श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 195 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकरमैतीजी) (१५३ श्री कील्हदेवजी के शिष्यजन कील्ह कृपा कीरति विशद्, परम पारषद सिष प्रगट।। आसकरन रिषिराज, रूप भगवान् भक्त गुर। चतुरदास जग अभय, छाप छीतर जू चतुरवर।। लाखै अद्भुत रायमल, खेम मनसा क्रम वाचा। रसिक रायमल गौर, देवा दामोदर हरिरँग राँचा।। सबै सुमंगल दास दृढ़, धर्म धुरन्धर भजन भट। कील्ह कृपा कीरति विशद्, परम पारषद सिष प्रगट।।१५८।। श्रीनाथभट्टजी रसरास उपासक भक्तराज, नाथभट्ट निर्मल वयन।। आगम निगम पुरान, सार शास्त्रनि जु विचार्यौ। ज्यौं पारौ दे पुटहिं, सबनि कौ सार उधार्यौ।। श्रीरूप-सनातन जीव, भट्ट नारायण भाख्यौ। सो सर्वसु उर साँच, जतन करि नीके राख्योँ।। फनीवंश गोपाल सुव, रागा अनुगा कौ अयन। रसरास उपासक भक्तराज, नाथभट्ट निर्मल वयन।।१५६।। श्रीकरमैतीजी कठिन काल कलियुग्ग में, करमैती निकलंक रही।। नश्वर पति-रति त्यागि, कृष्णपद सौं रति जोरी। सबै जगत् की फाँसि, तरकि तिनुका ज्यौं तोरी।। निरमल कुल काँथड्या, धन्य परसा जिहिं जाई। विदित वृन्दावन वास, सन्त मुख करत बड़ाई।। संसार स्वाद सुख बांत करि, फेरि नहीं तिन तन चही। कठिन काल कलियुग्ग में, करमैती निकलंक रही।।१६०।।