भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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१५०) (श्री भक्तमाल श्रीनीवाजी भक्तनि सौं कलिजुग भलें, निबाही नीवा खेतसी ।। आवहिं दास अनेक, उठि सु आदर करि लीजै। चरण धोय दण्डौत, सदन में डेरा दीजै।। ठौर-ठौर हरिकथा, हृदै अति हरिजन भावैं। मधुर वचन मुँह लाय, विविध भाँतिन्ह जू लड़ावैं।। सावधान सेवा करैं, निर्दूषन रति चेतसी। भक्तनि सौं कलिजुग भलें, निबाही नीवा खेतसी ।। १५३ ।। श्री तूँवर भगवान्‌जी बसन बढ़े कुन्ती बधू, त्यों तूँवर भगवान् के।। यह अचरज भयौ एक, खाँड़ घृत मैदा बरषै। रजत रुक्म की रेल, सृष्टि सबही मन हरषै।। भोजन रास विलास, कृष्ण को कीरतन कीनौ। भक्तनि कौ बहुमान, दान सबही कौ दीनौं।। कीरति कीनी भीम सुत, सुनि भूप मनोरथ आनके। बसन बढ़े कुन्ती बधू, त्यों तूँवर भगवान् के ।। १५४ ।। बीतत बरस मास, आवै मधुपुरी नेम, प्रेम सौं महोच्छौ, रास हेमहीं लुटाइयै। सन्तनि जिंवाय, नाना पट पहिराय, पाछे द्विजन बुलाय, कछु पूजैं, पै न भाइयै। आयौ कोऊ काल, धनमाल जा बिहाल भये, चाहैं पन पार्यौ, आये अलप कराइयै। रहे विप्र दूषि, सुनि भयौ सुख, भूख बढ़ी, आयौ यों समाज करौ, ख्वारी मन आइयै ।। ५७६ ।। अति सनमान कियौ, ल्याये जोई सौंपि दियौ, लियौ गाँठ बाँधि, तब विनती सुनाइयै। सन्तनि जिवावौ, भावै रास लै करावौ, भावै जेंवौ सुख पावौ, कीजै बात मन भाइयै। सीधौ लाय कोठे धर्यो, रोक ही, सो थैली भर्यो, द्विजन बुलाय देत, किहूँ निघटाइयै। जितनौ निकासैं, ताते सौगुनौ बढ़त और, एक-एक ठौर, बीसगुनो दै पठाइयै ।। ५७७ ।।

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