श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीहरीदासजी) (१५१ श्रीजसवन्तजी जसवन्त भक्ति जयमाल की, रूड़ा राखी राठवड़॥ भक्तनि सौं अति भाव, निरन्तर अन्तर नाहीं। करजोरे इक पाँय, मुदित मन आज्ञा माहीं॥ श्रीवृंदावन वास, कुँज क्रीड़ा रुचि भावै। राधावल्लभलाल, नित्तप्रति ताहि लड़ावै॥ परम धरम नवधा प्रधान सदन साँच निधि प्रेम जड़। जसवन्त भक्ति जयमाल की रूड़ा राखी राठवड़॥ १५५॥ श्रीहरीदासजी हरीदास भक्तनि हित, धनि जननी एकै जन्यौ॥ अमित महागुन गोप्य, सार वित सोई जानै। देखत कौ तुलाधार, दूर आसै उनमानै॥ देय दमामौ पैंज, विदित वृन्दावन पायौ। राधावल्लभ भजन, प्रगट परताप दिखायौ॥ परम धरम साधन सुदृढ़, कलियुग कामधेनु में गन्यौ। हरीदास भक्तनि हित, धनि जननी एकै जन्यौ॥ १५६॥ हरीदास बनिक सो, काशी ढिंग वास जाकौ, ताकौ यह पन, तन त्यागौं ब्रजभूमहीं। भयौ ज्वर नाड़ी छीन, छोड़ि गये वैद तीन, बोल्यौ यों प्रवीन, वृन्दावन रस झूमहीं।। बेटी चारि सन्तनि कौ, दई अंगीकार करौ, धरौ डोली माँझ मोको, ध्यान दृग धूमहीं। चले सावधान राधावल्लभ कौ गान करै, करै अचरज लोग परी गाँव धूमहीं॥ ५७८॥ आवत ही मग माँझ, छूटि गयौ तन पन, साँचौ कियौ स्याम वन, प्रगट दिखायौ है। आय दरसन कियौ, इष्ट गुरु प्रेम भरि, नेम पर्यौ पूरौ, जाय चीरघाट न्हायौ है।। पाछें आये लोग, शोक करत भरत नैन, बैन सब कही, कही ताहि दिन आयौ है। भक्ति कौ प्रभाव यामें, भाव और आनौ जिनि, बिन हरिकृपा यह, कैसे जात पायौ है।। ५७९।।