूधर सुमेर, टीला लाहा की पद्धति प्रगट ।। १५१।। श्रीकान्हरदासजी मधुपुरी महोच्छौ मंगलरूप, कान्हर को सौ को करें। चारि वरन आश्रम, रंक राजा अँन पावै। भक्तनि कौ बहु मान, विमुख कोऊ नहिं जावै।। बीरी चन्दन वसन, कृष्ण को कीरतन बरखैं। प्रभु के भूषन देय, महामन अतिसय हरखैं।। वीठल सुत विमल्यौ फिरै, दास चरणरज सिर धरैं। मधुपुरी महोच्छौ मंगलरूप, कान्हर को सौ को करें ।। १५२ ।।