भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

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१५२) (श्री भक्तमाल

श्रीगोपालदासजी, श्रीविष्णुदास जी भक्ति भार जूड़ैं जुगल, धर्म धुरन्धर जग विदित॥ बाँबोली गोपाल, गुननि गम्भीर गुनारट। दच्छिन दिसि विष्णुदास, गाँव काशीर भजन भट॥ भक्तनि सो यह भाय, भजै गुरु गोविन्द जैसे। तिलक दाम आधीन, सुवर सन्तनि प्रति तैसे॥ अच्युतकुल पन एकरस, निबह्यौ ज्यौं श्रीमुख गदित। भक्ति भार जूड़ैं जुगल, धर्म धुरन्धर जग विदित॥१५७॥

रहैं गुरूभाई, दोऊ भाई, साधुसेवा हिये, ऐसे सुखदाई नई रीति लै चलाइयै। जायँ जा महोच्छौं में, बुलाये हुलसाये अंग, संग गाड़ी सामा सो, भण्डारी दै मिलाइयै॥ याकौ तात्पर्य्य, सन्त घटती न सही जात, बात वे न जाने, सुखमानै मन भाइयै। बड़े गुरु सिद्ध, जग-महिमा प्रसिद्ध बोले, विनै कर जोरि, सोई कहिकै सुनाइयै॥५८०॥

चाहत महोत्छौ कियौ, हुलसत हियौ नित, लियौ सुनि बोले, करौ वेगि दै तयारियै। चहुँदिसि डार्यौ नीर, कर्यौ न्यौतो ऐसे धीर, आवै बहु भीर, सन्त ठौरनि सँवारिये॥ आये हरिप्यारे, चारो खूँट ते निहारे नैन, जाय पगु धारे, सीस विनै लै उचारिये। भोजन कराय दिन, पाँच लगि छाय रहे, पट पहिराय, सुख दियौ अति भारिये॥५८१॥

आज्ञा गुरु दई, भोर आवौ फिरि आस-पास, महा सुखरासि, नामदेव जू निहारिये। उज्ज्वल वसन तन, एकले प्रसन्न मन, चले जात वेगि, सीस पाँयनि पै धारिये। वेई दें बताय, श्रीकबीर अति धीर साधु, चले दोऊ भाई, परदच्छिना विचारियै। प्रथम निरखि नाम, हरखि लपटि पग, लगि रहे छोड़त न, बोले सुनौ धारियै॥५८२॥

साधु अपराध जहाँ, होत तहाँ आवत न, होय सनमान सब, सन्त तहीं आइयै। देखि प्रीति रीति, हम निपट प्रसन्न भये, लये उर लाय, जावौ श्री कबीर पाइयै॥ आगें जो निहारैं, भक्तराज दृग धारैं चलीं, बोले हँसि आप, कोऊ मिल्यौ सुखदाइयै। कह्यौ हाँ जू मान दई, भई कृपा पूरन यों, सेवा कौ प्रताप कहौ, कहाँ लगि गाइयै॥५८३॥

मास परायण सत्तइसवाँ विश्राम